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Bhopal व्यंग्य -नए दौर की पाठशालाओं में सियासत की वर्णमाला Satire - The alphabet of politics in the schools of the new era

 


Upgrade Jharkhand News. पी फॉर पॉलिटिक्स पढ़े, तो लगेगा कि सियासत जो न करा दे, वही सही है। किसी ने किसी राजनीतिक दल के अलम्बरदारों की स्तुति के लिए सामान्य पाठशाला में ही अलग से पाठ्यक्रम पढ़ाना शुरू कर दिया, तो किसी ने अपने मजहब की स्तुति ही बच्चों को पढ़ानी शुरू कर दी। तिस पर दुहाई लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार की। सियासी अलमबरदार भी खुश और उनके दल के अनुयायी भी खुश। अभी तक बेसिक शिक्षा की पुस्तकों में हिंदी और अंग्रेजी की वर्णमाला में अक्षरों की पहचान अपने आस पास की विशेष वस्तुओं से कराई जाती थी, ताकि बच्चे अक्षरों व वस्तुओं में सरलता से सामंजस्य बिठा सकें। अक्षरों की पहचान कर सकें। भला हो प्रचार तंत्र का अक्षरों की पहचान को भी सियासी रंग से रंग दिया गया। प्राथमिक पाठशाला का नाम बदल कर किसी ने पिछड़ा, दलित अल्पसंख्यक पाठशाला ही रख दिया, गोया बच्चों के चेहरे पर लगे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के ठप्पे के आधार पर ही इस पाठशाला में प्रवेश देकर मनमाने प्रतीक बताकर अक्षरों की अलग पहचान बताई जाएगी। 



सरकारी स्कूलों में बरसों से हिंदी अक्षर सिखाने व समझाने के लिए काले बरखे वाली किताब पढ़ाई जाती थी, जिसमें अ से अनार, आ से आम, छोटी इ से इमली, बड़ी ई से ईख पढ़ाई जाती रही। ऐसे ही अंग्रेजी की पुस्तक में ए फॉर एप्पल, बी फॉर बॉय, सी फॉर कैट, डी फॉर डॉग, ई फॉर एलिफेंट पढ़ाया जाता रहा। नये दौर की  सियासत ने तो पाठशाला में पढ़ाने का तरीका ही बदल दिया, सियासी दल की  टोपी पहनकर अध्यापक ने काले बरखे वाली किताब के अक्षरों की पहचान बदल कर अ से अनार की जगह अपने सियासी दल के मुखिया का नाम बताना शुरू कर दिया। ऐसा भी हो सकता है कि महंगाई के दौर में अनार बच्चों की समझ में न आए , मगर सियासी मुखिया समझ में कैसे आएगा, इससे सिखाने वाले को कोई सरोकार नहीं था। अंग्रेजी वर्णमाला में भी ए फॉर एप्पल के पर्याय बताए गए कि ए फॉर सियासी पार्टी का मुखिया, डी फॉर डॉग की जगह डी फॉर सियासी मुखिया की बहू। 



बचपन से ही बच्चों की राजनीतिक दलों के प्रति रुचि जागृत करने के लिए यह प्रयोग अनुकरणीय व अभिनंदनीय है। सभी सियासी दलों को अपने अपने दल के नेताओं और नीतियों के प्रसार हेतु ऐसे प्रयोग किये जाने चाहिए , मसलन एक राष्ट्रीय दल आर फॉर विपक्षी गठबंधन का नेता, पी फॉर विपक्षी गठबंधन के मुखिया की बहन, एस फॉर बहन भाई की मम्मी कहकर बच्चों को अपनी पार्टी से परिचित करा सकता है, दूसरा राजनीतिक दल ए फॉर अपने दल का सर्वमान्य नेता, एन फॉर अपने दल का अंतरराष्ट्रीय नेता, वाई फॉर योगी, पढ़ा सकते हैं। ऐसे ही अनेक व्यक्तित्वों से बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी की वर्णमाला से यदि परिचित कराया जाएगा, तो बच्चों के ज्ञान को अप टू डेट करने में आसानी होगी ही। 



वैसे भी शिक्षा में प्रयोगधर्मिता अनिवार्य है। पुराने संदर्भ को आखिर कब तक ढोया जाए, सो क्यों न शिक्षा में नए सन्दर्भ जोड़े जाएँ। लगता है कि कुछ समय बाद ऐसी ही सियासी पाठशालाएं राजनीतिक दलों के द्वारा खोली जाएंगी, जिनमें राजनीतिक दलों के मुखिया और नेताओं के साथ उनकी नीतियों को भी पढ़ाया जाएगा। यदि भविष्य में ए फॉर अल्पसंख्यक, बी फॉर बौद्ध अल्पसंख्यक, सी फॉर क्रिश्चियन अल्पसंख्यक, जे फॉर जैन अल्पसंख्यक, एम फॉर मुस्लिम अल्संख्यक,पी फॉर पारसी अल्पसंख्यक और बी फॉर भारतीय जनता पार्टी, सी फॉर कांग्रेस, टी फॉर तृणमूल कांग्रेस, एस फॉर शिवसेना जैसे परिचय पढ़ने को मिल जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रचार का युग है और इस युग में जैसे भी हो, सभी को अपनी अपनी पाठशालाएं खोलकर अपने अपने पाठ्यक्रम निर्धारित करने और पढ़ाने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए। सुधाकर आशावादी



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