Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal मध्यप्रदेश : जहां सौर ऊर्जा अब विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की मुख्यधारा बन रही है Madhya Pradesh: Where solar energy is no longer an option, but the mainstream of the future

 


 Upgrade Jharkhand News. आज संपूर्ण विश्व में ऊर्जा पर चर्चा केवल उत्पादन के आंकड़ों तक सीमित नहीं  है। अब असली प्रश्न यह है कि ऊर्जा किस स्रोत से आ रही है और उसका पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। दुनिया जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन और सीमित जीवाश्म संसाधनों के दबाव में नई ऊर्जा संरचना की तलाश कर रही है। इसी संदर्भ में मध्यप्रदेश का सौर और नवकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ता कदम केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि विकास की सोच में आया एक स्पष्ट और आवश्यक परिवर्तन है। ऐसे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह कहना कि सौर ऊर्जा के विस्तार से पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता लगातार घट रही है, बेहद महत्वपूर्ण है। यह उस नीति एवं दिशा की ओर संकेत करता है, जिसमें राज्य ऊर्जा सुरक्षा को केवल बिजली आपूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देख रहा है। आज जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, तब स्वच्छ और टिकाऊ स्रोतों की ओर समय रहते बढ़ना किसी भी राज्य के लिए रणनीतिक अनिवार्यता बन चुका है।


प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2070 तक ‘नेट ज़ीरो कार्बन’ लक्ष्य और वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का संकल्प इसी  यथार्थ की स्वीकारोक्ति है। इस लक्ष्य को हासिल करने में राज्यों की भूमिका निर्णायक है। मध्यप्रदेश ने इस जिम्मेदारी को केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसे नीति, निवेश और क्रियान्वयन के स्तर पर आगे बढ़ाने का प्रयास भी किया है। राज्य की ऊर्जा संरचना में हरित ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी यह बताती है कि ऊर्जा संक्रमण अब केवल कागज़ी योजना नहीं रहा। रीवा सोलर पार्क और ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट जैसे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि मध्यप्रदेश बड़े पैमाने की सौर परियोजनाओं को न केवल अपनाने, बल्कि सफलतापूर्वक संचालित करने की क्षमता भी रखता है। इन परियोजनाओं का महत्व केवल मेगावाट क्षमता में नहीं है, बल्कि इस संदेश में है कि राज्य अब ऊर्जा उत्पादन के पारंपरिक ढांचे से बाहर निकलकर नवाचार और तकनीक को अपनाने के लिए तैयार है। सौर ऊर्जा अब विकल्प नहीं, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लागू की गई टेक्नोलॉजी एग्नोस्टिक रिन्यूएबल एनर्जी पॉलिसी इस बदलाव की बुनियाद है। यह नीति किसी एक तकनीक को प्राथमिकता देने के बजाय, नवकरणीय ऊर्जा के सभी संभावित स्रोतों को समान अवसर देती है। इसका अर्थ यह है कि राज्य भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए स्वयं को लचीला और अनुकूल बनाए रखना चाहता है। यही लचीलापन निवेशकों के लिए भरोसे का आधार बनता है और यही ऊर्जा क्षेत्र में स्थायित्व की शर्त भी है। मध्यप्रदेश की भौगोलिक स्थिति इस परिवर्तन में स्वाभाविक सहयोगी है। पर्याप्त धूप, खुला भू-भाग और संसाधनों की उपलब्धता सौर ऊर्जा के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। लेकिन केवल प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही किसी राज्य को आगे नहीं ले जातीं। इसके लिए स्पष्ट नीति, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। इन तीनों का संतुलन वर्तमान ऊर्जा नीति में दिखाई देता है।


 सौर और नवकरणीय ऊर्जा का विस्तार केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा है। बड़े निवेश, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सहायक उद्योगों का विकास,ये सभी हरित ऊर्जा से जुड़े प्रत्यक्ष लाभ हैं। ऊर्जा उत्पादन का यह मॉडल राज्य को ऊर्जा सरप्लस बनाने के साथ-साथ औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में भी मजबूत करता है। जब बिजली स्वच्छ, स्थिर और सुलभ होती है, तब उद्योगों के लिए लागत घटती है और निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए भी यह बदलाव महत्वपूर्ण है। सौर ऊर्जा परियोजनाएँ केवल बड़े औद्योगिक केंद्रों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे स्थानीय रोजगार, भूमि उपयोग और बुनियादी ढांचे को भी नया स्वरूप देती हैं। इससे विकास का लाभ एक सीमित वर्ग तक सिमटने के बजाय व्यापक समाज तक पहुँचता है। यही समावेशी विकास की मूल भावना है।


सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह ऊर्जा परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी को केंद्र में रखता है। पारंपरिक ऊर्जा स्रोत सीमित हैं और उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव स्पष्ट हो चुके हैं। ऐसे में सौर ऊर्जा पर बढ़ता जोर केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले समय की अनिवार्यता है। मध्यप्रदेश इस अनिवार्यता को समझते हुए ऊर्जा नीति को केवल आज की मांगों के अनुसार नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की चुनौतियों को ध्यान में रखकर गढ़ रहा है।  मध्यप्रदेश का सौर ऊर्जा की ओर यह बढ़ता कदम यह संदेश देता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सही नीति और स्पष्ट दृष्टि के साथ दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। यदि यही दिशा बनी रही, तो मध्यप्रदेश न केवल ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि हरित विकास का ऐसा मॉडल भी प्रस्तुत करेगा, जिसकी ओर अन्य राज्य देखेंगे। अंततः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि सौर ऊर्जा की यह यात्रा केवल बिजली उत्पादन का रास्ता नहीं है। यह मध्यप्रदेश के विकास दर्शन का विस्तार है। एक ऐसा दर्शन, जिसमें जिम्मेदारी, संतुलन और भविष्य की चिंता को केंद्रीय स्थान दिया गया है। यही सोच राज्य को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी भी बनाती है। अंजनी सक्सेना



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.