Upgrade Jharkhand News. कांग्रेस के हरिपुरा (गुजरात)अधिवेशन में 1938 में सुभाष चंद्र बोस सर्वसम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया। 1939 के त्रिपुरी ( जबलपुर, मध्य प्रदेश) अधिवेशन में भी सुभाष चंद्र बोस को दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। गांधीजी चाहते थे कि सीतारमैया अध्यक्ष बने, इसीलिए चुनाव हुआ। सुभाष चंद्र बोस को चुनाव में 1580 मत मिले और सीता रमैया को 1377 मत मिले। इस प्रकार गांधी जी के विरोध के बावजूद सुभाष चंद्र 203 मतों से अध्यक्ष पद का चुनाव जीत गए थे। तभी सितंबर 1939 में विश्व युद्ध शुरू हो गया। नेताजी ने अंग्रेजों को छह महीने में देश छोड़ने का अल्टीमेटम दिया। नेताजी के अल्टीमेटम का गांधीजी ने विरोध किया जिससे इन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़ दी। इसके बाद डॉ.राजेन्द्र प्रसाद को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। गांधी जी भारत की पूर्ण स्वतंत्रता नहीं बल्कि इसे ब्रिटेन का एक उपनिवेश राष्ट्र (डोमिनियन स्टेट) बनाना चाहते थे l यह प्रस्ताव कांग्रेस के 1928 में कोलकाता अधिवेशन में पास भी किया गया था। जिसका सुभाष चंद्र बोस ने बहुत विरोध किया था। 1939 में कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़ने के बाद सुभाष चंद्र ने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। कुछ दिन बाद ही सुभाष चंद्र को कांग्रेस से निकाल दिया गया और फॉरवर्ड ब्लॉक एक स्वतंत्र पार्टी बन गई।
सुभाष चंद्र बोस ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा भारत के संसाधनों का उपयोग करने का घोर विरोध किया और जनआंदोलन शुरू कर दिया इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें कोलकाता के घर में नजरबंद कर दिया।1941 में सुभाषचंद्र बोस किसी तरह अंग्रेजों की कैद से छूटकर अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुंच गए और गुमनाम हो गए l 1941 के अंत में बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की और जन गण मन को भारत का राष्ट्रगान घोषित किया। देश को जय हिंद का नारा दिया। यहीं पर सुभाष चंद्र बोस को नेताजी की उपाधि दी गई। मई 1942 में जर्मनी में सुभाषचंद्र बोस ने हिटलर से मुलाकात की । हिटलर से उन्हें कोई सकारात्मक सहयोग नहीं मिला। इसी दौरान सुभाषचंद्र बोस की भेंट ऑस्ट्रेलिया की महिला एमिली से हुई जो उनकी सचिव रही,और उन्होंने उससे शादी कर ली। जिससे उनके एक बेटी अनिता बोस हुई। 26 जनवरी 1943 को बर्लिन में भारतीय स्वाधीनता दिवस धूमधाम से मनाया गया। जिसमें नेताजी ने मुख्य भाषण दिया और उसके बाद जापान चले गए। जून 1943 में नेताजी की मुलाकात जापानी प्रधानमंत्री से हुई और उन्होंने भारत की संपूर्ण स्वाधीनता के लिए बिना शर्त पूरे समर्थन की अधिकृत घोषणा की। यह उस समय के परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटना थी। किसी भी विदेशी शासन प्रमुख द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इस प्रकार भारत को बिना शर्त पूरा समर्थन देने की घोषणा की गई थी। हालांकि गांधीजी इस प्रकार की कोई भी घोषणा ब्रिटिश सरकार या उसके मित्र देशों से नहीं करवा पाए थे, य़ह नेताजी की एक बड़ी जीत थी। इसके बाद नेताजी ने अपनी मौजूदगी जग जाहिर कर दी और नागरिक रेडियो पर अपना विशेष प्रसारण किया। जुलाई 1943 में नेताजी सिंगापुर पहुंच गए। जहां रासबिहारी बोस और इंडियन नेशनल आर्मी आजाद हिंद फौज के अफसरों और नेताओं ने नेताजी का स्वागत किया।
पांच जुलाई 1943 नेताजी के जीवन का सर्वाधिक वैभवशाली दिन था क्योंकि उस दिन सिंगापुर टाउन हॉल के एक बड़े मैदान में उन्होंने सर्वोच्च सेनापति सुप्रीम कमांडर के रूप में आजाद हिंद फौज की सलामी ली। यहीं पर उन्हें नेताजी का नाम दिया गया। उन्होंने अपनी फ़ौज को संबोधन में कहा था "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। " उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की कब्र बनाने का आव्हान सैनिकों से किया । इक्कीस अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में एक ऐतिहासिक सभा में उन्होंने प्रथम अंतरिम आजाद हिंद सरकार की स्थापना का ऐलान किया । इस अंतरिम सरकार को विश्व के तीन प्रमुख देश जापान, जर्मनी और इटली समेत कुल नौ देशों ने मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार दो सौ वर्ष में भारत के स्वाधीनता सेनानियों को अपने स्वाधीन राष्ट्र की अनुभूति हुई थी। आजाद हिंद सरकार की पहली घोषणा थी अमेरिका और ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध। बाईस अक्टूबर 1943 को नेताजी ने आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजीमेंट का औपचारिक उद्घाटन किया। जिसमें भारतीय महिलाओं की भागीदारी थी।आजाद हिंद सरकार की स्थापना के बाद ,आजाद हिंद बैंक ने ₹10 से लेकर ₹1,00,000 तक के नोट के जारी किए, ₹1,00,000 के नोट में नेताजी की तस्वीर छापी गई थी।
29 दिसंबर 1943 को नेताजी अंडमान पहुंचे। यहां राष्ट्र अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जिमखाना मैदान में भारी जन समुदाय के बीच राष्ट्रीय तिरंगा फहराया। नेताजी ने अंडमान को "शहीद दीप समूह " तथा निकोबार को " स्वराज दीप समूह " का नया नाम दिया था। जनवरी 1944 में नेताजी अपना मुख्यालय सिंगापुर से भारत के नजदीक रंगून (बर्मा) में ले आए। आजाद हिंद फौज ने 18 मार्च 1944 को इंफाल के रास्ते भारत में प्रवेश किया ,पर खराब मौसम के कारण ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। जापान की हार के कारण नेताजी का आजाद हिंद फौज के द्वारा स्वतंत्रता का सपना पूरा ना हो पाया। ऐसा माना जाता है कि अट्ठारह अगस्त 1945 को जापान जाते समय नेताजी का विमान ताइवान में क्रैश हो गया,परंतु उनका शरीर नहीं मिला और तब से लेकर आज तक उनकी मृत्यु एक विवाद और रहस्य का विषय बनी हुई हैं। नेताजी के जय हिंद नारे से राष्ट्रीय चेतना जागृत हो गई । आज भी जय हिंद का उद्घोष जनमानस में जोश भरने और देश प्रेम की भावना को जीवित करने का साधन बना हुआ है। अपनी क्रांतिकारी सोच के कारण नेताजी ने उस समय के जनमानस को उद्वेलित किया और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को प्रेरित किया। जिसने भारत की आजादी में उत्प्रेरक का काम किया। उनकी विचारधारा भारतीय जनमानस में सदा बसी रहेगी। देश आज भी नेताजी को एक क्रांतिकारी नेता के रूप में याद करता है और सदा करता रहेगा। (लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक हैं) अतिवीर जैन 'पराग

No comments:
Post a Comment