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Bhopal भारतीय गणतंत्र में आम आदमी कहाँ है ? Where is the common man in the Indian Republic?...

 


Upgrade Jharkhand News.  भारत अपना सतहत्तर वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। भारतीय संविधान के लागू होने के स्मृति दिवस के रूप में इस दिवस देश की समृद्धि का परिचय कर्तव्य पथ पर दिया जाता है। जिसमें देश की सैन्य क्षमता से लेकर विभिन्न प्रान्तों की विशेषताओं से देश को अवगत कराया जाता है। बहु संस्कृति को व्यक्त करती हुई सांस्कृतिक विविधता प्रदर्शित करने वाली प्रस्तुतियों से देश की  अनेकता में एकता की छवि प्रस्तुत की जाती है। गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व पर देश की उपलब्धियों एवं विकास यात्रा का यह अद्भुत दृश्य प्रत्येक भारतवासी को गौरव की अनुभूति कराता है। अब भारत गणराज्य की वास्तविक संवैधानिक स्थिति का अध्ययन करें, कि क्या वास्तव में गणतंत्र में गण ही सर्वोच्च शक्ति है ? क्या लोकतान्त्रिक मूल्यों का अनुपालन समानता के आधार पर किया जा रहा है ? क्या सभी नागरिकों के लिए समान न्याय व्यवस्था लागू है ? क्या आम नागरिक को समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं ? क्या देश में समान नागरिक संहिता लागू है ? भले ही राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता हो तथा शासन की शक्ति जनता में निहित होती हो, मगर क्या जनता को समान लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं ? यह प्रश्न भारत को संवैधानिक व्यवस्था एवं गणतंत्र पर सवाल खड़े करते हैं। 


विचारणीय बिंदु यह भी है कि किसी भी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास राष्ट्र के नागरिकों की राष्ट्र के प्रति समर्पण भावना से ही संभव होता है, यदि नागरिकों में राष्ट्र सर्वोपरि की भावना नहीं होगी, तो राष्ट्र से पहले व्यक्तिगत स्वार्थ का बोलबाला होना स्वाभाविक ही है। देश का दुर्भाग्य यही है, कि पंथ निरपेक्षता के नाम पर कुछ लोग राष्ट्र की अपेक्षा अपने धर्म को प्राथमिकता पर रखते हैं,, कुछ नागरिक जातीय संकीर्णता से ग्रस्त हैं। अनेक राजनीतिक दलों का अस्तित्व ही जातीय गठजोड़ पर निर्भर है। कुछ वंशवादी परिवारों ने राजनीति की पारिवारिक दुकानें खोल रखी हैं, विधायक और सांसद जैसे पदों पर परिवार के सदस्यों का ही कब्ज़ा है। विडंबना यह भी है कि देश में गण गौण हो गया है।  वह समान नागरिक अधिकारों से वंचित है। जातीय संकीर्णता के चलते आम आदमी की पहचान ही उसके जातीय अस्तित्व से होती है। जातियों में बंटे समाज में सरकारी स्तर पर जाति प्रमाण पत्र बाँट कर उसे दलित, पिछड़ा में बांटकर समाज का बंटवारा संवैधानिक आधार पर किया जाता है। तथाकथित अगड़ी जातियों के नागरिकों को न तो जाति प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है, न ही उसके अगड़े होने का कोई कारण स्पष्ट किया जाता है, कि दुर्बल आय वर्ग का व्यक्ति अगड़ा किस आधार पर है।

  

सबसे दुखद एवं अमानवीय स्थिति तो तब होती है, जब जातीयता को निशाना बनाकर समाज में तथाकथित अगड़ी जातियों के नागरिकों के विरूद्ध दलित व पिछड़ी जातियों के नागरिकों को झूठी शिकायत करने के अधिकार दे दिए जाते हैं, जिस अधिकार का दुरूपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। सीधा सा अभिप्राय यही है कि गणों को आपस में ही उलझा कर राजनीति के दिग्गज मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। वर्तमान वैश्विक परिवेश में भारत उभरती हुई शक्ति है, जिसके लिए देश में आंतरिक लोकतंत्र की सुदृढ़ता अपेक्षित है। जिसके लिए प्रत्येक नागरिक का योगदान अपेक्षित होता है, किन्तु जाति, धर्म और संप्रदाय की संकीर्ण सोच में सिमटे नागरिकों को व्यापक रूप से सोचने का अवसर ही नहीं मिलता। शिक्षण तथा रोजगार के क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था, चिकित्सा क्षेत्र में विशिष्ट पाठ्यक्रमों में निर्धारित मानकों की अनदेखी करके अयोग्यता को प्रवेश देने की नीति, शिक्षा क्षेत्र में जातीय आरक्षण को प्राथमिकता स्वस्थ लोकतंत्र को बैसाखियों पर धकेलने तक सीमित है। ऐसे में किस आधार पर भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकेगा ? यह गंभीर चिंता का विषय है।  


अब भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की चर्चा करें, तो स्पष्ट होगा, कि सीमा सुरक्षा बलों की चाक चौबंद निगरानी के उपरांत भी रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की देश में भरमार है। देश के शायद ही कुछ जिले ऐसे हों, जिनमें घुसपैठियों की उपस्थिति न हो। देश में मुफ्तखोरी की सुविधाओं का लाभ येन केन प्रकारेण ऐसे तत्व भी ले रहे हैं। पश्चिमी बंगाल तथा सीमावर्ती राज्यों में यह समस्या कम नहीं है। यहाँ तक कि घुसपैठियों के आधार कार्ड और मताधिकार पत्र भी बने हुए हैं। ऐसे में सुदृढ़ गणतंत्र की कल्पना किस आधार पर की जा सकती है, यह भी विचारणीय प्रश्न है। देश में संवैधानिक आधार पर पृथक पृथक विशेषाधिकार समान नागरिक अधिकारों का मखौल उड़ाते प्रतीत होते हैं। नागरिकता पंजीकरण न होने के कारण अवैध घुसपैठियों की संख्या बढ़ गई है। कठोर जनसंख्या नीति न होने के कारण विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक परिदृश्य बदल रहा है, जो राष्ट्रीय एकता व अखंडता के लिए घातक है। धार्मिक आधार पर वैमनस्यता बढ़ रही है।  जब तक समान नागरिक संहिता, नागरिकता पंजीकरण, समान व कठोर जनसंख्या नीति तथा शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में आरक्षण मुक्त व्यवस्था को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता, तब तक स्वस्थ एवं समृद्ध गणतंत्र का सपना साकार नहीं हो सकता। सो समय की मांग है कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु समाज को बाँटने वाले प्रावधानों को समाप्त किया जाए, ताकि गणतंत्र स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतिबिम्ब बनकर सामाजिक समरसता और न्याय में समानता के अवसरों का लाभ जनमानस के लिए समान रूप से उपलब्ध करा सके।  डॉ. सुधाकर आशावादी



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