Upgrade Jharkhand News. जब भी देशभक्ति, त्याग और स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है, तो इतिहास के पन्नों पर कुछ चमकते हुए नाम तुरंत सामने आ जाते हैं। लेकिन किसी भी राष्ट्र का इतिहास केवल प्रसिद्ध चेहरों से नहीं बनता, बल्कि उन व्यक्तित्वों से बनता है जिन्होंने बिना यश, बिना मंच और बिना प्रचार के राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। रास बिहारी सेन ऐसे ही क्रांतिकारी थे—जिनका जीवन आज की नई पीढ़ी के लिए उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता संग्राम के दौर में था। रास बिहारी सेन का जीवन हमें सबसे पहले यह सिखाता है कि देशसेवा की कोई एक तय राह नहीं होती। वे न तो बड़े मंचों के वक्ता थे, न ही जनसभाओं में तालियाँ बटोरने वाले लोकप्रिय नेता। वे पर्दे के पीछे रहकर इतिहास गढ़ने वाले योजनाकार, संगठनकर्ता और दूरदर्शी राष्ट्रभक्त थे। आज की पीढ़ी, जो त्वरित सफलता, सोशल मीडिया की पहचान और तुरंत परिणामों के दबाव में जी रही है, उनके जीवन से यह सीख सकती है कि सार्थक और स्थायी काम अक्सर शोर के बिना होता है, लेकिन उसका असर पीढ़ियों तक रहता है।
युवावस्था में ही रास बिहारी सेन ने यह समझ लिया था कि गुलामी केवल राजनीतिक दासता नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वाभिमान का संकट है। यही कारण था कि उन्होंने क्रांति को भावनात्मक आवेग नहीं, बल्कि सुविचारित रणनीति के रूप में अपनाया। 1912 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमले की योजना हो या प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अखिल भारतीय सशस्त्र विद्रोह का सपना—हर प्रयास यह दिखाता है कि वे जोखिम से नहीं, बल्कि निष्क्रियता से डरते थे। आज के युवाओं के लिए यह संदेश बेहद स्पष्ट है—डर असफलता का नहीं, प्रयास न करने का होना चाहिए।जब अंग्रेज़ी हुकूमत का दमन बढ़ा, साथी पकड़े गए, आंदोलन बिखरा और स्वयं रास बिहारी सेन “मोस्ट वांटेड” घोषित किए गए, तब उन्होंने हार स्वीकार नहीं की। उन्होंने पलायन को पलायन नहीं, बल्कि रणनीतिक कदम बनाया। 1915 में जापान पहुँचकर उन्होंने न केवल स्वयं को सुरक्षित रखा, बल्कि भारत की आज़ादी के विचार को एशिया में जीवित रखा।
यह नई पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है कि परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, लक्ष्य और उद्देश्य को मरने नहीं देना चाहिए।जापान में रहते हुए रास बिहारी सेन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया। उन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित किया, इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की और यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता संग्राम केवल भारत की सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लड़ा गया। आज, जब युवा वैश्विक अवसरों की तलाश में विदेशों में पढ़ने और काम करने जा रहे हैं, रास बिहारी सेन का जीवन उन्हें यह विश्वास देता है कि देश से दूर रहकर भी देश के लिए जिया और लड़ा जा सकता है, यदि उद्देश्य स्पष्ट हो।
रास बिहारी सेन का सबसे बड़ा गुण था—अहंकार का पूर्ण अभाव। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे करिश्माई, ऊर्जावान और जनप्रिय नेता एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेतृत्व के लिए सामने आए, तो रास बिहारी सेन ने बिना किसी हिचक के नेतृत्व उन्हें सौंप दिया। यह निर्णय केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और ऐतिहासिक था।आज, जब हर क्षेत्र में पद, पहचान और प्रभाव को पकड़कर रखने की होड़ दिखाई देती है, रास बिहारी सेन का यह त्याग नई पीढ़ी को सिखाता है कि सही व्यक्ति को सही समय पर आगे बढ़ने देना भी देशसेवा का सर्वोच्च रूप है।
उनका जीवन यह भी बताता है कि राष्ट्रभक्ति केवल नारों, झंडों और प्रतीकों तक सीमित नहीं होती। जापान में रहते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति, दर्शन और मानवीय मूल्यों को सम्मान दिलाया। भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। उनका जीवन प्रमाण है कि संस्कृति, संवाद और सद्भाव भी संघर्ष के प्रभावी और दीर्घकालिक हथियार होते हैं। 21 जनवरी 1945 को रास बिहारी सेन का निधन हुआ—स्वतंत्र भारत के उदय से ठीक पहले। वे वह ऐतिहासिक क्षण नहीं देख सके, जब तिरंगा स्वतंत्र आकाश में लहराया। लेकिन यह सत्य है कि उस तिरंगे की नींव में उनका त्याग, उनका संघर्ष और उनका स्वप्न गहराई से समाया हुआ है।
यह नई पीढ़ी के लिए एक भावुक लेकिन सशक्त संदेश है कि हर पीढ़ी को आज़ादी का फल नहीं मिलता, लेकिन हर पीढ़ी पर उसे सुरक्षित और सार्थक बनाए रखने की जिम्मेदारी अवश्य होती है। आज का युवा करियर, प्रतिस्पर्धा, पहचान और भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में रास बिहारी सेन का जीवन उन्हें यह भरोसा देता है कि—बड़े लक्ष्य समय लेते हैं,
सच्चा योगदान अक्सर देर से पहचाना जाता है,
लेकिन ईमानदार प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
नई पीढ़ी के लिए रास बिहारी सेन केवल इतिहास नहीं, एक दिशा हैं।
वे सिखाते हैं कि राष्ट्र के लिए कुछ करना है तो पहले स्वयं को मजबूत बनाओ, विचारों में स्पष्टता रखो, स्वार्थ से ऊपर उठो और फिर बिना दिखावे के अपने कर्तव्य में जुट जाओ।
यही रास बिहारी सेन की सबसे बड़ी प्रेरणा है—
नाम भले छोटा रहे, लेकिन संकल्प हमेशा बड़ा होना चाहिए।



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