Upgrade Jharkhand News. बात उन दिनों की है जब में कालेज में पढ़ा करती थी। बी . ए . फाइनल की परीक्षा थी । सेंटर कॉलेज से काफी दूरी पर दिया गया था। ट्रेन से एक घंटे का रास्ता था। स्टेशन पर उतरकर रिक्शे पर लगभग पंद्रह - बीस मिनट का रास्ता था। उस स्टेशन का नाम था पुरूलिया , जो पश्चिम बंगाल में आता था। दो परीक्षाएं तो मैंने दे दी , उसके बाद एक दिन परीक्षा हाल में ही तबियत बिगड़ गई। मैंने किसी तरह सम्हाला और पेपर पूरा किया। फिर स्टेशन के पास की रेलवे डिस्पेंसरी से मैंने दवाइयां दी। एक परिचित चिकित्सा कर्मी के घर में विश्राम लिया । बताया गया कि अत्यंत श्रम के कारण , नींद पूरी न होने के कारण तबियत बिगड़ी है। जब पांच छः उल्टियां भी हो गईं तो डिहाइड्रेशन हो गया है।
और इस पूरे जद्दोजहद के पीछे मेरी ट्रेन कब छूट गयी , पता ही नहीं चला। अब बाद वाली ट्रेन मैंने पकड़ी। गाड़ी के अंदर लाइट भी नहीं थी। किसी तरह यात्रा शुरू हुई, हम आद्रा में रहते थे , और ट्रेन रात आठ बजे आद्रा पहुंची। मैं अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी। एक तो बाद वाले पेपर की तैयारी करनी थी। मन में आ रहा था कि आजकल किसी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भैया अपनी पढ़ाई में व्यस्त। माता जी पर घर की देख - रेख का पूरा दायित्व था। कौन आएगा मुझे लेने। मैं मर भी जाऊंगी , तो भी कोई पूछने वाला नहीं। उस समय शाम छः सात बजे के बाद लड़कियां अकेली आना जाना नहीं करती थीं । कोई बंदिश तो नहीं थी , मगर वे स्वयं ही घबराती थीं।
और तमाम अंतर्द्वंद्व के बाद जब मैं गाड़ी से उतरी और निकासी की ओर गई , मैंने वहां माता जी को इंतजार करते पाया। मेरा मन खुशी से भर गया और एक समाधान भी मिल गया कि किसी से उम्मीद की जाए या नहीं माता-पिता जब तक हैं , बच्चों को नाउम्मीद नहीं होना चाहिए। आर . सूर्य कुमारी
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