Bhopal

Bhopal केदारनाथ धाम की मर्यादा को खतरे में डालती बढ़ती भीड़ और रील संस्कृति The increasing crowd and reel culture endangering the dignity of Kedarnath Dham.

Upgrade Jharkhand News.  दीपक नौंगाई 'अकेला' - विभूति फीचर्स)         लगभग  तेईस हजार  फीट की ऊंचाई पर एक तरफ बर्फ से ढकी चोटियां साफ दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर अनावृत पठारी शिखर श्रेणियां छात…

Bhopal केदारनाथ धाम की मर्यादा को खतरे में डालती बढ़ती भीड़ और रील संस्कृति The increasing crowd and reel culture endangering the dignity of Kedarnath Dham.

 


Upgrade Jharkhand News. दीपक नौंगाई 'अकेला' - विभूति फीचर्स)

   

        लगभग  तेईस हजार  फीट की ऊंचाई पर एक तरफ बर्फ से ढकी चोटियां साफ दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर अनावृत पठारी शिखर श्रेणियां छाती तान खड़ी रहती है। हिमशिखरों से समय-समय पर हिमनद का हिस्सा टूटता रहता है। काले कबरे पहाड़ों से पत्थर गिरते हैं। इस बीच नागिन की तरह बलखाती पगडंडी पर होता है, एक आम आदमी। मंदाकिनी के तट पर पवित्र केदारनाथ धाम के मार्ग का कोई यात्री यही वर्णन कर सकता है । 

     लेकिन केदारनाथ की यात्रा अब पहले जैसी नहीं रही । पहले इस यात्रा में केवल बड़े बुजुर्ग लोग ही जाया करते थे और तब जब कोई बुजुर्ग चार धाम की यात्रा पर निकलता था, तो सारा गांव मिलकर उसे उन्हें विदा करता था। लोग उनसे आशीर्वाद लेते थे। गांव के सभी लोग अपने घरों से भेंट (रुपए पैसे) उन्हें देते और कहते थे कि लौट के आओ तो उन्हें मंदिर का प्रसाद अवश्य दें। तब यात्रा श्रद्धा , विश्वास और मर्यादा से जुड़ी थी। यात्रा के दौरान यात्री इस बात का ध्यान रखते थे कि उनसे कोई भूल न हो, कोई अपराध न हो, लेकिन आज अधिकतर यात्रियों में न श्रद्धा है और न ही  विश्वास । यदि श्रद्धा होती तो शिव के धाम को रील बनाने और नाचने की जगह न बनाते । यदि विश्वास होता तो जानते कि हर तीर्थ स्थल की कुछ अपनी मर्यादाएं होती हैं, जिनका स्वतः पालन करना जरूरी है । 

      आज से ढाई  तीन दशक पहले तक हिंदू जनमानस में बद्री केदार की यात्रा जीवन की अंतिम यात्रा मानी जाती थी । गृहस्थ धर्म निभा लेने के बाद की यह वो यात्रा थी कि मृत्यु भी हो जाए तो मोक्ष की प्राप्ति हो,पर आज जो लोग महज घुम्मकड़ी तथा वीडियो और रील बनाकर अपने लाइक्स और कमेंट्स बढ़ाने के लिए यात्रा कर रहे हैं ,वे उन यात्रियों के लिए भी परेशानी का सबब बनते हैं जो सच में श्रद्धा भाव के साथ दर्शन को निकले हैं ।

        पवित्र ज्योतिर्लिंग केदारनाथ जाने वाले सभी यात्रियों को तीर्थाटन और पर्यटन के अंतर को समझना चाहिए। यह कोई पर्यटन स्थल नहीं है और ना ही कोई पिकनिक स्पॉट कि आप वहां ढोल नगाड़ों के साथ पहुंच जाए जोर-जोर से वाद्य यंत्र बजाकर मंदिर परिसर में नृत्य करने लगे या फिर वहां जब चाहे आतिशबाजी करने लगे। केदारनाथ करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। हिमालय की इस अलौकिक भूमि पर तपस्वी और साधक अखंड शांति के लिए ध्यान लगाते हैं इसलिए यहां पर किसी भी प्रकार का शोर करना सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं पर अतिक्रमण है। साथ ही यह वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के नजदीक होने के कारण भी मान्य नहीं है। इसे ध्वनि प्रदूषण के लिहाज से भी देखा जाना चाहिए । 

      मंदिर के कपाट खुलते ही जितनी भीड़ इस बार पहुंची इतनी शायद ही पहले कभी रही होगी। अब सवाल यह उठता है कि लोग मई - जून के महीने में ही यहां क्यों आना चाहते हैं, जबकि यहां वर्ष के बाकी दिनों में मौसम ज्यादा अच्छा रहता है। जाने क्यों लोगों में यह धारणा बैठ गई है कि इन धामों की यात्रा गर्मियों में ही की जानी चाहिए। इसके चलते यात्रियों का सारा दबाव मई से लेकर जुलाई तक रहता है जबकि देखा जाए तो यात्रा के लिए सितंबर- अक्टूबर से बेहतर कोई और वक्त नहीं है।

          ऐसा माना जाता है कि उन महीनों में पहाड़ पर बहुत ठंड पड़ती है लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता उस समय मौसम पूरी तरह से साफ रहता है और ठंड भी ज्यादा नहीं होती है । पहाड़ का होने के नाते मेरी यही सलाह है कि यदि आपने इन्हीं दोनों महीनों में आने की जिद ना पाली हुई हो तो आप अपनी यात्रा को सितंबर अक्टूबर तक टाल दीजिए। आज की तुलना में उन महीनों में आपकी यात्रा कम खर्चीली, ज्यादा सुविधावाली  और पर्याप्त मानसिक सुकून देने वाली होगी ।

        एक सवाल यह भी है कि केदारनाथ की यात्रा को पिकनिक के रूप में लेने और शॉर्ट वीडियो और रील बनाने की यात्रा समझने वाले कितने लोगों को केदारनाथ का असल महात्म्य पता है । केदारनाथ कोई नाचने गाने की जगह नहीं है पर अफसोस है कि ऐसा हो रहा है। 

              भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ को स्कंद पुराण और शिव पुराण में केदारेश्वर भी कहा गया है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव गोत्र वध पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव के दर्शन हेतु यहां आए थे। पांडवों की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने महिष का रूप धारण किया लेकिन पांडवों ने उन्हें पहचान लिया ।

        पांडवों के छूते ही भगवान का महिष रुप पांच भागों में विखंडित हो गया । खंडित शरीर के भाग जहां-जहां गिरे वे सभी पंच केदार तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। कहते हैं केदारनाथ में शरीर का पृष्ठ भाग गिरा इसीलिए यहां मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग परंपरागत स्वरुप में न होकर एक टेढ़ी चट्टान के रूप में स्थित  है ।

      उच्च हिमालय पहाड़ी पर स्थित केदारनाथ भूकंपीय दृष्टि से एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है । यहां होने वाली कोई भी गतिविधि यहां के पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को प्रभावित करती है। हमें 2013 की आपदा को नहीं भूलना चाहिए जब मुख्य मंदिर को छोड़कर पूरे परिसर को नुकसान पहुंचा था। मुख्य मंदिर के पीछे स्थित अन्य सभी छोटे मंदिर और शंकराचार्य का समाधि स्थल पूरी तरह से मलबे में दब गए थे। ईश्वर करें ऐसी आपदा दोबारा ना आए। इसके लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को कुछ कड़े नियम बनाने होंगे। केदारनाथ एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इसकी गरिमा, सम्मान और मर्यादा को प्रतिष्ठित रखने के लिए इसे अति पर्यटन से बचाना जरूरी है । यह कोई मौज मस्ती और घूमने फिरने की जगह नहीं है। पर्यटकों की संख्या सीमित किए जाने की आवश्यकता है। सरकार प्रयास करती तो है, लेकिन अधिक जिम्मेदारी तो उन्ही लोगों की है जो यहां पहुंचते हैं।

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