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Bhopal मध्य प्रदेश: जंगल उजाड़ कर बाघ संरक्षण संभव नहीं Madhya Pradesh: Tiger conservation is not possible by destroying forests.

 


अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस विशेष-

Upgrade Jharkhand News.  29 जुलाई को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाती है। लेकिन मध्य प्रदेश में बाघ संरक्षण को  विकास परियोजनाओं और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से  उजाड़ा जा  रहा है। केन-बेतवा लिंक परियोजना, भोपाल का पश्चिमी बाईपास, विभिन्न सड़क और रेल परियोजनाएं तथा वन क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता भूमि कारोबार यह संकेत देते हैं कि विकास की वर्तमान दिशा पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश स्वयं को "टाइगर स्टेट" कहकर गौरवान्वित महसूस करता है। इसके लिए मैं सभी बाघ प्रेमियों को संरक्षण के प्रहरी के रूप में  शुभकामनाएं देता हूँ , लेकिन सरकार से मेरे कुछ सवाल हैं। सरकार जिस तरह का प्रचार करती हैं और सरकार बाघों की संख्या बढ़ने के आंकड़े प्रस्तुत करती है और संरक्षण की उपलब्धियों का श्रेय लेती है, उसके उलट अंदर की सच्चाइयां कुछ और हैं ।  एक गंभीर प्रश्न आज हर नागरिक को पूछना चाहिए,क्या केवल बाघों की संख्या बढ़ा देना ही संरक्षण है, या उनके जंगल, प्राकृतिक गलियारे और आवास बचाना भी उतना ही आवश्यक है? आवास को उजाड़ कर बाघ  संरक्षण नहीं हो सकता।


आज मध्य प्रदेश में बाघ संरक्षण को  विकास परियोजनाओं और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से  उजाड़ा जा  रहा है। कहना चाहिए सरकार खुले आम बाघ  आवासों को उजाड़ रही हैं।  केन-बेतवा लिंक परियोजना, भोपाल का पश्चिमी बाईपास, विभिन्न सड़क और रेल परियोजनाएं तथा वन क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता भूमि कारोबार यह संकेत देते हैं कि विकास की वर्तमान दिशा पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। केन-बेतवा परियोजना के नाम पर पन्ना टाइगर रिजर्व के महत्वपूर्ण हिस्से के डूबने की आशंका व्यक्त की गई है। लाखों पेड़ों की कटाई, हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र का नुकसान और बाघों सहित अनेक वन्यजीवों के आवास पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर वर्षों से विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की समिति ने केन बेसिन में अतिरिक्त जल  की  अवधरणा पर सवाल खड़े किये हैं।   कई स्वतंत्र पर्यावरण विशेषज्ञों ने परियोजना के विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए हैं। इनका उत्तर देने के बजाय सरकार ने उन्हें  औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित कर दिया। एक तरह से ये मामले की गंभीरता को समझे बिना नजरअंदाज करना है। भोपाल का पश्चिमी बाईपास एक और चिंताजनक उदाहरण है। यह परियोजना उस वन्यजीव गलियारे से जुड़ी है जिसे विशेषज्ञ शहरी बाघों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। इसी परियोजना को लेकर यह आरोप भी सामने आए हैं कि प्रस्तावित मार्ग के आसपास कुछ अधिकारियों द्वारा पहले जमीन खरीदी गई और बाद में परियोजना के कारण उसकी कीमतों में भारी वृद्धि हुई। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण केवल स्वतंत्र जांच ही कर सकती है। लेकिन जब इतने गंभीर आरोप सामने आए हों, तब सरकार की पहली जिम्मेदारी पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना होती है, न कि मौन धारण करना।


सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि जनता के मन में यह धारणा बनने लगे कि विकास परियोजनाओं के निर्णय पर्यावरणीय आवश्यकता से अधिक भूमि मूल्य बढ़ाने या निजी हितों से प्रभावित हैं, तो शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होती है। विकास का उद्देश्य कुछ लोगों की संपत्ति का मूल्य बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज का संतुलित और न्यायपूर्ण विकास होना चाहिए। सवाल केवल भ्रष्टाचार के आरोपों का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। यदि किसी परियोजना के कारण बाघ गलियारे प्रभावित होते हैं, तो विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? यदि संरेखण बदले जाते हैं, तो उनके कारण जनता के सामने क्यों नहीं रखे जाते? यदि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन हुआ है, तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में क्यों उपलब्ध नहीं होती? लोकतंत्र में पारदर्शिता विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। मध्य प्रदेश में पन्ना टाइगर रिजर्व को पुनर्जीवित करना संरक्षण की प्रेरक कहानी है तो दूसरी ओर वही सरकार ऐसी परियोजनाओं को बिना पर्याप्त पारदर्शिता और पर्यावरणीय सावधानी के आगे बढ़ाती है, जिनसे बाघों के आवास और प्राकृतिक गलियारे प्रभावित होने की आशंका है, तो यह विरोधाभास गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।


कुछ परियोजनाओं और उनसे जुड़ी पर्यावरणीय चिंताओं का सारांश मैं यहाँ दे रहा हूं -

केन-बेतवा लिंक परियोजना -  पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र के डूबने, लाखों पेड़ों की कटाई, बाघों के आवास के विखंडन तथा घड़ियाल और गिद्ध जैसे वन्यजीवों पर प्रभाव की आशंका है।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे (पश्चिमी कॉरिडोर)- यह परियोजना मध्य भारत के महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों से जुड़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि पर्याप्त वन्यजीव अनुकूल संरचनाएं न हों तो बाघों की आवाजाही बाधित हो सकती है और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

कान्हा-पेंच-बांधवगढ़-पन्ना टाइगर कॉरिडोर सड़क -  चार प्रमुख टाइगर रिजर्वों को जोड़ने वाली इस सड़क में वैज्ञानिक डिज़ाइन का अभाव होने पर बाघों के प्राकृतिक आवागमन में रुकावट और पर्यटन का अतिरिक्त दबाव बढ़ने की आशंका है।

राष्ट्रीय राजमार्ग 45 (हिरन–सिंदूर खंड) - नौरादेही अभ्यारण्य और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व से गुजरने वाले इस मार्ग पर पिछले दो वर्षों में 237 वन्यजीव-वाहन टक्कर और 94 वन्यजीवों की मौत दर्ज होने के कारण वन्यजीव सुरक्षा उपायों की चिंताजनक स्थिति के रूप में सामने आई है।

कटनी-सिंगरौली रेलवे लाइन  -  संजय-दुबरी टाइगर रिजर्व से गुजरने वाली इस रेल परियोजना पर वर्ष 2010 से अब तक 39 से अधिक वन्यजीवों की मौत दर्ज की गई है। इसलिए विशेषज्ञ इस रेलमार्ग के पुनर्संरेखण (Realignment) की मांग कर रहे हैं।  सरकार को यह भी समझना होगा कि बाघ संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। सड़क, रेल, सिंचाई, नगरीय विकास और राजस्व विभाग,सभी की समान जिम्मेदारी है कि विकास योजनाएं प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर तैयार हों। प्रशासनिक लापरवाही, समन्वय की कमी या निजी हितों के आरोपों के बीच प्रभावी संरक्षण संभव नहीं हो सकता।


विपक्ष के रूप में हमारी मांग स्पष्ट है। केन-बेतवा परियोजना, भोपाल पश्चिमी बाईपास तथा अन्य संवेदनशील परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों और भूमि सौदों से संबंधित सभी आरोपों की स्वतंत्र एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। जिन परियोजनाओं का संबंध बाघ गलियारों से है, उनके सभी वैज्ञानिक अध्ययन, संरेखण और निर्णय प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।


बाघ केवल जंगल की शान नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की जीवनरेखा हैं। यदि उनके जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे तो केवल बाघ ही नहीं, हमारी नदियां, जल स्रोत, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा। बाघों को बचाने के लिए जंगल बचाने होंगे, जंगल बचाने के लिए ईमानदार शासन चाहिए, और ईमानदार शासन का पहला आधार है पारदर्शिता और जवाबदेही। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर हमें केवल बाघों की संख्या नहीं गिननी चाहिए, बल्कि यह भी तय करना चाहिए कि विकास की हर परियोजना पारदर्शिता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और जनहित की कसौटी पर खरी उतरे। अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर बाघ संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता। (लेखक मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उमंग सिंघार



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