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Bhopal भगवान शिव को प्रिय है श्रावण मास Lord Shiva loves the month of Shravan.

 


Upgrade Jharkhand News.  शिव महापुराण में कहा गया है कि श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसी पवित्र महीने में माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था और उनसे विवाह का वरदान प्राप्त किया था। श्रावण में भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी होती है। श्रावण  की महिमा का उल्लेख हमारे शास्त्रों में भी मिलता है। श्रावण के महात्म्य का वर्णन करते हुए स्वयं भगवान शिव ने कहा है - "मासोत्तम मासे श्रावण मासे"। अर्थात सभी मासों में श्रावण मास सर्वोत्तम है। इस महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनतकुमारजी ने श्रावण की महिमा बताते हुए कहा है कि भगवान शिव के दाएं नेत्र में सूर्य विद्यमान है और सूर्य की राशि सिंह है, वहीं बाएं नेत्र में चंद्र का वास है और चंद्र की राशि कर्क है। जब सूर्य कर्क से सिंह राशि तक भ्रमण करते हैं तब यह दो संक्रांतियां अत्यंत पुण्यदायी होती हैं। यह पुण्यकाल श्रावण महीने में आता है, जिससे श्रावण का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही इस मास का महात्म्य श्रवण योग्य होने के कारण भी इसका नाम श्रावण पड़ा। श्रवण नक्षत्र के साथ योग होने से भी इसे श्रावण कहा गया, जिसके श्रवण मात्र से सिद्धियों की प्राप्ति होती है।


ऐसी मान्यता है कि इसी महीने में देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन किया, जिसमें से चौदह रत्न प्राप्त हुए। इसी मंथन से हलाहल विष भी निकला। हलाहल को ग्रहण करने के लिए कोई देवता तैयार नहीं हुआ। तब सभी देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और हलाहल को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठेश्वर कहलाए। कंठ की ज्वाला को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर गंगाजल अर्पित किया। तभी से भगवान शिव ने चंद्र को अपने शीश पर धारण किया और चंद्रमौलेश्वर कहलाए। चूंकि यह घटना श्रावण महीने में हुई, इसलिए तभी से इस महीने में शिवलिंग पर जल अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई ताकि महादेव को शीतलता मिले।


शिव पुराण में वर्णन है कि माता पार्वती ने श्रावण मास में मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग बनाकर  कठोर तप और पूजा की थी। उनकी इसी निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। तभी से श्रावण में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि श्रावण में एक बार पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करने से करोड़ों शिवलिंग पूजन का फल प्राप्त होता है। इसी कारण भक्त इस महीने में मंदिरों में या घरों में मिट्टी के शिवलिंग बनाकर जल, बिल्वपत्र और धतूरा अर्पित करते हैं। शिव महापुराण में  सोमवार व्रत की विशेष महिमा बताई गई है। कथा है कि एक निर्धन ब्राह्मण ने श्रावण के सोमवार का व्रत रखा और भगवान शिव की आराधना की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे धन, संतान और अंत में मोक्ष का वरदान दिया। इसीलिए आज भी श्रावण में स्त्री-पुरुष अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए  सोमवार का व्रत रखते हैं। इस व्रत में पूरे दिन निराहार रहकर शाम को शिव पूजा और कथा सुनने का विधान है।


श्रावण से पहले आने वाली आषाढ़ की देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु चार मास के लिए शेषशय्या पर विश्राम करने क्षीरसागर चले जाते हैं और पृथ्वी का भार भगवान शिव को सौंप देते हैं। चार मासों में पहला मास श्रावण ही है, इसलिए यह भगवान शिव को अधिक प्रिय है। वैसे तो पूरा श्रावण मास ही प्रिय है परंतु श्रावण सोमवार का विशेष महत्व है। इस दिन की आराधना से विशेष फल मिलता है। श्रावण के मंगलवार को  महादेव और माता पार्वती की मंगलागौरी पूजा का महत्व है। जो शनिदेव की साढ़ेसाती या दशा से परेशान हैं वे भी श्रावण में शिव आराधना से कष्ट कम कर सकते हैं, क्योंकि मान्यता है कि भगवान शिव शनिदेव के गुरु हैं और उन्होंने ही शनिदेव को दंडाधिकारी नियुक्त किया। श्रावण महीना चातुर्मास का पहला मास है और यहीं से भारत में वर्षा का आरंभ होता है। सावन के झूले डाले जाते हैं। वर्षा के कारण व्रत करने वाले भक्तों को भूख-प्यास कम लगती है। इसी महीने से साधु-संत और श्रद्धालु चार महीने का चातुर्मास व्रत आरंभ करते हैं। इस महीने भगवान शिव को जल, दूध, शहद, दही और शक्कर से पंचामृत स्नान करा कर बिल्वपत्र, धतूरा और आंकड़ा अर्पित किया जाता है। कमल और कनेर के फूल चढ़ाने से मनोकामना पूर्ण होने और दरिद्रता दूर होने की मान्यता भी है।


इस माह में भगवान शिव की आराधना के लिए मृत्युंजय महामंत्र का जाप भी किया जाता है - "ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम। उर्वारुकमिव बंधनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।" यह मंत्र असाध्य रोगों से भी मुक्ति दिलाता है। यदि कोई मंत्र न पढ़ सके तो "ऊँ नमः शिवाय" का जाप भी पर्याप्त है। भगवान शिव आशुतोष हैं, थोड़ी सी श्रद्धा से प्रसन्न हो जाते हैं। भस्मासुर को वरदान देने की कथा इसका प्रमाण है। भगवान शिव निराले हैं। वे भक्तों के दिए नाम को भी सहज स्वीकार कर लेते हैं। अगस्त्य ऋषि को ब्रह्म हत्या से मुक्त कर अगस्त्येश्वर कहलाए, राजा हरिश्चंद्र को ऋण से मुक्त कर ऋणमुक्तेश्वर कहलाए। वे अपने भक्त की हर मनोकामना शीघ्र पूर्ण करते हैं। बस जरूरत है श्रद्धा और भक्ति की। बिल्वपत्र और धतूरा जैसी सरल सामग्री से भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव की कृपा से जीव-जंतु भी अपना स्वभाव छोड़कर प्रेम से रहते हैं। शेर माता पार्वती का वाहन है, बैल भगवान शिव का वाहन है। गले में सर्प, गणेश के वाहन मूषक और कार्तिकेय के वाहन मयूर। ये सभी प्रकृति से विरोधी हैं परंतु महादेव के प्रभाव से मैत्री भाव से रहते हैं। श्रावण में शिव की भक्ति से मनुष्य को शांति, सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जल, बिल्वपत्र और श्रद्धा से प्रसन्न होने वाले भोलेनाथ सभी के कष्ट हरते हैं। आइए इस पवित्र मास में प्रेम, करुणा और एकता का संकल्प लें ताकि समाज में भी शिवत्व जागृत हो। अंजनी सक्सेना



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