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Bhopal आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में दिन दहाड़े डकैती Daylight robbery in modern medical system

 


Upgrade Jharkhand News.  जिस देश में मंदिर की घंटी से लेकर संसद की बहस तक मानवता की दुहाई दी जाती है, उसी देश में यदि जीवन-रक्षक दवा के मूल्य में दस गुना अंतर सामने आए तो स्पष्ट समझ में आ जाता है कि बीमार आदमी के सामने या तो बाजार बैठा है या मौत का सौदागर। 22 सितंबर, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक कैंसर-रोधी दवा का उदाहरण आया। लगभग 2,700 रुपये में उपलब्ध दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अंकित था। इस असाधारण अंतर पर न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए इसे मरीजों के साथ "दिनदहाड़े डकैती" जैसा बताया। यह केवल न्यायालय की टिप्पणी नहीं, उस परिवार की चीख की कानूनी प्रतिध्वनि है जो अस्पताल के बाहर खड़ा होकर अपनी जेब टटोलता है और भीतर भर्ती अपने परिजन की साँसें गिनता है। अस्पताल में भर्ती मरीज ग्राहक नहीं, मजबूर होता है। वह दुकान-दुकान घूमकर भाव नहीं पूछ सकता। वह यह नहीं कह सकता कि दवा महँगी है, दूसरी दुकान से ले आऊँगा। बीमारी उसे ऐसी जगह खड़ा कर देती है जहाँ मोल-भाव की ताकत बाजार के पास होती है और जीवन की विवशता मरीज के पास। निस्संदेह दवा का निर्माण महँगा हो सकता है। अनुसंधान, वितरण, भंडारण और अस्पताल की सेवाओं की लागत वास्तविक हो सकती है। उद्योग को उचित लाभ मिलना स्वाभाविक है। परंतु जब क्रय-मूल्य और मरीज से वसूले गए मूल्य के बीच असाधारण अंतर दिखे तो सवाल पूछना अपराध नहीं, सार्वजनिक हित का कर्तव्य है। क्योंकि बीमारी वह बाजार है जहाँ ग्राहक अपनी इच्छा से नहीं आता। वह डर कर आता है और भय सबसे महँगी मुद्रा है।


गरीब जब अस्पताल पहुँचता है तो उसके साथ केवल बीमारी नहीं आती, उसकी पूरी गृहस्थी आती है। माँ के कानों की बालियाँ, पत्नी की बचत, पिता की जमीन, बच्चे की पढ़ाई और वर्षों की जमा-पूँजी,सब उपचार की मेज पर रख दी जाती है। एक तरफ चिकित्सकीय पर्चा होता है, दूसरी तरफ घर का भविष्य और बीच में खड़ा होता है बिल। इतना बड़ा बिल कि कई बार बीमारी शरीर से पहले परिवार की अर्थव्यवस्था को मार देती है। भारत में औषधि मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है। किंतु संसद की स्थायी समिति ने 2026 में चिंता दर्ज की है कि गैर-अनुसूचित दवाओं का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण से बाहर है और इनके व्यापार-मार्जिन तथा शुरुआती मूल्य निर्धारण में अधिक प्रभावी निगरानी आवश्यक है। वास्तविकता यह है कि मरीज को वास्तविक लागत और अंतिम कीमत के बीच का अंतर पता ही नहीं होता। 2019 में 42 कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार-मार्जिन सीमा लागू होने के बाद 526 ब्रांडों के अधिकतम खुदरा मूल्य में औसतन लगभग 50 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई और अनुमानित वार्षिक बचत लगभग 984 करोड़ रुपये आँकी गई। जब नियमन से कीमत घट सकती है और मरीज का धन बच सकता है, तो व्यापक स्तर पर ऐसी व्यवस्था को सशक्त करने में कठिनाई कहाँ है? क्या आधुनिक चिकित्सा की सफलता का अर्थ यह है कि मशीनें मरीज की धड़कन बचा लें और बिल उसका परिवार डुबो दे? यदि उपचार बचाता है, पर उपचार का खर्च परिवार को तोड़ देता है, तो नीति की सफलता अधूरी है। यदि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं गरीबों के नाम पर बनी है तो उसका प्रत्येक रुपया भी गरीब के हित में दिखना चाहिए। सार्वजनिक धन से भुगतान वाली चिकित्सा में क्रय-मूल्य, आपूर्ति-मूल्य, मरीज के बिल और योजना से प्राप्त प्रतिपूर्ति के बीच डिजिटल पारदर्शिता क्यों न हो? प्रत्येक असामान्य मूल्य-अंतर स्वतः जाँच का संकेत क्यों न बने?


आज तकनीक के युग में यह असंभव नहीं है। एक दवा, एक उत्पाद पहचान संख्या, एक क्रय-मूल्य, एक विक्रय-मूल्य, एक मरीज, एक बिल,सब कुछ डिजिटल रूप से जोड़ा जा सकता है। दूसरी ओर, हर महँगी दवा को स्वतः लूट कहना और हर चिकित्सक को कमीशन से जोड़ देना भी न्यायसंगत नहीं होगा। चिकित्सा में वास्तविक लागत, अनुसंधान, जटिल उपचार और विशेषज्ञ सेवाएँ होती हैं। किंतु जहाँ असामान्य मूल्य-अंतर, अनुचित बंधन, अपारदर्शी बिलिंग या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के संकेत हों, वहाँ जाँच इतनी कठोर होनी चाहिए कि किसी भी प्रभावशाली संस्था को मरीज की विवशता पर व्यापार करने का अवसर न मिले। यहां मरीज सबसे कमजोर पक्ष है और सभ्य समाज की पहचान इसी से होती है कि वह सबसे कमजोर की रक्षा कितनी करता है। अगर दवा उद्योग को लाभ चाहिए तो मरीज को जीवन,अस्पताल को राजस्व चाहिए तो मरीज को उपचार। सरकार को व्यवस्था चाहिए तो मरीज को भरोसा। इन तीनों के बीच यदि मरीज और उसका परिवार कुचल गया तो स्वास्थ्य व्यवस्था केवल उद्योग रह जाएगी, सेवा नहीं और वास्तविकता में आज यही हो रहा है।


अब समय है कि चिकित्सा क्षेत्र में केवल नई मशीनों की नहीं, नई नैतिकता की भी स्थापना हो। दवा की कीमत पारदर्शी हो, अस्पताल की खरीद पारदर्शी हो, मरीज की बिलिंग पारदर्शी हो, सरकारी भुगतान पारदर्शी हो। चिकित्सकीय पर्चे में सक्रिय औषधीय घटक का नाम स्पष्ट हो। जहाँ कानून अनुमति दे, वहाँ मरीज को वैकल्पिक स्रोत से दवा खरीदने की स्वतंत्रता मिले और असामान्य मूल्य-अंतर पर स्वतः जाँच की व्यवस्था हो। क्योंकि गरीब आदमी अस्पताल में अपना जीवन लेकर जाता है, अपनी पूरी जिंदगी बेचने नहीं। अब, जब न्यायालय ने सवाल उठा दिया है तो व्यवस्था को उत्तर देना है। यह उत्तर भाषणों से नहीं मिलेगा। यह तब मिलेगा जब अस्पताल में दवा की कीमत मरीज की मजबूरी देखकर नहीं, न्यायसंगत और पारदर्शी व्यवस्था देखकर तय होगी और यदि यह सिद्ध हो गया कि किसी की मजबूरी ही किसी दूसरे की कमाई का सबसे बड़ा साधन बन गई है, तो वह केवल चिकित्सा की नहीं, मानवता की हार होगी। क्योंकि अस्पताल जीवन का मंदिर तभी है, जब वहाँ मरीज की साँस सबसे महँगी चीज हो उसकी मजबूरी नहीं। डॉ.दीपक गोस्वामी



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