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सुनील कुमार दे कि अमर कीर्ति है पुस्तक महातीर्थ मुक्तेस्वर धाम हरिणा : वीथिका मंडल

हाता। सुनील कुमार दे केवल पोटका और पूर्वी सिंहभूम का ही नहीं, बल्कि पूरे झरखण्ड के एक प्रसिद्ध और प्रतिष्टित कवि और लेखक हैं।इसके अलावे एक समाज सेवक भी है।सुनील कुमार दे बंगला और हिंदी दोनों भाषा में लिखते हैं, जिनकी अभी तक कुल 34 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिसमें बंगला में 26 और हिंदी में 8 है।सुनील कुमार दे कविता,कहानी, नाटक,संगीत, लेख, भ्रमण कहानी तथा इतिहास पुस्तक भी लिखते हैं।उनकी लिखनी से नीति कथा,देश भक्ति,आध्यात्मिकता,भक्ति और ज्ञान की कथा,समाज निर्माण और चरित्र निर्माण की आवाज निकलती है।बिगत एक वर्ष में श्री दे ने तीन महत्वपूर्ण इतिहास तथा धार्मिक पुस्तके लिख डाली यथा,कापड़ गादी घा टेर रुंकिनी मा,युगपुरुष विनय दास बाबाजी और महातीर्थ मुक्तेस्वर धाम हरिणा। यह तीनों पुस्तक बंगला में लिखी गई है जो काफी लोकप्रिय हो चुके हैं।

   सुनील कुमार दे द्वारा रचित,,महातीर्थ मुक्तेस्वर धाम हरिणा,,का प्रकाशन बिगत 14 अक्टूबर को मुक्तेस्वर धाम हरिणा में मुक्तेस्वर धाम आश्रम समिति की ओर से पोटका के विधायक संजीव सरदार के करकमलों द्वारा हुआ है।यह पुस्तक झारखंड साहित्य संस्कृति परिषद नुआग्राम द्वारा प्रकाशित तथा सनफ्लॉवर प्रिंटर्स द्वारा मुद्रित की गई है जिसकी सहयोग राशि 200रुपये है।पुस्तक का कवर पेज काफी आकर्षणीय है।पुस्तक की छपाई और कागज भी स्तरीय है।

  सुनील कुमार दे ने,,महातीर्थ मुक्तेस्वर धाम हरिणा,,में शिव जी की महिमा का वर्णन किया है।मुक्तेस्वर धाम में बाबा का आविर्भाव की कथा करीब 400 साल पुरानी है तथा 1856 साल से बाबा की पूजा नियमित रूप से हो रही हैं यह लोक कथा प्रचलित है।पुस्तक में मुझे भूमिका लिखने का मौका मिला है।इसके अलावे पुस्तक में अपना अपना महत्वपूर्ण विचार और शुभकामनाएं शंकर चंद्र गोप,कमल कांति घोष,सुधांशु शेखर मिश्र,कृष्ण गोप,भबतारण मंडल,डॉक्टर शिशिर मंडल,उज्ज्वल कुमार मंडल,रघु नंदन बनर्जी,आशुतोष मंडल,मुकुल मंडल,कमल कांत नायक,विद्याधर साहू,जय हरि सिंह मुंडा,अशोक कुमार नायक, डॉक्टर विकास चंद्र भकत और विश्वामित्र खंडायत ने दिया है।

पुस्तक में उपक्रमनिका,मुक्तेस्वर धाम का इतिहास, शिवजी की कब से पूजा शुरू हुई,मुक्तेस्वर धाम में पुजारियों का विवरण, मुक्तेस्वर धाम में साधुओं का विवरण,मुक्तेस्वर धाम में क्या क्या मंदिर है, मुक्तेस्वर धाम में क्या क्या पूजा,उत्सव और कार्यक्रम होता है, यातायात का विवरण,उपसंहार दिया गया है।

  इतिहास लिखना बहुत कठिन और जटिल काम है जिसमें कुछ गलती और कुछ कमी हो सकती है यह बात लेखक भी स्वीकार किया है।इसके लिए अगले संस्करण में संयोजन और परिमार्जन किया जा सकता  हैं यह बात लेखक ने कही है।इस साहसिक कार्य करने के लिए लेखक को बधाई देना चाहिए।कुल मिलाकर सुनील कुमार दे का यह पुस्तक लोगों को काफी पसंद आ रहा है और पाठक इसके लिए लेखक को धन्यवाद भी दे रहे हैं।मैं भी इस महान कार्य के लिए लेखक सुनील कुमार दे को धन्यवाद दे रही हूं और आभार प्रकट कर रही हूं।

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