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Bhopal मकर संक्रांति पर आस्था, स्मृति और जीवनदायिनी बेतवा नदी में डुबकी Faith, memory and a dip in the life-giving Betwa River on Makar Sankranti

 


Upgrade Jharkhand News. मकर संक्रांति भारतीय जीवन परंपरा का ऐसा पर्व है, जो सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-साथ प्रकृति, जल और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव भी जगाता है। नदियों में स्नान की परंपरा केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। मेरे जीवन में मकर संक्रांति का अर्थ सदैव पुण्य सलिला माँ बेतवा में डुबकी रहा है। एक ऐसी डुबकी, जिसमें श्रद्धा, स्मृतियाँ और जीवन मूल्य एक साथ प्रवाहित होते हैं।      मैंने बचपन से देखा और गहराई से महसूस किया कि मेरे पूज्य पिताजी श्री दिनेश चंद्र वर्मा की बेतवा नदी में अपार आस्था थी। वे मन से बेतवा को विदिशा की जीवनदायिनी माँ मानते थे। उनके लिए बेतवा केवल जलधारा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत थी। वे अक्सर कहा करते थे कि नगर तभी जीवित रहता है, जब उसकी नदी जीवित रहती है। बेतवा तट पर स्थित चरण तीर्थ, जहाँ भगवान राम के चरण विराजमान हैं, उनके लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र था। इसी तरह त्रिवेणी पर स्थित वह विलक्षण मंदिर, जहाँ भगवान राम और लक्ष्मण तो हैं, किंतु माँ सीता नहीं, उन्हें भारतीय धार्मिक परंपरा की अद्भुत विविधता का उदाहरण लगता था। देश में यह संभवतः एकमात्र ऐसा मंदिर है, और पिताजी इसे आस्था से अधिक चिंतन का स्थल मानते थे। इन दोनों तीर्थों के साथ-साथ उनकी गहरी आस्था बड़ वाले घाट पर खुले में विराजे भगवान गणेश जी और सरिए वाले हनुमानजी में भी थी जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।


मकर संक्रांति के दिन वे प्रायः प्रातःकाल ही बड़ वाले घाट पहुँच जाते और मुझे भी अपने साथ ले जाते। ठंडी हवा, हल्का कोहरा और उगते सूर्य की सुनहरी किरणों के बीच माँ बेतवा में स्नान करना एक अविस्मरणीय अनुभव होता था। वर्ष 2000 तक यह क्रम चलता रहा। पिताजी प्रायः तैरते हुए नदी के भीतर कुछ दूर तक चले जाते, मानो माँ बेतवा से संवाद कर रहे हों। वह दृश्य आज भी स्मृतियों में जीवंत है। माँ बेतवा के प्रति उनकी आस्था केवल भावनात्मक नहीं थी, बल्कि लेखन और सार्वजनिक चेतना के रूप में भी प्रकट हुई। उन्होंने बेतवा नदी से जुड़े विषयों पर अपने निरंतर, निर्भीक और तथ्यपूर्ण लेखन किया। नदी की धार्मिक महत्ता, सांस्कृतिक पहचान और उसके संरक्षण की आवश्यकता को उन्होंने समाज और प्रशासन के समक्ष बार-बार उठाया। देश की प्रख्यात पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उनके लेख ‘बिन सीता के राम’ और ‘चरण तीर्थ’ प्रकाशित हुए, जिनमें बेतवा तट की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विशिष्टता को गंभीरता से प्रस्तुत किया गया।


जब बेतवा में जहरीला और दूषित पानी छोड़े जाने का मामला सामने आया, तो उन्होंने सोम डिस्टलरी के विरुद्ध भी  खुलकर लिखा। इसी स्पष्ट और निर्भीक लेखन के कारण उनके विदिशा के तत्कालीन कलेक्टरों से कई बार विवाद हुए। किंतु उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। जो कलेक्टर प्रशासनिक चुप्पी या लापरवाही के कारण बेतवा को क्षति पहुँचने देते थे, उनकी पोल खोलने में उन्होंने जरा भी हिचक नहीं दिखाई। उनके लिए यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि माँ बेतवा के प्रति कर्तव्य था। आज जब मकर संक्रांति आती है और मैं माँ बेतवा के तट पर खड़ा होता हूँ, तो यह केवल स्नान का अवसर नहीं रह जाता। यह स्मृतियों में उतरने और संकल्प लेने का क्षण बन जाता है। पिताजी की आस्था, उनका साहस और उनका निर्भीक लेखन सब कुछ मानो बेतवा की लहरों में आज भी प्रवाहित हो रहा है। माँ बेतवा केवल एक नदी नहीं, बल्कि संस्कृति, संघर्ष और संकल्प की धारा है। मकर संक्रांति पर उसमें ली गई डुबकी मुझे यह याद दिलाती है कि नदियों को बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और भविष्य दोनों की रक्षा है। यही मेरे पिताजी की विरासत है। पवन वर्मा



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