Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal भगवान ऋषभदेव: सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के प्रवर्तक Lord Rishabhdev: The originator of right view, right knowledge and right conduct

 


Upgrade Jharkhand News.  जनसाधारण में यह भ्रांति है कि जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर थे बकि जैन धर्म में कुल मिलाकर 24 तीर्थंकर हुए हैं जिनमें प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। जिन्होंने जैन धर्म को प्रारंभ किया और भगवान महावीर अंतिम 24 वें तीर्थंकर थे। अयोध्या नगरी में करोड़ों वर्ष पूर्व महाराजा नाभिराय का शासन था। उनकी धर्मपत्नी महारानी मरुदेवी थी। महारानी मरुदेवी के गर्भ से चैत्र कृष्ण नवमी को सुबह एक बालक ऋषभनाथ का जन्म हुआ। बालक ऋषभ के युवा होने पर उनका विवाह कच्छ और महाकच्छ की दो बहनों यशस्वती (नंदा) और सुनंदा के साथ कर दिया गया। रानी यशस्वती से भरत आदि सौ पुत्र और एक पुत्री ब्राह्मी हुई तो रानी सुनंदा से एक पुत्र बाहुबली और एक पुत्री सुंदरी हुई। ऋषभदेव ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान दिया तो सुंदरी को अंक विद्या का ज्ञान दिया। ब्राह्मी लिपि आज भी प्राचीनतम है। सभी पुत्रों को शस्त्र और शास्त्रों का ज्ञान दिया और प्रजा पालन करना सिखाया। यह वह समय था जब भोगभूमि का काल पूर्ण होकर कर्मभूमि का काल प्रारंभ हो गया था। भोगभूमि में दस  कल्पवृक्ष होते थे जो मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे। मनुष्य को कोई काम नहीं करना पड़ता था, धीरे-धीरे काल के प्रभाव से यह कल्पवृक्ष लुप्त होते गए और मनुष्य के सामने भूख प्यास ,गर्मी सर्दी और बीमारियों की समस्याएं आने लगी। तब प्रजा अपने राजा नाभिराय के पास गई और उपाय पूछा तो राजा ने प्रजा को युवराज ऋषभदेव के पास भेज दिया।


भगवान ऋषभदेव या भगवान आदिनाथ ने संसारी रहते हुए प्रजाजनों को शस्त्र ,लेखनी , खेती,विद्या ,व्यापार एवं शिल्प इन छह कार्यों को करना सिखलाया। इन्हें असी ,मसी, कृषि, विद्या,वाणिज्य,शिल्प, षटकर्म कहा गया। उन्होंने जनता को इन छह कार्य के द्वारा आजीविका पैदा करने के उपदेश दिए इसीलिए वे युगकर्ता और सृष्टि के आदि ब्रह्मा कहलाए। इस रचना के द्वारा ऋषभदेव ने प्रजा का पालन किया  इसलिए उन्हें प्रजापति भी कहा गया। राजा नाभि राय ने कुछ समय पश्चात राज सिंहासन ऋषभदेव को सौंप दिया और खुद तपस्या करने के लिए वन में चले गए। राजा ऋषभदेव ने प्रजा को योग एवं क्षेम  के नियम ( नवीन वस्तु की प्राप्ति तथा प्राप्त वस्तु की रक्षा) बताएं । गन्ने के रस का उपयोग करना बताया। खेती के लिए बैल का प्रयोग करना सिखाया इसीलिए ऋषभनाथ को वृषभनाथ भी कहा जाता है। एक बार जब महाराज ऋषभदेव के जन्मदिन का उत्सव मनाया जा रहा था। स्वर्ग की अप्सराएँ नृत्य कर रही थी। उनमें एक मुख्य अप्सरा नीलांजना नृत्य करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो गई क्योंकि उसकी आयु पूर्ण हो गई थी। यह देखकर राजा ऋषभदेव को वैराग्य हो गया और उन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर स्वयं दीक्षा ले ली। अयोध्या से दूर सिद्धार्थ नामक वन में पवित्र शिला पर विराजकर छह माह का मौन लेकर उपवास और तपस्या की। जब छह माह का ध्यान योग समाप्त हुआ तो वे आहार के लिए निकल पड़े । चलते-चलते छह माह बाद  हस्तिनापुर में पहुंचे। वहां के राजा सोमप्रभ और भाई श्रेयांश कुमार ने महाराज को प्रथम आहारदान गन्ने के रस का दिया। भगवान ने दोनों हाथों की अंजलि बनाकर खड़े रहकर उसमें इक्षा रस का आहार लिया और तभी से आज तक जैन मुनियों द्वारा खड़े होकर अपनी अंजलि में लेकर आहार करने की परंपरा चली आ रही है। वैशाख शुक्ल तृतीया के इसी दिन को अक्षय तृतीया कहते हैं। इस समय से ही आर्यखंड में दान की प्रथा प्रारंभ हुई।


ऋषभदेव ने एक हजार वर्षो तक कठोर तपस्या की, इसके बाद इन्हें फाल्गुन कृष्ण एकादशी को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। इन्होंने अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय पाई। जिससे यह जिन कहलाए। इन्होंने जो मार्ग बताया उसे जैन धर्म कहा जाने लगा और तभी से जैन धर्म का प्रारंभ हुआ। भरत के लघु भ्राता वृषभसेन को समोसरण में वैराग्य हुआ और उन्होंने भी मुनि दीक्षा धारण की और भगवान के प्रथम गणधर हुए। ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी देवी दीक्षित होकर प्रथम अर्जिका बनी और अर्जिका संघ की गणिनी प्रमुख बनी। दूसरी पुत्री सुंदरी भी दीक्षा लेकर अर्जिका बन गयी। सम्राट भारत ने अपने परिवार सहित भगवान की वंदना की। जब भरत ने उनसे उपदेश देने को कहा तो आपने बताया जीव आत्मस्वरूप है,वह संसारी है और संसार को छोड़कर मुक्ति भी प्राप्त कर सकता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए उसे रत्नत्रय का मार्ग अपनाना होगा। रत्नत्रय से आशय है सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र। सम्यक दर्शन का अर्थ देव ,शास्त्र ,गुरु का ज्ञान प्राप्त करना है और यह मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है। पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित करने वाला और अज्ञान को नाश करने वाला सम्यक ज्ञान कहलाता है। समता भाव धारण कर निज रूप में विचरण ऐसे लक्षण को सम्यक चरित्र कहा जाता है। सम्यक दर्शन के बिना सम्यक ज्ञान और चरित्र को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इन तीनों को मिलाकर ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। आज भी जैन धर्म के सभी मुनि ,आचार्य अपने उपदेशों में सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र की चर्चा करते हैं।


जब भगवान ऋषभदेव या भगवान आदिनाथ के मोक्ष गमन में चौदह दिन शेष रह गए तब पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन वे कैलाश पर्वत पर जाकर योग  में लीन हो गए। भगवान की दिव्य ध्वनि रुक गई। माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान ऋषभदेव पूर्वमुख से अनेक मुनियों सहित विराजमान हुए और तीसरे शुक्ल अयोगी हो गए। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने कैलाशगिरी से अशरीरी सिद्ध पद प्राप्त किया। आत्म सुख में तल्लीन रूप में भगवान वहां आज भी विराजमान है ऐसी मान्यता है। भगवान का मोक्ष जानकर इंद्रगणों ने और चक्रवर्ती भरत  ने भगवान के मोक्ष निर्वाण कल्याणक का उत्सव मनाया। भगवान ऋषभदेव के मोक्ष/निर्वाण कल्याणक के अवसर पर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सारे देश में जैन समाज के लोग मंदिरों में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का नवन करते हैं। पूजा पाठ के साथ दीप जलाकर भगवान का मोक्ष निर्वाण कल्याणक धूमधाम से मनाते हैं। (लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक हैं) अतिवीर जैन "पराग"



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.