प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि गांव मजबूत होंगे, तभी देश आगे बढ़ेगा। उसी सोच से जन्मा यह अधिनियम अब राज्यों के माध्यम से साकार होना है। मध्यप्रदेश में मोहन यादव सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए संकेत दे दिए हैं कि कानून का पालन गांव-गांव में कराया जाएगा। सरकार के स्तर पर विभागीय निर्देश, अधिकारियों की जवाबदेही और समयबद्ध कार्ययोजना पर काम शुरू हो चुका है। इससे लग रहा है कि सरकार इस अधिनियम को बोझ नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देख रही है। एक ऐसा अवसर, जिससे ग्रामीण मजदूरों को स्थायित्व में बदला जा सके। इस अधिनियम को लागू कराने में केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि सरकार के मंत्री और प्रदेश भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी पूरी ताकत से जुटने की तैयारी में है। मंत्रियों को अपने-अपने प्रभार वाले जिलों में निगरानी और संवाद की जिम्मेदारी दी जा रही है। संगठन स्तर पर मंडल से लेकर जिला इकाईयों तक कार्यकर्ताओं को योजना की जानकारी देने और लाभार्थियों तक पहुंच बनाने का काम सौंपा जाएगा।
यह केवल सरकारी योजना का प्रचार नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि कहीं भी कानून के पालन में ढिलाई न हो। सरकार और संगठन का यह साझा प्रयास बताता है कि मोहन यादव नेतृत्व इस अधिनियम को प्रशासनिक औपचारिकता तक सीमित नहीं रखना चाहता। मध्यप्रदेश में ग्रामीण रोजगार को लेकर पहले भी कई योजनाएं आईं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती हमेशा क्रियान्वयन की रही। भुगतान में देरी, काम की उपलब्धता और शिकायतों की अनदेखी, इन मुद्दों ने योजनाओं की साख को कमजोर किया। ‘जी राम जी’ के साथ सरकार यह संदेश देना चाहती है कि अब ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान हैं कि समय पर काम न मिलने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देना होगा। इसका अर्थ यह है कि प्रशासनिक ढिलाई का सीधा असर सरकार की साख पर पड़ेगा। मोहन यादव सरकार इसी दबाव को अपनी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
इस कानून का प्रभाव केवल मजदूरी तक सीमित नहीं है। गांव में जब यह भरोसा बनता है कि काम अधिकार है और सरकार उसके पीछे खड़ी है, तो सामाजिक माहौल बदलता है। पलायन पर असर पड़ता है, खेती और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है और ग्रामीण जीवन में स्थायित्व आता है। सरकार की सक्रियता यह संकेत देती है कि वह इस भरोसे को प्रशासनिक जिम्मेदारी के रूप में देख रही है। यही वजह है कि संगठन और सरकार दोनों स्तर पर लगातार संवाद और निगरानी पर जोर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार यह भी जानती है कि इतनी बड़ी योजना में पारदर्शिता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। काम की निगरानी, भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था और शिकायतों के समाधान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे सरकार के सामने एक साफ तस्वीर होगी। कहां काम हुआ, किसे मिला और कहां कमी रह गई। यह पारदर्शिता सरकार के लिए राहत भी है और दबाव भी क्योंकि अब हर चूक सामने होगी और उसका जवाब देना पड़ेगा। पवन वर्मा

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