Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal संतान की मंगलकामना और भगवान गणेश की आराधना का पर्व संकष्टी चतुर्थी Sankashti Chaturthi is a festival dedicated to the well-being of children and the worship of Lord Ganesha.

 


Upgrade Jharkhand News. भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल तिथियों तक सीमित नहीं होते, वे आस्था, परंपरा और लोकजीवन की निरंतरता के प्रतीक होते हैं। नववर्ष के आरंभ में ही आने वाला संकष्टी चतुर्थी का पर्व इसी परंपरा का सजीव उदाहरण है। साल 2026 का पहला प्रमुख हिंदू पर्व संकष्टी चतुर्थी माना जा रहा है, जो विशेष रूप से मातृत्व, संतान की मंगलकामना और भगवान गणेश की आराधना से जुड़ा हुआ है। यह पर्व माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है और इसे संकटा चतुर्थी, तिलकुटा चौथ,सकट चौथ तथा माघी चौथ जैसे नामों से भी जाना जाता है। सकट चौथ का मुख्य संबंध भगवान गणेश से है, जिन्हें विघ्नहर्ता कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक गणेश पूजन करने से जीवन के सभी कष्ट, बाधाएं और संकट दूर होते हैं। विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना लेकर यह व्रत करती हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा और नियमबद्धता के साथ मनाया जाता है, हालांकि इसके स्वरूप में स्थानीय परंपराओं के अनुसार कुछ भिन्नता भी देखने को मिलती है।


पौराणिक कथाओं के अनुसार संकट चौथ का संबंध भगवान गणेश के जन्म और उनके द्वारा संकटों के नाश से जुड़ा हुआ है। एक कथा के अनुसार एक समय देवताओं पर भारी संकट आया था और सभी देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। गणेश जी ने अपने भक्तों की पुकार सुनकर उस संकट का नाश किया। तभी से यह विश्वास प्रचलित हुआ कि माघ मास की कृष्ण चतुर्थी को गणेश पूजन करने से सकट अर्थात संकट दूर हो जाते हैं। इसी कारण इस चतुर्थी को सकट चौथ कहा गया। सकट चौथ का व्रत मुख्यतः महिलाएं रखती हैं, लेकिन कई स्थानों पर पुरुष भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं। व्रत की प्रक्रिया सूर्योदय से आरंभ होती है। व्रती दिन भर उपवास रखते हैं और संध्या के समय चंद्रमा के दर्शन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। इस व्रत की एक विशेषता यह है कि इसमें चंद्र दर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। कई स्थानों पर महिलाएं चंद्रमा को दूध, जल और तिल अर्पित करती हैं तथा संतान के लिए प्रार्थना करती हैं।


सकट चौथ में तिल का विशेष महत्व होता है। तिल से बने व्यंजन जैसे तिलकुट, तिल के लड्डू, तिल की मिठाइयां और तिल से बनी खीर का भोग भगवान गणेश को अर्पित किया जाता है। माघ मास में तिल का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी माना गया है। यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शीत ऋतु में आवश्यक ऊष्मा बनाए रखने में सहायक होता है। इस प्रकार सकट चौथ धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकजीवन और ऋतुचर्या से भी जुड़ा हुआ पर्व है। पूजन विधि में प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के पूजा स्थल पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। गणेश जी को दूर्वा, मोदक, तिल और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। गणेश चालीसा, गणेश स्तोत्र और व्रत कथा का पाठ किया जाता है। शाम के समय चंद्रमा निकलने पर खुले आकाश में जाकर चंद्र दर्शन किया जाता है और अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।


साल 2026 में सकट चौथ का पर्व नए वर्ष की शुरुआत में आने के कारण विशेष महत्व रखता है। लोग इसे शुभ संकेत मानते हैं कि वर्ष का आरंभ ही विघ्नहर्ता गणेश के पूजन से हो रहा है। यह विश्वास किया जाता है कि यदि वर्ष के पहले पर्व पर गणेश जी की आराधना की जाए तो पूरे वर्ष कार्यों में सफलता, परिवार में सुख-शांति और जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है। इसी कारण कई परिवार इस दिन विशेष रूप से घर की स्वच्छता, पूजा और सामूहिक प्रार्थना पर ध्यान देते हैं। आधुनिक समय में भी सकट चौथ की परंपरा जीवंत बनी हुई है। हालांकि जीवनशैली में बदलाव आया है, फिर भी माताओं की आस्था और संतान के प्रति उनका स्नेह इस व्रत को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाए हुए है। शहरों में रहने वाली महिलाएं भी समय निकालकर व्रत रखती हैं, ऑनलाइन व्रत कथाएं सुनती हैं और सामूहिक रूप से चंद्र दर्शन करती हैं। सोशल माध्यमों के जरिए भी लोग एक-दूसरे को सकट चौथ की शुभकामनाएं देते हैं, जिससे परंपरा नए रूप में आगे बढ़ रही है।


सकट चौथ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला पर्व भी है। इस दिन घरों में एक साथ पूजा होती है, प्रसाद बांटा जाता है और बच्चों को अपनी संस्कृति और परंपराओं के बारे में बताया जाता है। यह पर्व मातृत्व के त्याग, धैर्य और प्रेम का प्रतीक है, जहां मां अपने सुख को त्याग कर संतान की मंगलकामना करती है। अंततः कहा जा सकता है कि साल 2026 का पहला त्यौहार सकट चौथ आस्था, परंपरा और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश लेकर आता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन में चाहे कितने ही संकट क्यों न हों, सच्ची श्रद्धा और विश्वास से उनका समाधान संभव है। भगवान गणेश की आराधना के साथ जब वर्ष का आरंभ होता है, तो मन में यह विश्वास और गहरा हो जाता है कि आने वाला समय शुभ, सफल और सुखमय होगा। सकट चौथ इसी आशा और विश्वास का पर्व है, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा को उजागर करता है। विजय कुमार शर्मा



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.