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Bhopal दृष्टिकोण : राजनीतिक शुचिता और कानून का सदुपयोग Viewpoint: Political correctness and the proper application of law

 


Upgrade Jharkhand News. सत्ता अगर चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकती, वह चाहे तो भू माफियाओं के साम्राज्य को चंद मिनटों में ध्वस्त कर सकती है। भ्रष्टाचारी कार्यपालिका के भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों को मात्र दो या पांच हजार रुपये रिश्वत लेने पर जेल के सींखचों में बंद कर सकती है, न चाहे तो लाखों रुपये का कमीशन खाकर सरकार को बदनाम करने वाले भ्रष्टाचार के अजगरों को देखकर भी अपनी आँखें बंद कर सकती है। बात केवल राजनीतिक शुचिता एवं कानून के सदुपयोग के संकल्प की है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरा नगर में सेना के मेजर बिपिन चंद्र भट्ट के उत्तराधिकारियों ने स्वप्न में भी कल्पना न की होगी, कि उनके पिता के निधन के लगभग बत्तीस वर्ष बाद किसी मुख्यमंत्री के कठोर रुख के चलते उनका मकान दबंग संपत्ति माफिया से मुक्त होकर उन्हें मिल जाएगा, किन्तु ऐसा हुआ, मुख्यमंत्री से शिकायत करने के चौबीस घंटे के भीतर ही कार्यवाही हो गई। सुशासन का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है। यह एक उदाहरण मात्र है। उत्तर प्रदेश में भूमाफिया एवं अराजक तत्वों में मुख्यमंत्री का खौफ कायम है। आम आदमी यह जानता भी है, कार्यपालिका भी समझती है, किन्तु अपनी भ्रष्ट हरकतों से बाज नहीं आती। 



राजस्व विभाग में कभी भूमि की पैमाइश के नाम पर, कभी नाम की त्रुटि दूर करने के नाम पर पत्रावलियां लंबित होकर कभी लेखपाल, कभी कानूनगो कभी किसी अन्य अधिकारी के इर्द गिर्द भटकती रहती हैं, जिनके निस्तारण हेतु खेल किया जाता रहता है। ऐसा नहीं है, कि भ्रष्ट कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती, कार्रवाई होती है, मगर किसी को सबक नहीं मिलता। भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने में असमर्थ रहता है। समस्या यह है कि आम आदमी की पहुँच मुख्यमंत्री तक होती ही नहीं। मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायत पर भी समय से समाधान नहीं होता। अधिकारीगण लीपापोती अधिक करते हैं। ऐसी स्थिति केवल उत्तर प्रदेश में नहीं है। पूरे देश का यही हाल है।  सरकार अपनी सुदृढ़ छवि निर्मित करने के लिए सजग रहती है, किन्तु उसके अधीन भ्रष्ट विधायक और मंत्री प्रशासन को अपने इशारे में चलाने के प्रयास में जन समस्याओं के समाधान अवरोध उत्पन्न करते हैं। आवश्यकता बिना किसी दवाब के कठोर निर्णय लेने की है। सेना के अधिकारी के परिवार को तीस बरस तक अपनी संपत्ति को वापस पाने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा होगा, यह तो वही परिवार जानता है, मगर इतना अवश्य है, कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को यदि सत्ता का साथ मिले, तो उसका सुखद परिणाम आना सुनिश्चित होता ही है। डॉ. सुधाकर आशावादी



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