Upgrade Jharkhand News. फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। वे न केवल स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष थे, बल्कि एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने राष्ट्र की सेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाया। 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कुर्ग (वर्तमान कोडागु) जिले में शनिवारसांते गांव में जन्मे करिअप्पा एक कुर्ग परिवार से थे। कुर्ग समुदाय अपनी सैन्य परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। करिअप्पा की प्रारंभिक शिक्षा मद्रास (अब चेन्नई) में हुई। उनमें बचपन से ही अनुशासन और देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी।
सैन्य करियर की शुरुआत -1918 में करिअप्पा ने ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होकर अपने सैन्य करियर की शुरुआत की। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) में सेवा की। उनकी वीरता, रणनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें जल्द ही अधिकारियों के बीच विशिष्ट पहचान दिलाई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान करिअप्पा ने बर्मा अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विभिन्न मोर्चों पर अपनी सूझबूझ और साहस का परिचय दिया। युद्ध के अनुभव ने उन्हें एक परिपक्व और दूरदर्शी सैन्य अधिकारी बनाया।
स्वतंत्रता और कश्मीर युद्ध -15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, करिअप्पा सेना में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में तैनात थे। उसी वर्ष पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया। इस संकटकाल में करिअप्पा ने पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। कश्मीर युद्ध में उनकी रणनीतिक योजना और नेतृत्व ने भारतीय सेना को निर्णायक सफलता दिलाई। उन्होंने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और कठिन परिस्थितियों में भी संयम और दृढ़ता बनाए रखी। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने कश्मीर के बड़े हिस्से को पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से मुक्त कराया।
पहले भारतीय सेनाध्यक्ष -15 जनवरी 1949 का दिन भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में दर्ज है। इस दिन जनरल करिअप्पा ने जनरल सर फ्रांसिस बुचर से पदभार ग्रहण करते हुए भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ का पद संभाला। यह स्वतंत्र भारत के लिए गौरव का क्षण था। सेनाध्यक्ष के रूप में करिअप्पा ने भारतीय सेना के आधुनिकीकरण और पुनर्गठन पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने सेना में भारतीयकरण की प्रक्रिया को तेज किया और युवा अधिकारियों को प्रोत्साहित किया। उनके कार्यकाल में सेना ने व्यावसायिकता और अनुशासन के नए मानक स्थापित किए।
व्यक्तित्व और सिद्धांत -करिअप्पा एक सख्त अनुशासनप्रिय अधिकारी थे, लेकिन साथ ही अपने सैनिकों के कल्याण के प्रति गहरी चिंता रखते थे। उनका मानना था कि सेना को राजनीति से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा था, "सेना न हिंदू है, न मुसलमान, न सिख है। हम सब भारतीय हैं और भारत की सेवा करना हमारा कर्तव्य है।"उनका यह कथन भारतीय सेना की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को परिभाषित करता है। करिअप्पा ने हमेशा राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा और सेना को एक मजबूत, अनुशासित और राष्ट्रभक्त संस्था बनाने में अपना योगदान दिया।
सम्मान और पुरस्कार -करिअप्पा को उनकी सेवाओं के लिए अनेक सम्मान मिले। 1953 में सेवानिवृत्ति के बाद भी वे राष्ट्र की सेवा में सक्रिय रहे। उन्हें 1986 में भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'फील्ड मार्शल' की पदवी से सम्मानित किया गया। वे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के साथ भारत के केवल दो फील्ड मार्शलों में से एक हैं।उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान भी प्राप्त हुए। हैदराबाद, बेंगलुरु और अन्य शहरों में उनके नाम पर सड़कें और स्मारक हैं।
अंतिम दिन और विरासत -15 मई 1993 को 94 वर्ष की आयु में करिअप्पा का बेंगलुरु में निधन हो गया। उन्होंने लगभग एक शताब्दी का जीवन जिया और अपने देश की निस्वार्थ सेवा की। आज भी करिअप्पा की विरासत भारतीय सेना को प्रेरित करती है। उनका जीवन साहस, समर्पण और देशभक्ति का प्रतीक है। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श हैं जो बताते हैं कि सच्ची सेवा और नेतृत्व क्या होता है।





































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