जिनका जीवन देशभक्ति की मिसाल बना
Upgrade Jharkhand News. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनगिनत वीर-वीरांगनाओं ने अपना योगदान दिया, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले पड़ते जा रहे हैं। सरस्वती राजामणि भी उन्हीं में से एक हैं - एक ऐसी स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर किया, बल्कि जीवन के अंतिम पलों तक देशसेवा का संकल्प निभाया। सरस्वती राजामणि उन साहसी महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल होकर देश की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। उस दौर में जब महिलाओं के लिए घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी चुनौतीपूर्ण था, उन्होंने सैन्य वर्दी पहनकर देश के लिए लड़ने का साहस दिखाया। आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजिमेंट की सदस्या के रूप में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं और नेताजी के 'दिल्ली चलो' के नारे को साकार करने के लिए संघर्ष किया।यह वह समय था जब भारतीय महिलाएं पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़कर सशस्त्र संघर्ष में भाग ले रही थीं।सरस्वती राजामणि जैसी महिलाओं ने यह साबित किया कि देशभक्ति और साहस में कोई लिंग भेद नहीं होता।
स्वतंत्रता के बाद का जीवन -आजादी के बाद कई स्वतंत्रता सेनानियों को उचित सम्मान और सुविधाएं नहीं मिलीं। सरस्वती राजामणि का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। लेकिन उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और न ही देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भुलाया। वह पेंशनर के रूप में एक साधारण जीवन व्यतीत करती रहीं, लेकिन उनका हृदय हमेशा समाज सेवा के लिए धड़कता रहा। सरस्वती राजामणि की सबसे प्रेरणादायक बात यह थी कि वृद्धावस्था में भी उनका राष्ट्र और समाज के प्रति सेवा का भाव कभी कम नहीं हुआ। जब शरीर ने साथ देना बंद कर दिया, तब भी उनकी आत्मा देशसेवा के लिए तत्पर रही।बुढ़ापे में भी वह दर्जी की दुकानों पर जाकर बचे हुए कपड़े इकट्ठा करती थीं। इन कपड़ों से वह स्वयं नए वस्त्र तैयार करतीं और उन्हें अनाथालयों और वृद्धाश्रमों में दान कर देती थीं। यह उनकी सादगी, संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक था। उन्होंने यह सिखाया कि सेवा के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि एक समर्पित हृदय की आवश्यकता होती है।
लड़के का भेष धारण कर इकठ्ठा की जानकारी - राजामणि ने अन्य महिला सहयोगियों के साथ मिलकर भेष बदलकर अंग्रेजों के खिलाफ काम किया। उन्होंने लड़का बनकर अंग्रेजों की भारत के खिलाफ योजनाओं की जानकारी हासिल की। जब वह लड़के का रूप धारण करे हुई थी तो उनका नाम मणि था। एक बार उनकी एक सहयोगी ब्रिटिश सैनिक ने पकड़ लिया था। उसे बचाने के लिए राजामणि ने नृतकी की वेषभूषा पहनकर अंग्रेजों के शिविर में घुसपैठ की। उन्होंने ब्रिटिश सैनिक को नशीला पदार्थ खिलाया और अपनी सहयोगी को मुक्त करा दिया। जब वे अपनी साथी को भगा रही थी ब्रिटिश गार्ड ने राजामणि को पैर में गोली मार दी थी लेकिन फिर भी वह वहां से निकलने में सफल रही। गाोली के घाव के बावजूद वह भागती रहीं और अंग्रेजों से बचने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गई। सर्च ऑपरेशन की वजह से वह घाव पर बिना मरहम पट्टी और भूखी-प्यासी रही। तीन दिन बाद वह अपनी साथी के साथ सकुशल आज़ाद हिंद फौज के कैंप पर लौटी। तीन दिन तक इलाज न मिलने की वजह से गोली के घाव ने उन्हें हमेशा के लिए लंगड़ाहट बख्श दी। राजामणि इस चोट को अपने जासूसी दिनों की प्यारी याद मानती थी। नेता जी उनके काम से बहुत खुश हुए और उनकी प्रंशसा की। जापानी सम्राट ने स्वयं उन्हें मेडल से सम्मानित किया और साथ में झांसी की रानी रेजीमेंट में लेफ्टिनेट की रैंक है।
जब वे अपनी साथी को भगा रही थी ब्रिटिश गार्ड ने राजामणि को पैर में गोली मार दी थी लेकिन फिर भी वह वहां से निकलने में सफल रही। गाोली के घाव के बावजूद वह भागती रही और अंग्रेजों से बचने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गई। सर्च ऑपरेशन की वजह से वह घाव पर बिना मरहम पट्टी और भूखी-प्यासी रही। तीन दिन बाद वह अपनी साथी के साथ सकुशल आजाद हिंद फौज के कैंप पर लौटी। 2006 में जब हिंद महासागर में भीषण सुनामी आई और लाखों लोग प्रभावित हुए, तब सरस्वती राजामणि ने अपनी मासिक पेंशन पूरी की पूरी राहत कोष में दान कर दी। यह एक स्वतंत्रता सेनानी का अपने देशवासियों के प्रति प्रेम और त्याग का अद्भुत उदाहरण था। सीमित आय के बावजूद उन्होंने जरूरतमंदों की मदद करना अपना कर्तव्य समझा।
2008 में सरस्वती राजामणि ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने अपनी सेना की वर्दी और बिल्ले नेताजी सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय, कटक, उड़ीसा को दान में दे दिए। यह दान केवल वस्तुओं का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि इतिहास को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण कार्य था। आज ये वस्तुएं युवा पीढ़ी को उनके बलिदान की कहानी सुनाती हैं। 2018 में सरस्वती राजामणि ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका निधन न केवल एक व्यक्ति का अंत था, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के एक युग के समापन का प्रतीक था। हर गुजरते स्वतंत्रता सेनानी के साथ इतिहास का एक जीवित अध्याय समाप्त हो जाता है।
सरस्वती राजामणि का जीवन हमें कई सबक देता है। उन्होंने सिखाया कि देशभक्ति केवल युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्यों में भी प्रकट होती है। उन्होंने यह दिखाया कि उम्र, परिस्थितियां या सीमित संसाधन समाज सेवा में बाधा नहीं बन सकते यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो। आज जब हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं, तो हमें सरस्वती राजामणि जैसे गुमनाम नायकों को याद करना और उनके योगदान को स्वीकार करना चाहिए। उनकी कहानी हर भारतीय को प्रेरित करती है कि राष्ट्र सेवा का भाव कभी कम नहीं होना चाहिए। सरस्वती राजामणि - एक ऐसा नाम जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान के लिए सदैव अमर रहेगा।




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