- भारत रत्न से सम्मानित बिहार के लोकप्रिय नेता
Upgrade Jharkhand News. यह भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया है, लेकिन भगवान शिव ने अपने शरीर का एक कण धरती पर आवश्यकतानुसार प्रक्षिप्त किया। वह कण कर्पूरी ठाकुर हुए। संसार ने इस कर्पूर के कण को तत्काल नहीं समझा। समझता भी क्यों। समझने के लिए भी तो बुद्धि चाहिये। लेकिन समय तो महानतम शिक्षक है। व्यक्ति की महानता या लघुता को बार-बार उजागर ही कर देता है। काल बहुत निर्मम शिक्षक है। सुधारक है। बड़े-बड़ों की मिट्टी पलीद कर देता है और कर्पूर के कण को भी आकाश के आंगन में फैला देता है। पाताल से हीरे मोती को खोज निकालता है। काल में कोई पक्षपात नहीं। वैसा पक्षपात रहित शिक्षक, सुधारक मिलना कठिन है। उसने हमारे कर्पूरी ठाकुर को पाताल से खोज निकाला और उन्हें कर्पूर का गौरव प्रदान किया।सन 1930 दशक के अन्तिम दिन थे। पंडित रामनन्दन मिश्र, जो समाजवादी पार्टी के महानतम नेताओं में परिगणित होते थे तथा श्री जयप्रकाश नारायण के अनन्य मित्र थे, को समस्तीपुर के कृष्णा टॉकीज सभागार में एक उद्बोधन के लिए बुलाया गया था।
कर्पूरी ठाकुर उन दिनों स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। वे भी सभागार में उपस्थित थे। याद रहे कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 में पितौंझिया (समस्तीपुर) ग्राम में हुआ था। बालक कपूरी वाद विवाद, भाषण सभाषण में तब भी गहरी रूचि लेता था। कपूरी ठाकुर ने भी अपना व्यक्तव्य धारा प्रवाह प्रस्तुत किया। पंडित रामनन्दन मिश्र उसके व्याख्यान से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बालक को मंच पर बुलाया। नाम पूछा बालक ने बताया कपूरी ठाकुर मिश्र जी ने कहा - तुम कपूरी नहीं हो, कर्पूरी हो। तब से कपूरी ठाकुर कर्पूरी ठाकुर के रूप में स्थापित हुए। मिश्र जी ने आगे कहा, तुम कर्पूर हो जिसकी सुगंध से वातावरण गमगमा उठता है।
बचपन उनका संघर्षमय रहा। व्यक्तित्व चट्टानी था। ग्रेनाइट को तराशकर प्रकृति ने कर्पूरी ठाकुर को गढ़ा 24 जनवरी 1924 की तिथि में एक बालक का जन्म हुआ पिता गोकुल ठाकुर एवं माता रामदुलारी देवी। ग्राम-पितौंझिया, जिला-समस्तीपुर। कर्पूरी ठाकुर को शिक्षा में विशेष लग्न थी उनकी प्रतिभा की प्रशंसा उनके शिक्षक गण भी करते थे। इससे गोकुल ठाकुर की आंखों में चमक आ गया जाया करती थी। गांव के प्राइमरी स्कूल में ही उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। उसी विद्यालय में वह बाद में शिक्षक तथा प्रधानाध्यापक बने। आजकल वह लक्ष्मीनारायण राजकीय मध्य विद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है। आज उस पितौंझिया ग्राम में सबकुछ है। पुलिस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, डिग्री कॉलेज, अस्पताल, लाइब्रेरी आदि। आज वह गांव कर्पूरी ग्राम के नाम से विख्यात है। ताजपुर में उनकी अगली कक्षाएं पूरी हुई है। ताजपुर उनके गांव से 8 किलोमीटर की दूरी पर है। प्रतिदिन 16 किलोमीटर की यात्रा शिक्षा के प्रति इस बालक की चाहना को दर्शाती है। परिवार में हुए प्रतिभाशाली होनहार बालक थे अतः चाचा ध्रुपद ठाकुर ने उनकी आर्थिक सहायता की। शिक्षा के सभी क्षेत्रों में बालक की असाधारण गति थी-पठन-पाठन, संगीत, खेलकूद, वाद-विवाद प्रतियोगिता-विचार संदोहन संगोष्ठी। इस प्रतिभाशाली छात्र की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें होस्टल में एक स्थान मिल गया।
शारीरिक यात्रा के श्रमसहाय ऊर्जा की समुचित उपयोग होने लगा। कविता से भी बालक कर्पूरी ठाकुर को प्रेम हो गया। वे राष्ट्रवादी कवितायें लिखते स्वामी सहजानंद के किसान आंदोलन से भी वे प्रभावित हुए। किसानों के प्रति जमीदारों के अत्याचार से स्वामी सहजानंद उत्तेजित थे। युवा कर्पूरी ठाकुर इस आंदोलन से अछूते नहीं रहे। आजादी की लड़ाई गांधी जी के नेतृत्व में चल रही थी। इन सब का मिश्रित प्रभाव युवा कर्पूरी ठाकुर पर पड़ता गया और वह राजनीति की ओर प्रेरित होता रहा। स्वामी सहजानंद के वकारत आंदोलन, किसान जमींदार संघर्ष की कहानियों ने बालक के मन में अमिट प्रभाव छोड़ा।
जब वे आठवीं कक्षा में थे तभी गांव में नवयुवक संघ की स्थापना की थी। स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां पढ़ी सुनी जाती थी। कर्पूरी ठाकुर जन्मजात अच्छे वक्ता थे। गांव में एक लाइब्रेरी खोली गई। लोग नियमित पाठक थे। 1940 में बालक कर्पूरी ठाकुर ने दसवीं कक्षा पास की। आगे की पढ़ाई उन्होंने सीएम कॉलेज दरभंगा से की। 1942 सन में कर्पूरी ने बी.ए. कक्षा में प्रवेश लिया। भारत छोड़ो आंदोलन तब जोरो पर था। कर्पूरी ठाकुर कैसे अछूते रहते। आंदोलन में कूद पड़े राम मनोहर लोहिया कर्पूरी ठाकुर के आदर्श थे। अतः समाजवादी आंदोलन में वे खुलकर भाग लेने लगे। पंडित रामानंद मिश्र ने भी इसी समय युवा कर्पूरी को प्रेरित किया। आचार्य नरेंद्र देव, राहुल सांकृत्यायन, रामानंदन मिश्र, मोहनलाल गौतम, रामवृक्ष बेनीपुरी, लोहिया जैसे समाजवादियों ने उन्हें पक्का समाजवादी बना दिया। वह अल्पकाल में ही दरभंगा में समाजवादी युवाओं के आदर्श बन गये। आजाद दस्ता बनाया। 1945-1947 तक वे दरभंगा जिले के कांग्रेस समाजवादी पार्टी के मंत्री रहे। बिहार प्रादेशिक किसान सभा के प्रधानमंत्री पर रहते हुए समस्तीपुर और दरभंगा के जमींदारों से भूमि लेकर भूमिहीनों में वितरण का कार्य किया।
1946 के पूसा के किसान सम्मेलन ने जननायक बना दिया। रामनंदन मिश्र उन्हें जिला की राजनीति से उठाकर प्रांतीय राजनीति में लाया। फिर तो वे बढ़ते ही गये बरगद के पेड़ की तरह। आजादी की लड़ाई में 1942 की क्रांति में महात्मा गांधी के नेतृत्व को स्वीकारा था।लेकिन अंतिम दिनों में उन्हें महसूस होने लगा था कि आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाना आवश्यकता है। 1985 में उन्होंने कहा था- if the ballat fails, the bullet will prevait. गरीबो को रक्षा, आत्मसम्मान या जीवन की सुरक्षा के वे पक्षधर थे। विपक्ष के नेता के रूप में वे अपने विचारों को बहुत शक्तिशाली ढंग से प्रस्तुत करते थे। उनके तरकस में अनेक तीन थे लेकिन वे मुख्यतः तीन तीरों का प्रयोग करते थे। पहला-वे सरकार के पक्षपात की कटु आलोचना करते थे। कांग्रेस की सरकार पंचायती राज व्यवस्था को क्रियान्वित करते में बहुत टाल मटोल किया करती थीं। और उन्हें कर्पूरी ठाकुर की मारक आलोचनाओं को झेलना ही पड़ता था जैसे नेहरू जी को समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया जी को। कानून व्यवस्था की बिगड़ी हालत, मुद्रास्फीति (Inflaction) या मंहगाई, प्रशासन की लचर व्यवस्था, सरकार की टालमटोल की नीति विषयों पर कर्पूरी ठाकुर, राममनोहर लोहिया, के समान ही प्रखर वक्ता थे। इससे सरकार असहज हो जाया करती थी और उसकी जनता के सामने प्रकट हो जाया करती थी। यहां समाजवाद की वैचारिक प्रतिबद्धता चमक कर उभरती थी।
उनकी तरकस का दूसरा तीर था- विवादस्पद मामलों के उन विषयों क़ो उठाना जो आर्थिक सामाजिक, शैक्षणिक रूप से समाज का पिछड़ा अन्याय के प्रति, सहिष्णु तथा लाचार व्यवस्था जिसे हम लोकभाषा में दलित, वंचित, उपेक्षित वर्ग कहते हैं। उनका तीसरा तीर था औद्योगीकरण के विकास एवं समृद्धि का समान वितरण पर टिका विकासवाद। भ्रष्टाचार से निपटने का एक अनोखा उदाहरण देखिये ! पुलिस सब इन्सपेक्टर पदों पर आधी (नियुक्तियां) राजनैतिक हितों को देखकर की जाये। कर्पूरी ठाकुर इस विषय को सदन में उठा सकते थे। कर्पूरी ठाकुर ने मामले को अन्य तरीके से हल किया। जानते थे कि समाज को सामान्यतः डंडे की चोट से नहीं सुधारा जा सकता ये सुधार एक कर्मिक व्यवस्था है। कर्पूरी ठाकुर हिंदी भाषा के अनन्य भक्त थे। उनके पास रामधारी सिंह दिनकर, प्रसाद, पंत, बेनीपुरी, महादेवी वर्मा, नागार्जुन के साहित्य का प्रचुर अंश था। मैथिली साहित्य में भी उनकी गहरी रुची थी। कवि सम्मेलनों में वे जाया करते थे। जानकी वल्लभ शास्त्री से उनकी गहरी आत्मीयता थी। अपनी भाषा संबंधी धारणा के संबंध में वे चाहते थे कि एक दक्षिण भारतीय भाषा कानूनी रूप से पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाए। दक्षिण और उत्तर भारत में विशेष कर तमिल भूमि पर हिंदी को जो अछूत माने की अवधारणा बन गई है उसका एकमात्र उपाय है कि तमिल भाषा को हिंदी क्षेत्र में कानूनी अनिवार्यता प्राप्त हो। इससे उत्तर और दक्षिण प्रान्तों में प्रेम और स्वीकार्यता बढ़ेगी।
इसमें केंद्रीय सरकारों को भी सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। इस स्वीकार्यता में शिक्षकों और विद्यार्थियों का सहयोग अपेक्षित है। इस दिशा में जन सामान्य में उत्तर और दक्षिण में एवं आम सहमति बननी चाहिए दक्षिण में हिंदी अनिवार्य हो और हिंदी क्षेत्र में तमिल। विशेषकर तमिल सांस्कृतिक रूप से अति प्राचीन धरोहर की स्वामिनी है। अलवारों और नयनारों के प्रचुर समूह से तमिल समृद्ध है। इस महापुरुष की सहजता सरलता, आत्मीयता, प्रभुता, सैद्धान्तिकता, सामाजिकता की अनगिनत कहानियां है। सुगंध से भरी हुई है। जहां भी गये जगमगाते रहे। सुगंध बढ़ाते गये। पुष्टि बढ़ाते गये। हम अपनी कृतज्ञता इस महापुरुष के चरणों में समर्पित करते हैं। व्यक्तिगत भी और अंबेडकर संस्थान की ओर से भी।




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