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Jamshedpur जयंती पंडित दीनदयाल उपाध्याय : विचारों का दीप, राष्ट्रबोध की दिशा Pandit Deendayal Upadhyay's birth anniversary: ​​A lamp of thought, a guide to national consciousness

 


Upgrade Jharkhand News. भारतीय राजनीति और वैचारिक परंपरा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो स्वयं सत्ता के केंद्र में न रहते हुए भी सत्ता और समाज की दिशा तय करते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऐसे ही कालजयी चिंतक थे। वे राजनेता से अधिक राष्ट्रद्रष्टा, संगठनकर्ता से अधिक दार्शनिक और वक्ता से अधिक विचार-निर्माता थे। उनकी जयंती केवल एक स्मरण-दिवस नहीं, बल्कि भारत के आत्मकेंद्रित विकास-पथ पर पुनर्विचार का अवसर है।


अभावों से विचारों तक की यात्रा -25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के नगला चंद्रभान में जन्मे दीनदयाल उपाध्याय का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षों से घिरा रहा। बचपन में माता-पिता का साया उठ जाना किसी भी बच्चे को तोड़ सकता था, लेकिन दीनदयाल जी के भीतर यह अभाव संवेदना और संकल्प में बदल गया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उनकी प्रतिभा निखरी—मेधा ऐसी कि छात्रवृत्तियाँ और सम्मान उनके लिए सामान्य बात थीं। पर उन्होंने सुविधाओं के मार्ग को नहीं चुना; उन्होंने सेवा और साधना का मार्ग अपनाया।


संगठन से राष्ट्र तक -राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित किया। बाद में भारतीय जनसंघ के संगठनात्मक ढांचे को खड़ा करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। वे पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले नेता थे—जिनके लिए पद, प्रतिष्ठा या चुनाव गौण थे। उनका विश्वास था कि व्यक्ति-निर्माण से ही राष्ट्र-निर्माण संभव है।


वे कहते थे कि राजनीति यदि मूल्यों से कट जाए, तो वह समाज के लिए बोझ बन जाती है। इसलिए उन्होंने कार्यकर्ताओं में अनुशासन, वैचारिक स्पष्टता और नैतिकता को सर्वोपरि रखा।पंडित दीनदयाल उपाध्याय सन 1953 से 1968 तक भारतीय जनसंघ के नेता रहे। एक गम्भीर दार्शनिक एवं गहन चिंतक होने के साथ-साथ वह एक ऐसे समर्पित संगठनकर्ता और नेता थे जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत शुचिता एवं गरिमा के उच्चतम आयाम स्थापित किये। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय से ही वह इसके वैचारिक मार्गदर्शक और नैतिक प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। उनका राजनीतिक दर्शन मानव मात्र की आवश्यकताओं के अनुरूप और हमारे प्राकृतिक आवास के अनुकूल राजनीतिक कार्यप्रणाली एवं शासकीय कौशल का मार्ग प्रशस्त करने वाला एक चहुंमुखी वैकल्पिक जीवन दर्शन है। “अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की सोच रही है”।


एकात्म मानववाद : भारतीय चिंतन का आधुनिक स्वर -1965 में प्रतिपादित एकात्म मानववाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सबसे बड़ा वैचारिक योगदान है। यह दर्शन न तो पश्चिमी पूँजीवाद की अंधी भोगवादी दौड़ को स्वीकार करता है, न ही साम्यवाद की वर्ग-संघर्ष आधारित जड़ता को।एकात्म मानववाद का मूल विचार है—व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हैं


विकास का केंद्र केवल अर्थव्यवस्था नहीं, मानव गरिमा होनी चाहिए समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान ही सच्ची प्रगति है—यही अंत्योदय है उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की समस्याओं का समाधान आयातित विचारधाराओं में नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना में निहित है।


उन्होंने स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के एक मजबूत, जीवंत और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के विचार को आगे बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया। पूंजीवाद और समाजवाद की जगह पण्डित दीन दयाल उपाध्याय ने स्वराज के रूप में गांधी जी द्वारा परिकल्पित नैतिक मूल्यों और लोकव्यवहार के आधार पर आर्थिक नीतियों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके लिए राजनीति जन सेवा का माध्यम थी। वे कहते थे कि राजनीतिक व्यक्ति को जन सेवक के रूप कार्य करना चाहिए।


स्वदेशी आर्थिक मॉडल को अपनाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एकात्म-मानववाद को रेखांकित किया। इसमें समावेशी और जन समुदाय को सशक्त बनाने का विचार था। उनका मानना था कि स्वदेशी और लघु उद्योग भारत की आर्थिक योजना की आधारशिला होनी चाहिए, जिसमें सद्भाव, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय नीति और अनुशासन का समावेश हो। स्वदेशी की प्राथमिकता रखते हुए वह विश्व स्तर पर हो रहे नवाचारों को अपनाने के भी कतई खिलाफ नहीं थे। हमारी जरूरतों की वस्तुओं का निर्माण भी देश में ही करना चाहते थे ताकि हम आत्मनिर्भर बनें। वे प्राकृतिक खेती के भी बहुत ही कद्रदान थे। वह जानते थे कि प्राकृतिक खेती से न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि कृषि में टिकाऊ और लचीलापन आएगा।उनका मानना था कि भारतीयता, धर्म, धर्मराज्य, राष्ट्रवादी और अंत्योदय की अवधारणा से ही भारत को विश्व गुरु का स्थान हासिल हो सकता है। सभी के लिए शिक्षा और हर हाथ को काम, हर खेत को पानी के उनके दृष्टिकोण ने ही एक लोकतांत्रिक आर्थिक व्यवस्था में आत्मनिर्भर होने का मार्ग प्रशस्त किया है। पण्डित दीन दयाल जी एक ऐसी व्यवस्था के विरोधी थे जो रोजगार के अवसर को कम करती है लेकिन सामाजिक समानता, पूंजी और सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे। स्वतंत्रता, समानता और न्याय की गारंटी देने वाली भारतीय संस्कृति पर उनका विचार बिल्कुल स्पष्ट था। भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने सुशासन के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में व ग्रामीणों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने में दीन दयाल उपाध्याय जी के पदचिन्हों का अनुसरण किया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी मार्गदर्शन में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ‘‘लोकल से वोकल’’ का सपना देखना वास्तव में हमारे लिए खुशी की बात है।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख रचनाएँ -यहाँ पंडित दीनदयाल उपाध्याय की कुछ प्रमुख किताबों की जानकारी दी गई है:-एकात्म मानववाद – (Integra Humanism), दो योजनाएँ , सम्राट चन्द्रगुप्त, जगद्गुरु शंकराचार्य,राष्ट्र चिन्तन : 


सादगी का जीवन, ऊँचे आदर्श -पंडित दीनदयाल उपाध्याय का निजी जीवन उनके विचारों की जीवंत मिसाल था। सीमित साधन, साधारण वेशभूषा और निष्कलंक आचरण—यही उनकी पहचान थी। उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा, न ही सत्ता के पदों की लालसा रखी। इसके बावजूद उनकी वैचारिक छाप इतनी गहरी रही कि आज भी भारतीय राजनीति में उनके विचारों का संदर्भ लिया जाता है।


रहस्यमय अंत, अमर विचार -11 फ़रवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उनका असामयिक और रहस्यमय निधन हुआ। यह घटना आज भी कई प्रश्न छोड़ जाती है, पर एक सच्चाई निर्विवाद है—उनका अंत उनके विचारों का अंत नहीं था। समय के साथ उनके चिंतन की प्रासंगिकता और बढ़ी है, विशेषकर तब, जब विकास और संवेदना के बीच संतुलन की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।


 दीनदयाल उपाध्याय - आज जब दुनिया उपभोग, प्रतिस्पर्धा और असमानता के संकट से जूझ रही है, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन समन्वय और संतुलन का मार्ग दिखाता है। स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और अंत्योदय जैसे विचार समकालीन भारत की नीतियों और विमर्श में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।पंडित दीनदयाल उपाध्याय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार-परंपरा हैं। उनकी जयंती पर उन्हें याद करने का अर्थ है—राजनीति को नैतिकता से जोड़ना, विकास को मानवता से जोड़ना और राष्ट्र को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना।आज के भारत को यदि सचमुच समावेशी, आत्मनिर्भर और मानवीय बनना है, तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन केवल स्मृति नहीं, मार्गदर्शक बनना चाहिए।



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