Upgrade Jharkhand News. सुंदर लाल बहुगुणा का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि हमारे दौर के सबसे बड़े सामाजिक–नैतिक प्रहरी का मौन हो जाना था। वे ऐसे समय में विदा हुए, जब पर्यावरण, विकास और मानवीय संवेदना के सवाल पहले से कहीं अधिक तीखे हो चुके हैं। यदि कोरोना महामारी का प्रकोप न होता, तो संभवतः वे कुछ और वर्षों तक समाज को चेताते, टोकते और सही राह दिखाते रहते। उनका जीवन स्वयं में एक आंदोलन था—नारे से नहीं, नैतिक बल से संचालित।
बहुगुणा अपने पीछे सामाजिक संघर्षों की एक लंबी, सुसंगत और वैचारिक विरासत छोड़ गए। दुनिया उन्हें और चंडी प्रसाद भट्ट को चिपको आंदोलन के लिए जानती है, लेकिन चिपको उनके सामाजिक जीवन का केवल एक अध्याय था। उनके जीवन का केंद्रीय सूत्र था—प्रकृति, मनुष्य और नैतिक विकास के बीच संतुलन। वे विकास के विरोधी नहीं थे, बल्कि उस अंधे विकास के विरुद्ध थे जो जंगलों, नदियों और समुदायों को कुचल कर आगे बढ़ता है।
सुंदर लाल बहुगुणा का सामाजिक–राजनीतिक जीवन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय ही शुरू हो गया था। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। सत्य, अहिंसा और जनसहभागिता उनके जीवन के स्थायी मूल्य बने। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने सत्ता के गलियारों की बजाय जनता के बीच रहना चुना। यही कारण है कि वे कभी ‘नेता’ नहीं कहलाए, बल्कि हमेशा ‘लोकनायक’ की तरह स्वीकार किए गए।
टिहरी रियासत में रहते हुए वे महान स्वतंत्रता सेनानी श्रीदेव सुमन के संपर्क में आए। सुमन की 84 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल और 1944 में जेल में हुई मृत्यु ने बहुगुणा के भीतर विद्रोह नहीं, बल्कि नैतिक दृढ़ता को जन्म दिया। उसी दौर में टिहरी कांग्रेस के जिला सचिव के रूप में उनका नाम सामने आया। तब उनकी आयु मात्र 21–22 वर्ष थी, लेकिन वे राजनीतिक परिपक्वता और जनसंवेदना का अद्भुत उदाहरण बन चुके थे।
स्वतंत्रता के बाद बहुगुणा ने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर समाज-निर्माण का मार्ग चुना। उन्होंने गांव-गांव जाकर शिक्षा, स्वावलंबन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। उनका मानना था कि पहाड़ों की समस्या का समाधान दिल्ली या देहरादून में बैठकर नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति को साथ लेकर ही संभव है। इसी सोच ने आगे चलकर चिपको आंदोलन का रूप लिया।
चिपको आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का संघर्ष नहीं था; वह स्थानीय समाज के अस्तित्व, आजीविका और आत्मसम्मान की लड़ाई थी। जब महिलाएं पेड़ों से लिपटकर कुल्हाड़ियों के सामने खड़ी हुईं, तो दुनिया ने पहली बार देखा कि विकास का प्रतिरोध भी प्रेम और अहिंसा से किया जा सकता है। बहुगुणा ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, लेकिन स्वयं कभी इसका श्रेय नहीं लिया। उनके लिए आंदोलन से अधिक महत्वपूर्ण था उसका नैतिक संदेश।
चिपको के बाद बहुगुणा का संघर्ष और व्यापक हुआ। टिहरी बांध के विरोध में उन्होंने दशकों तक आवाज़ उठाई। उनका सवाल सीधा था—क्या कुछ शहरों की बिजली और पानी के लिए पूरे हिमालयी समाज को विस्थापित कर देना न्यायसंगत है? उन्होंने अनशन किए, पदयात्राएं कीं और प्रधानमंत्री से लेकर विश्व मंचों तक अपनी बात रखी। वे जानते थे कि हर लड़ाई जीती नहीं जाती, लेकिन हर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी है।बहुगुणा की खासियत यह थी कि वे विरोध को भी संवाद में बदल देते थे। वे कट्टरता से दूर रहते हुए अपनी बात तर्क, तथ्य और नैतिकता के साथ रखते थे। उन्होंने ‘पृथ्वी बचाओ’ को केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बनाया। उनके लिए पर्यावरण कोई अलग विषय नहीं था; वह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ प्रश्न था।
वे सादगी के जीवंत प्रतीक थे। साधारण वस्त्र, न्यूनतम आवश्यकताएं और विचारों की अधिकतम स्पष्टता—यही उनका जीवन था। उन्होंने कभी पुरस्कारों या पदों को महत्व नहीं दिया, लेकिन जब उन्हें पद्म विभूषण जैसे सम्मान मिले, तो वे समाज की ओर से संघर्षों की स्वीकृति की तरह स्वीकार किए गए। आज जब जलवायु संकट, विस्थापन और संसाधनों की लूट वैश्विक समस्या बन चुकी है, सुंदर लाल बहुगुणा की सोच और अधिक प्रासंगिक हो उठती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति पर विजय नहीं, उसके साथ सह-अस्तित्व ही मानवता का भविष्य है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी भी है और मार्गदर्शन भी।
सुंदर लाल बहुगुणा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ हिमालय की हवाओं, नदियों की धारा और संघर्षरत समाज की चेतना में आज भी जीवित है। वे चले गए, पर सवाल छोड़ गए—और शायद यही किसी सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता की सबसे बड़ी विरासत होती है।




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