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Bhopal मध्य प्रदेश: अन्नदाता के खेत खलिहान में भरोसे और समृद्धि की फसल Madhya Pradesh: A harvest of trust and prosperity in the fields and barns of the farmers

 


Upgrade Jharkhand News. किसानों को राष्ट्र का अन्नदाता और भाग्य विधाता कहा जाता है। इस अन्नदाता की उन्नति, आय दोगुनी करने को लेकर देश के हर राज्य की सरकार अपने-अपने दावे करती हैं और समय समय पर कई योजनाएं भी लाती रही है, लेकिन फिर भी देश के अधिकतर राज्यों में किसानों की दशा बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती है। मध्य प्रदेश में अब किसानों की स्थिति संभालने और उन्हें प्रदेश के प्रगति पथ से जोड़ने के लिए वर्ष 2026 को किसान कल्याण वर्ष मनाने का निर्णय हुआ है। पहले तो यह लग रहा था कि यह घोषणा महज औपचारिक होगी, लेकिन एक माह के भीतर  मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की सरकार ने जो संकेत दिए है वह किसानों की कल्याण नीति की दिशा के स्पष्ट संदेश दिख रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार ने लगभग 10 हजार 500 करोड़ रुपये की पाँच प्रमुख कृषि योजनाओं को वर्ष 2026 से 2031 तक जारी रखने की रूपरेखा तय की । यह रूपरेखा यह बताती है कि खेती को राज्य की विकास धारा के केंद्र में रखा गया है। यह वह समय है जब कृषि क्षेत्र को स्थिरता, स्पष्टता और निरंतर सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है और राज्य ने उसी दिशा में कदम बढ़ाया है।


कृषि आज बहुस्तरीय दबावों से गुजर रही है। उत्पादन लागत में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन का असर, वर्षा की अनिश्चितता और बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव। ये सभी कारक किसान की आय को प्रभावित करते हैं। ऐसे दौर में योजनाओं की पाँच वर्षीय निरंतरता से निश्चित ही किसानों को एक भरोसा मिलेगा कि नीतियाँ बीच राह में नहीं बदलेंगी। मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्राथमिकताओं में कृषि को दीर्घकालिक स्थिरता देना प्रमुख रूप से दिखाई देता है।प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 2008 करोड़ 683 लाख रुपये से अधिक की राशि कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में समग्र सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण है। इस योजना का उद्देश्य स्थानीय जरूरतों के अनुरूप परियोजनाएँ तैयार करना है। मध्यप्रदेश जैसे विशाल और विविध भूगोल वाले राज्य में क्षेत्रीय रणनीति आवश्यक है। कहीं सिंचाई विस्तार की जरूरत है, कहीं बीज गुणवत्ता सुधार की, तो कहीं प्रसंस्करण और भंडारण ढांचे की।    मुख्यमंत्री मोहन यादव ने क्षेत्र-विशेष आधारित विकास पर जोर दिया है, जिससे योजनाएँ अधिक प्रभावी बन सकें। जल प्रबंधन की दिशा में पर ड्रॉप मोर क्रॉप घटक के लिए 2393 करोड़ 97 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। निस्संदेह यह भविष्य की खेती को सुरक्षित करने की पहल है। पानी अब केवल संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक पूंजी है। सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देकर जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सकती है। ड्रिप और स्प्रिंकलर पद्धति से कम पानी में अधिक उत्पादन संभव है। मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा जल संरक्षण को प्राथमिकता देना यह संकेत देता है कि खेती को मौसम की अनिश्चितता से बचाने के लिए दीर्घकालिक उपाय किए जा रहे हैं।


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के लिए 3285 करोड़ 49 लाख रुपये का प्रावधान फसल विविधीकरण और पोषण सुरक्षा दोनों को सशक्त करेगा। दलहन, धान, गेहूँ, श्रीअन्न और व्यावसायिक फसलों के क्षेत्र और उत्पादकता में वृद्धि से किसान को आय के अधिक विकल्प मिलेंगे। श्रीअन्न जैसे पोषक अनाजों को बढ़ावा देना न केवल बाजार की मांग से जुड़ा है, बल्कि जनस्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की नीति में उत्पादन और पोषण का यह संतुलन स्पष्ट दिखाई देता है। प्राकृतिक खेती की ओर 1011 करोड़ 59 लाख रुपये का निवेश कृषि को टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस कदम है। रसायनों पर निर्भरता कम करना, मिट्टी की सेहत सुधारना और जैव विविधता को बढ़ावा देना भविष्य की खेती का आधार है। प्राकृतिक खेती से लागत में कमी आ सकती है, जो छोटे किसानों के लिए राहतकारी होगी। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि खेती केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ी है।        तिलहन क्षेत्र में 1793 करोड़ 87 लाख रुपये से अधिक का प्रावधान आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है। खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करना राष्ट्रीय आवश्यकता है। मध्यप्रदेश पहले से सोयाबीन और सरसों उत्पादन में अग्रणी है। यदि तकनीक, बीज और बाजार सुविधा का समुचित समन्वय हो, तो यह क्षेत्र किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में तिलहन उत्पादन को भी रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है।


सरसों उत्पादकों के लिए भावांतर योजना के अंतर्गत मूल्य अंतर की राशि सीधे बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से दी जाएगी। 23 मार्च से 30 मई 2026 तक अधिसूचित मंडियों में विक्रय और भारित औसत मूल्य के आधार पर भुगतान की व्यवस्था बाजार जोखिम को कम करती है। यह मॉडल किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम भाव मिलने की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की इस पहल से किसानों का आत्मविश्वास भी मजबूत होगा। इस व्यवस्था से बाजार की अस्थिरता के बाद भी अन्नदाता की आय का संतुलन बना रहेगा। इन सभी पहलों का प्रभाव खेत की मेड़ और खलिहान से आगे तक जाएगा। कृषि निवेश बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन होगा, कृषि यंत्र और सिंचाई उपकरणों की मांग बढ़ेगी, प्रसंस्करण उद्योग को गति मिलेगी और स्थानीय बाजारों में क्रय शक्ति मजबूत होगी। जब किसान की आय बढ़ती है, तो उसका लाभ पूरे ग्रामीण तंत्र को मिलता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की रणनीति कृषि को राज्य की अर्थव्यवस्था की आधारशिला के रूप में स्थापित करती है।  महत्वपूर्ण यह है कि योजनाओं की समय-सीमा पाँच वर्षों के लिए निर्धारित की गई है। इससे नीति में स्थिरता का संदेश स्पष्ट  है। किसान को यह विश्वास मिलता है कि वह दीर्घकालिक योजना बना सकता है, नई तकनीक अपना सकता है और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में निवेश कर सकता है।


किसान कल्याण वर्ष की यह रूपरेखा बताती है कि मध्यप्रदेश ने खेती को विकास की परिधि से उठाकर केंद्र में रख दिया है। उत्पादन, सिंचाई, पोषण, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, तिलहन प्रोत्साहन और मूल्य सुरक्षा, इन सभी आयामों को एक साथ आगे बढ़ाने की यह कोशिश संतुलित और व्यापक है। यदि जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हुआ, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश कृषि प्रबंधन और किसान सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण बन सकता है। खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक और आर्थिक धुरी है और जब नीति, संसाधन और नेतृत्व एक दिशा में चलते हैं, तो समृद्धि की फसल अवश्य तैयार होती है। पवन वर्मा



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