Upgrade Jharkhand News. राजनीति में चौंकाने की कला बहुत कम दलों के पास होती है। हाल के महीनों में भारतीय जनता पार्टी ने यह कला फिर दिखा दी है। पहले बिहार से आने वाले नेता नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना और उसके कुछ ही महीनों बाद नीतीश कुमार को राज्यसभा की राह दिखाना। ये दोनों फैसले ऐसे रहे, जिन्होंने बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषकों को भी चौंका दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिहार की राजनीति में भाजपा का तीसरा दांव अभी बाकी है, और वह दांव किस रूप में सामने आएगा? पहले इन दो फैसलों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। भाजपा की राजनीति अक्सर लंबी रणनीति पर आधारित होती है। पार्टी कई बार ऐसे कदम उठाती है जो पहली नजर में अचानक लगते हैं, लेकिन उनके पीछे दूरगामी राजनीतिक गणित छिपा होता है। बिहार के संदर्भ में पिछले चार महीनों में जो घटनाएं हुई हैं, वे इसी रणनीतिक शैली की ओर संकेत करती हैं।
जब नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, तो यह केवल संगठनात्मक निर्णय नहीं था। राष्ट्रीय राजनीति में बिहार के एक नेता को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना कई संकेतों से भरा हुआ था। पहला संकेत यह था कि भाजपा बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रखकर अपनी रणनीति बना रही है। दूसरा संकेत यह था कि पार्टी राज्य की राजनीति में नए नेतृत्व को आगे लाने के लिए तैयार है और तीसरा संकेत यह था कि संगठनात्मक स्तर पर बिहार की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने जा रही है। नितिन नबीन लंबे समय से बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। संगठन, सरकार और चुनाव, तीनों स्तरों पर उनका अनुभव रहा है। लेकिन उन्हें सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी देना एक ऐसा फैसला था जिसकी पहले व्यापक चर्चा नहीं थी। यही कारण है कि यह निर्णय राजनीतिक हलकों में अप्रत्याशित माना गया।
अभी पहले फैसले की गूंज पूरी तरह थमी भी नहीं थी कि दूसरा बड़ा निर्णय सामने आ गया। नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए नामांकन। बिहार की राजनीति में दो दशकों तक मुख्यमंत्री रहे नेता का अचानक राज्यसभा की ओर जाना सामान्य घटना नहीं है। यह कदम बिहार की सत्ता संरचना को सीधे प्रभावित करता है। क्योंकि इसके साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया कि अब राज्य की कमान किसके हाथ में होगी?नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार की राजनीति का केंद्रीय चेहरा रहे हैं। गठबंधन बदलते रहे, लेकिन सत्ता का संतुलन अक्सर उनके इर्द-गिर्द ही बना रहा। ऐसे में उनका राज्यसभा जाना बिहार की राजनीति में एक युग के अंत और नए दौर की शुरुआत की तरह देखा जा रहा है। यदि इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखा जाए तो ये केवल राजनीतिक फैसले लग सकते हैं। लेकिन यदि इन्हें एक साथ देखा जाए, तो इनके भीतर एक बड़ी रणनीति की झलक मिलती है।
पहले बिहार से एक नेता को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना और फिर राज्य की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन लाना यह क्रम संकेत देता है कि भाजपा बिहार को लेकर दीर्घकालिक राजनीतिक योजना पर काम कर रही है।यह योजना केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं हो सकती। इसका संबंध आने वाले चुनावों और उससे आगे की राजनीति से भी हो सकता है। नीतीश कुमार की विदाई के बीच अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र यही है कि बिहार का नया मुख्यमंत्री कौन होगा? इस समय सवाल केवल नाम का नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संतुलन का है जो आगे की राजनीति को तय करेगा। मुख्यमंत्री का चयन करते समय कई कारक सामने आते हैं। सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक संतुलन, गठबंधन की मजबूती और चुनावी रणनीति। बिहार की राजनीति में अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह पद किस दल के पास जाएगा या किस चेहरे को आगे लाया जाएगा। लेकिन इतना तय है कि यह फैसला साधारण नहीं होगा। यहीं से तीसरा सवाल जन्म लेता है कि क्या मुख्यमंत्री चयन में भी भाजपा कोई ऐसा फैसला ले सकती है जो सबको चौंका दे?
भाजपा का हाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि पार्टी कई बार ऐसे चेहरे सामने लाती है जिनकी पहले व्यापक चर्चा नहीं होती। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा,गुजरात, छत्तीसगढ़ राज्यों में मुख्यमंत्री चयन के समय यह शैली दिखाई दे चुकी है। ऐसे फैसलों के पीछे पार्टी का तर्क होता है कि नया चेहरा संगठन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध होगा और सत्ता संतुलन को नए ढंग से स्थापित कर सकेगा। बिहार में भी यह संभावना पूरी तरह से खारिज नहीं की जा सकती। यदि पार्टी यह मानती है कि राज्य की राजनीति में नया प्रयोग करने का समय है, तो वह अपेक्षित दावेदारों की जगह किसी नए चेहरे को सामने ला सकती है।इस पूरे समीकरण में जनता दल (यूनाइटेड) की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। जदयू के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह नीतीश कुमार के बाद अपनी राजनीतिक पहचान को कैसे बनाए रखे। पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में कई अनुभवी नेता हैं, लेकिन नीतीश के कद का नेतृत्व तैयार करना आसान नहीं होगा। इसलिए जदयू के सामने भी यह चुनौती है कि वह ऐसा चेहरा सामने लाए जो पार्टी को एकजुट रख सके।
दूसरी ओर विपक्ष भी इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। खास तौर पर लालू पुत्र तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी इस स्थिति को राजनीतिक अवसर के रूप में देख सकती है। विपक्ष का प्रयास रहेगा कि इस परिवर्तन को सत्ता की अस्थिरता के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यदि नया मुख्यमंत्री अपेक्षाकृत कम अनुभव वाला हुआ, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता है। बिहार की राजनीति इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। चार महीनों में नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना और नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना दो ऐसे अप्रत्याशित निर्णय सामने आए हैं जिन्होंने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है। अब सबकी नजर भाजपा के तीसरे दांव पर है और वह है मुख्यमंत्री का चेहरा। अब यह निर्णय अपेक्षित होगा, या फिर वही होगा जिसकी चर्चा अभी तक किसी ने नहीं की? यह आज की राजनीति का यक्ष प्रश्न है। राजनीति में समय-समय पर ऐसी परिस्थितियां आती हैं जब फैसले केवल तत्काल के लिए नहीं, बल्कि आने वाले कई वर्षों की दिशा तय करने के लिए, लिए जाते हैं। बिहार में पिछले चार महीनों की घटनाएं भी कुछ ऐसा ही संकेत देती हैं। यदि भाजपा की राजनीतिक शैली को देखें, तो यह स्पष्ट संभावना बनी हुई है कि बिहार की सत्ता में भी कोई ऐसा ही चेहरा सामने आएगा जो आज की चर्चा का हिस्सा नहीं है। पवन वर्मा

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