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Bhopal वैश्विक संकट के दौर में प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र निर्माण का महामंत्र Prime Minister Modi's mantra for nation-building in times of global crisis

 


Upgrade Jharkhand News. प्रधानमंत्री द्वारा कल देश के नाम की गई अपील महज एक सरकारी वक्तव्य नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में एक गहरे आर्थिक दर्शन का शंखनाद है। उन्होंने राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को एक नई भूमिका सौंपते हुए आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हममें से हर किसी को देश हित में  'वित्त मंत्री' बनना होगा। यह विचार इस बुनियादी सत्य पर आधारित है कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था मंत्रालयों की फाइलों में नहीं, बल्कि देश के करोड़ों घरों की रसोई, बजट और निवेश के निर्णयों में धड़कती है।जब हम 'वित्त मंत्री' बनने की बात करते हैं, तो इसका अर्थ केवल किफ़ायत बरतना नहीं है, बल्कि एक सजग और सक्रिय आर्थिक नागरिक बनना है। जिस तरह देश का वित्त मंत्री सीमित संसाधनों में अधिकतम विकास का खाका तैयार करता है, उसी तरह हर नागरिक को अपने व्यक्तिगत संसाधनों का प्रबंधन राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में करने की आवश्यकता है। हमारे द्वारा की गई एक छोटी सी बचत जब बैंक के माध्यम से देश के वित्तीय तंत्र में प्रवेश करती है, तो वह केवल हमारी निजी संपत्ति नहीं रह जाती, बल्कि वह राष्ट्र के बुनियादी ढांचे , सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण के लिए ऑक्सीजन का काम करती है।


इस विचार का एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण पहलू है 'खपत का चरित्र'। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि हमारे क्रय निर्णय (Buying Decisions) देश की दिशा तय करते हैं। जब एक जागरूक नागरिक के रूप में हम विदेशी चमक-धमक के बजाय 'स्वदेशी' और 'लोकल' उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तो हम अनजाने में ही सीमा पर तैनात सैनिक की तरह देश की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा कर रहे होते हैं। एक गृहणी जब घर के बजट में स्थानीय हस्तशिल्प या ग्रामीण उत्पादों को जगह देती है, तो वह सीधे तौर पर एक बुनकर या छोटे उद्यमी के घर में खुशहाली का दीया जलाती है। यही वह 'माइक्रो-मैनेजमेंट' है, जो वृहद स्तर पर भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगा। भोजन में तेल की मात्रा हमारे स्वास्थ्य के साथ ही देश के आयात को प्रभावित करती है। इसके साथ ही, डिजिटल लेन-देन को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना अब केवल आधुनिकता का पैमाना नहीं, बल्कि एक देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य बन चुका है। पारदर्शी लेनदेन से न केवल काले धन पर लगाम लगती है, बल्कि अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाला रक्त भी शुद्ध होता है। प्रधानमंत्री की यह अपील हमें यह भी सिखाती है कि अपव्यय रोकना ही सबसे बड़ी कमाई है। संसाधनों का अपव्यय चाहे वह अन्न का हो, ऊर्जा का हो या धन का, अंततः राष्ट्र की ही हानि है। पूल करके या सार्वजनिक परिवहन से यात्रा से जो पेट्रोल बचेगा वह हमारा घरेलू ही नहीं देश का बजट भी सुधारेगा। 


यह अपील हमें एक उपभोक्ता से ऊपर उठाकर एक राष्ट्र-निर्माता के पायदान पर खड़ा करती है। जब देश का हर व्यक्ति वित्तीय रूप से साक्षर होगा, जिम्मेदारी से खर्च करेगा और सूझबूझ से निवेश करेगा, गोल्ड की खरीदी रोकेगा  तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने में  मदद होगी। अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम अपनी फाइलों और हिसाब की डायरियों को देश के भविष्य से जोड़ें। वाकई, यदि हम सब अपने घर के कुशल वित्त मंत्री बन सकें, तो 140 करोड़ हाथों के साथ देश की तरक्की भी होगी। विवेक रंजन श्रीवास्तव



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