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Jamshedpur शब्दों का सुकुमार शिल्पी, जिसने सिनेमा को उसका 'अमिताभ' दिया The delicate craftsman of words, who gave cinema its 'Amitabh'

 


​Upgrade Jharkhand News. ​उत्तराखंड की गोद में बसे अल्मोड़ा के खूबसूरत कस्बे कौसानी में 20 मई 1900 को जब एक बालक ने आंखें खोलीं, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि प्रकृति की वादियों से निकला यह बालक आगे चलकर हिंदी साहित्य की दशा और दिशा बदल देगा। मूल नाम 'गुसाईं दत्त' रखने वाले इस बालक को अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने खुद अपना नाम बदलकर 'सुमित्रानंदन पंत' रख लिया। प्रकृति के इस सुकुमार कवि का जीवन सिर्फ शब्दों और कविताओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका जीवन भारतीय इतिहास, संस्कृति और आने वाले समय के महानायक के उदय की एक ऐसी पटकथा लिख रहा था, जिसका असर आज भी हिंदी सिनेमा और साहित्य पर साफ देखा जा सकता है।​हिंदी साहित्य में छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों (जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत) में से एक पंत जी का व्यक्तित्व जितना सौम्य था, उनकी दूरदर्शिता उतनी ही गहरी थी। आज जब हम उनके जन्म के सवा सौ साल के सफर को देखते हैं, तो उनका एक ऐसा अनूठा रूप सामने आता है जो केवल किताबों में बंद नहीं है, बल्कि भारतीय जनमानस की रग-रग में दौड़ रहा है।


​यह साल 1942 का था। पूरा देश महात्मा गांधी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की आग में तप रहा था। हर तरफ क्रांतिकारी नारे गूंज रहे थे और आजादी का जज्बा उफान पर था। इसी माहौल के बीच इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन के घर एक किलकारी गूंजी। उनके बड़े बेटे का जन्म हुआ। देश के हालातों और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से प्रभावित होकर हरिवंश राय जी ने अपने नवजात शिशु का नाम रखने का मन बनाया—'इंकलाब'।​लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच की दोस्ती महज साहित्यिक नहीं थी, वह दो जिस्म और एक जान जैसी थी। एक शाम जब पंत जी अपने परम मित्र के घर नवजात बालक को देखने पहुंचे, तो कमरे का माहौल ही बदल गया।


​पंत जी ने जब पालने में सो रहे बालक को देखा, तो वे मंत्रमुग्ध रह गए। बालक के चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव, शांति और एक अलौकिक चमक थी। प्रकृति के सौंदर्य को शब्दों में ढालने वाले कवि की पारखी नजरों ने बालक के भीतर छिपे एक विराट व्यक्तित्व को भांप लिया था। उनके मुंह से अनायास ही फूटा, "बच्चन जी, यह बालक कितना शांत और ध्यानमग्न लग रहा है, मानो साक्षात बुद्ध की करुणा इसमें समाई हो। यह इंकलाब नहीं, यह तो 'अमिताभ' है।"'अमिताभ' का सीधा सा अर्थ होता है— "ऐसा प्रकाश जो कभी न बुझे" असीम आभा वाला। माता तेजी बच्चन और पिता हरिवंश राय बच्चन को पंत जी द्वारा सुझाया गया यह नाम इतना पसंद आया कि उन्होंने तुरंत अपने बेटे का नाम 'अमिताभ' रख दिया। कौन जानता था कि कौसानी के पहाड़ों से आया एक कवि, इलाहाबाद की एक साधारण सी कोठरी में बैठकर जिस बच्चे का नामकरण कर रहा है, वह बच्चा आगे चलकर भारतीय सिनेमा का 'सेंचुरी का महानायक' बनेगा और उसका प्रकाश सचमुच कभी न बुझने वाला साबित होगा।


१७, कैवेंडिश रोड,जहाँ दो युगद्रष्टा एक साथ रहते थे।​हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रानंदन पंत का रिश्ता उस दौर की साहित्यिक विधा का सबसे खूबसूरत उदाहरण है। जब पंत जी आर्थिक और मानसिक रूप से कुछ परेशान थे और इलाहाबाद आए, तो बच्चन जी ने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया। इलाहाबाद का '१७, कैवेंडिश रोड' सिर्फ एक मकान नहीं था, बल्कि वह हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी कर्मस्थली बन चुका था।​पंत जी कई सालों तक बच्चन परिवार के साथ एक ही छत के नीचे रहे। अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन के लिए वे 'पंत जी अंकल' नहीं, बल्कि परिवार के सबसे बड़े और सम्मानित मार्गदर्शक थे। अमिताभ बच्चन ने कई साक्षात्कारों में भावुक होकर याद किया है कि कैसे पंत जी की लंबी घुंघराली जुल्फें, उनका सफेद कुर्ता और उनका सौम्य स्वभाव उनके बचपन की सबसे सुंदर स्मृतियों में से एक है।​इन दोनों कवियों की जुगलबंदी इतनी गहरी थी कि उन्होंने मिलकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित एक साझा कविता संग्रह 'खादी के फूल' की रचना की। एक ही समय में दो अलग-अलग धाराओं के कवि (बच्चन जी हालावाद और सीधे संवाद के कवि थे, जबकि पंत जी छायावाद और दार्शनिकता के) का एक साथ रहना और मिलकर रचना करना साहित्यिक दुनिया का एक दुर्लभ अध्याय है।


 हिंदी के 'वर्ड्सवर्थ' और उनकी कालजयी रचनाएँ है।​अंग्रेजी साहित्य में जो स्थान विलियम वर्ड्सवर्थ को उनकी प्रकृति-प्रेम कविताओं के लिए मिला है, वही स्थान हिंदी साहित्य में सुमित्रानंदन पंत का है। उनकी कविताओं को पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो पाठक किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि पहाड़ों, झरनों, नदियों और लहलहाती फसलों के बीच खड़ा है। पंत जी की लेखनी में प्रकृति सजीव हो उठती थी।​उनकी साहित्यिक यात्रा को हम कुछ प्रमुख पड़ावों और रचनाओं के माध्यम से समझ सकते हैं।

​चांदनी रात में गंगा नदी की लहरों पर तैरती नाव का जो वर्णन पंत जी ने अपनी कविता 'नौका विहार' में किया है, वह बेजोड़ है। 


वे लिखते हैं:

​"शांत, स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल!

अपलक अनंत, नीरव भूतल!"

​इस कविता में केवल नदी का सौंदर्य नहीं है, बल्कि नाव के आगे बढ़ने के साथ-साथ जीवन के रहस्य और दर्शन को भी उन्होंने समझाया है कि कैसे जीवन भी एक नौका विहार की तरह है जो निरंतर आगे बढ़ता रहता है। ​प्रकृति में सुबह की पहली किरण के आने पर जो बदलाव होते हैं, चिड़ियों का जो चहकना शुरू होता है, उसे पंत जी ने कौतूहल और विस्मय के साथ देखा। उनकी पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं: ​"प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना? कहाँ-कहाँ हे बाल-विहंगिनि! पाया यह स्वर्गिक गाना?" ​शहरी कोलाहल से दूर पंत जी का दिल हमेशा भारत के गांवों में बसता था। 'ग्राम श्री' कविता में उन्होंने गांव के खेतों में लहराती फसलों, पेड़ों पर लदे फलों और सर्दियों की सुनहरी धूप का ऐसा सजीव चित्र खींचा है कि आंखें बंद करते ही गांव का परिदृश्य सामने आ जाता है।

​लोग अक्सर पंत जी को केवल सौंदर्य का कवि मानते हैं, लेकिन वे समाज की कड़वी सच्चाई से भी वाकिफ थे। अपनी कविता 'ताज' में उन्होंने विश्व के अजूबे ताजमहल की भव्यता की प्रशंसा करने के बजाय, उसके निर्माण में मरे गरीब मजदूरों और इंसानी लाशों पर बने उस मकबरे पर सवाल खड़े किए। यह उनकी प्रगतिवादी और मानवतावादी सोच का प्रमाण था। ​सुमित्रानंदन पंत जी का साहित्यिक कद इतना बड़ा था कि उन्हें सम्मान ढूंढने नहीं जाते थे, बल्कि सम्मान खुद उनके नाम से गौरवान्वित होते थे। साल 1968 में जब देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' की घोषणा हुई, तो हिंदी भाषा के लिए यह पुरस्कार सबसे पहले सुमित्रानंदन पंत जी को उनकी महान कृति 'चिदंबरा' के लिए दिया गया।​'चिदंबरा' में पंत जी की चेतना का चरम उत्कर्ष देखने को मिलता है। इसमें उन्होंने भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच के संतुलन को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। इसके अलावा भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण (1961) और उनकी कृति 'कला और बूढ़ा चांद' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा।



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