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Bhopal दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सूर्यास्त, 2003 का जनसन्देश कांग्रेस ने 23 साल बाद समझा Digvijay Singh's political sunset: Congress understood the message of 2003 after 23 years

 


Upgrade Jharkhand News.  ध्य प्रदेश की राजनीति के लंबे गलियारे में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सूर्यास्त एक ऐसी सच्चाई है जिसे स्वीकार करने के लिए कांग्रेस को पूरे तेईस साल का लंबा और कष्टकारी समय लगा। साल 2003 में जनता ने जो स्पष्ट संदेश दिया था, उसे समझने में कांग्रेस के नेतृत्व ने जितनी देरी की, उसी का परिणाम है कि आज प्रदेश में कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा है। वर्ष 2003 के उस विधानसभा चुनाव में जब दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस महज 37 सीटों पर सिमटकर रह गई थी, तभी जनता ने स्पष्ट कर दिया था कि दिग्विजय सिंह अपनी उपयोगिता खो चुके है। लेकिन उस जनादेश को पढ़ने और उसके अनुरूप निर्णय लेने में कांग्रेस ने दो दशक से अधिक का समय गंवा दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे  केवल एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जड़ता के अंत की शुरुआत माना जा रहा है, जिसने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को एक ऐसी दिशा में धकेल दिया जहाँ से वापसी दिन प्रति दिन कठिन होती जा रही है।


​दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर छह दशकों से अधिक का है, लेकिन उनका शासनकाल विशेष रूप से 1993 से 2003 तक, राज्य की राजनीति के लिए एक ऐसा मील का पत्थर रहा जिसने राज्य को दो ध्रुवों में बांट दिया। मुख्यमंत्री के रूप में उनके उन दस वर्षों को आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि जनता का मोहभंग उस समय ही शुरू हो गया था। सड़कें, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव और प्रशासनिक अव्यवस्था ने उस समय के मतदाता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या यह वही नेतृत्व है जिस पर उन्होंने भरोसा जताया था? 2003 का वह ऐतिहासिक जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, वह जनादेश दिग्विजय सिंह की कार्यशैली को लेकर कांग्रेस को दिया गया एक संदेश था। दुर्भाग्य से, कांग्रेस आलाकमान ने इस संदेश को या तो नजरअंदाज किया या फिर उसे समझने में गंभीर भूल की।


​कांग्रेस नेतृत्व की यह सबसे बड़ी विफलता रही कि उसने 2003 के बाद भी दिग्विजय सिंह को हाशिए पर लाने के बजाय, उन्हें दिल्ली की राजनीति में सक्रिय कर दिया। पार्टी को शायद यह लगा कि दिल्ली के गलियारों में बैठकर वे पार्टी को नई ऊर्जा दे सकेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी। मध्य प्रदेश में 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव इस बात के प्रमाण थे कि यहां की जनता ने दिग्विजय सिंह को स्वीकार करना बंद कर दिया है। इन चुनावों में पार्टी की लगातार हार ने यह साबित कर दिया कि वे न तो पार्टी को जिताने की स्थिति में हैं और न ही उनके चेहरे पर जनता भरोसा करने को तैयार है। फिर भी, कांग्रेस ने उन्हें बतौर तोहफा 2014 में राज्यसभा भेजा। यह कदम भी पार्टी के लिए फायदे वाला साबित नहीं हुआ । उल्टे यह संदेश गया कि पार्टी आलाकमान को दिग्विजय सिंह पर भरोसा उस स्थिति में भी कायम है जब पार्टी 2003, 2008 और 2013 का विधानसभा चुनाव हार गई। हर हार में दिग्विजय सिंह और उनके गुट की भूमिका को नज़र अंदाज़ किया गया। 


​2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति में तब थोड़ा सुधार हुआ, जब कमलनाथ जैसे दिग्गज नेता ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली। लेकिन इस समय को भी  दिग्विजय सिंह के प्रभाव से जोड़कर देखना एक राजनीतिक भूल रही। उस समय सत्ता के गलियारों में जो अस्थिरता पैदा हुई और जिस तरह से सरकार का संचालन हुआ, उसने एक बार फिर जनता को यह अहसास कराया कि पुराने खिलाड़ी अभी भी परदे के पीछे से खेल खेल रहे हैं। इसके बाद जब कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी, तब भी दिग्विजय सिंह की अति-सक्रियता ने पार्टी की छवि को नुकसान ही पहुंचाया। नतीजे में सरकार गिर गई, उनके मंत्रियों के विवाद भी उभरकर सामने आए थे। कमलनाथ सरकार में जब उन्होंने भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, तो जनता ने उन्हें न केवल हराया बल्कि यह संदेश भी दिया कि राजधानी के प्रबुद्ध मतदाता अब उनकी राजनीति के साथ नहीं हैं। भोपाल की यह हार उनके राजनीतिक अंत की एक और कड़ी थी, जिसे भी शायद कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया।


​अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने की हताशा में दिग्विजय सिंह ने अपने सबसे सुरक्षित क्षेत्र राजगढ़ का रुख किया। राजगढ़ को दिग्विजय सिंह का गढ़ माना जाता है और यहां उन्हें राजा दिग्विजय सिंह कहा जाता है,लेकिन राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह यहां से 2024 का लोकसभा चुनाव भी भारी अंतर से हार गए। एक नेता के लिए अपने सबसे मजबूत किले से चुनाव हार जाना, उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता के पूरी तरह खत्म होने का अंतिम संकेत होता है। राजगढ़ की जनता ने भी उन्हें नकार दिया, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अब केवल इतिहास का हवाला देकर चुनाव नहीं जीते जा सकते। जनता ने यह साफ कर दिया कि दिग्विजय सिंह का वह युग, जिसमें वे प्रदेश की राजनीति की धुरी हुआ करते थे, अब पूरी तरह से अतीत का हिस्सा बन चुका है। कांग्रेस का उन्हें 23 साल तक ढोना उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी। यदि 2003 में ही पार्टी ने नई पीढ़ी के हाथों में बागडोर सौंप दी होती, तो आज कांग्रेस मध्य प्रदेश में इतनी कमजोर स्थिति में नहीं होती।  ​दिग्विजय सिंह की राजनीति की विशेषता या त्रासदी यह रही है कि वे हमेशा विवादों को अपनी ढाल बनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन बाद में यही विवाद उनके राजनीतिक व्यक्तित्व पर भारी पड़ते गए। बयानों में मर्यादा का उल्लंघन हो या फिर राज्य में गुटबाजी को बढ़ावा देने का आरोप, दिग्विजय सिंह ने एक ऐसी विरासत छोड़ी है जिसने कांग्रेस को एकजुट करने के बजाय उसे बिखरने पर मजबूर किया। 


आज मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जो दयनीय स्थिति है, उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने वालों की कमी नहीं है। राज्यसभा की उम्मीदवारी से उनका हटना और उसकी आड़ में सामाजिक संतुलन का तर्क देना, दरअसल उस विवशता को ढंकने का प्रयास है जो पार्टी के भीतर उनके घटते कद को दर्शाती है। पार्टी नेतृत्व अब यह समझ चुका है कि दिग्विजय सिंह एक जिताऊ नेता तो रहे नहीं, बल्कि अब  वे पार्टी पर बोझ बनते जा रहे हैं। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह का युग समाप्त हो चुका है, यह बात अब केवल जनता ने ही नहीं, बल्कि खुद पार्टी ने भी राज्यसभा में उन्हें न भेजकर स्वीकार कर ली है। अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस अपनी इस सीख को केवल एक घटना तक सीमित रखती है या फिर आगे भी ऐसी ही गलतियां दोहराती है। यह एक ऐसी विदाई है जो 2003 में ही अपेक्षित थी, लेकिन देर आए दुरुस्त आए के तर्ज पर, कम से कम आज मध्य प्रदेश कांग्रेस के पास एक नया अध्याय लिखने का अवसर है। दिग्विजय का राजनीतिक सूर्यास्त अब पूर्ण हो चुका है, और अब प्रदेश को एक ऐसे सूर्योदय की प्रतीक्षा है जो पुरानी गलतियों के बोझ से मुक्त हो। कांग्रेस इस आत्ममंथन के बाद अपनी खोई हुई साख फिर से प्राप्त कर पाती है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन इतना निश्चित है कि भविष्य की राजनीति में दिग्विजय सिंह का स्थान अब केवल इतिहास के पन्नों में ही होगा।  पवन वर्मा



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