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Bhopal बिरसा मुंडा की विरासत और जल-जंगल-जमीन का संकट Birsa Munda's legacy and the crisis of water, forest and land

 


Upgrade Jharkhand News.  बिरसा मुंडा ने अपना पूरा जीवन जल- जंगल-ज़मीन को बचाने के लिए समर्पित किया और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ उलगुलान से आदिवासी सभ्यता की रक्षा कर, अपना अमूल्य योगदान दिया। वे भारत के एक महान आदिवासी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था। धरती आबा बिरसा मुंडा का उलगुलान भूमि से लेकर धर्म सम्बन्धी तमाम समस्याओं के खिलाफ जनसंघर्ष था तथा उन समस्याओं के खिलाफ राजनीतिक समाधान का प्रयास भी। वह आदिवासी और खासकर मुंडा समाज की आंतरिक बुराईयों और कमजोरियों को दूर करने का सामूहिक अभियान भी था। समाज के परंपरागत प्रकृति निर्भर तत्व ने आर्थिक समाजवाद की अवधारणा को बिरसा के अंदर जागृत किया । गांधी से पहले गांधी की अवधारणा के तत्व के उभार के पीछे भी बिरसा का समाज एवं पड़ोस के सूक्ष्म अवलोकन एवं उसे नयी अतंर्दृष्टि देने का तत्व ही था। तभी तो उन्होंने गांधी के समान समस्याओं को देखा,सुना, फिर चिंतन-मनन किया। उन्होंने मुंडा समाज को पुनर्गठित करने का जो प्रयास किया, वह अंग्रेजी हुकूमत के लिये विकराल चुनौती बनी। नये बिरसाइत धर्म की स्थापना की तथा लोगों को नई सोच दी, जिसका आधार सात्विकता, आध्यात्मिकता, परस्पर सहयोग,एकता व बंधुता था। समस्या के कारणों को ढूंढ़ ‘गोरों वापस जाओ’ का नारा दिया एवं परंपरागत लोकतंत्र की स्थापना पर बल दिया, ताकि शोषणमुक्त ‘आदिम साम्यवाद ’ की स्थापना हो सके। उन्होंने कहा -‘महारानी राज जाएगा एवं अबुआ राज आएगा।      



1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शांत होने के बाद सरदार आंदोलन संगठित जनांदोलन के रूप में शुरू हो गया। 1858 से भूमि आंदोलन के रूप में विकसित यह आंदोलन 1890 में राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया, जब बिरसा मुंडा ने इसकी कमान संभाली। बिरसा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को खूंटी जिले के अड़की प्रखंड के उलिहातु गांव में हुआ था। व्यक्तित्व निर्माण और तालीम ईसाई मिशनरियों के संरक्षण में हुई। स्कूली शिक्षा के दौरान बिरसा में विद्रोह के लक्षण प्रकट होने लगे। आदिवासियों में भूतकेता पहनाई आदि की परंपरा है। वे धार्मिक कृत्यों के लिये जमीन छोड़ते हैं। उस समय ईसाई पादरी उस जमीन पर मिशन का कब्जा करने की कोशिश करते थे।  बिरसा ने इसकी शिनाख्त ईसाई मिशनरियों और गोरों की साजिशों के रूप में की और इसकी आलोचना की, जिस कारण वे स्कूल से निकाल दिये गये। इसके बाद वे सरदार आंदोलन में शमिल हो गये। ईसाई मिशन की सदस्यता छोड़ 1890-91 से करीब पांच साल तक वैष्णव संत आनंद पांड से हिन्दुओं के वैष्णव पंथ के आचार का ज्ञान प्राप्त किय और व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन पर धर्म के प्रभाव का मनन किया। परंपरागत धर्म की ओर उनकी वापसी हुई और उन्होंने धर्मोपदेश देना तथा धर्माचरण का पाठ पढ़ाना शुरू किया । ईसाई धर्म छोड़नेवाले सरदार बिरसा के अनुयायी बनने लगे। बिरसा का पंथ मुंडा जनजातीय समाज के पुनर्जागरण का जरिया बना । उनका धार्मिक अभियान प्रकारांतर से आदिवासियों को अंग्रेजी हुकूमत और ईसाई मिशनरियों के विरोध में संगठित होकर आवाज बुलंद करने को प्रेरित करने लगा। उस दौर में उनकी लोकप्रियता इस कदर परवान चढ़ी कि उनके अनुयायी ‘बिरसाइत’ कहलाने लगे। उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार अपनाने का उपदेश दिया और मुंडा समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया । वह जनेऊ, खड़ाऊ और हल्दी रंग की धोती पहनने लगे। उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है और वह है सिंगवोंगा। भूत-प्रेत की पूजा और बलि देना निरर्थक है।सार्थक जीवन के लिये सामिष भोजन अथवा मांस-मछली का त्याग करना जरूरी है। हड़िया पीना बंद करना होगा।


बिरसा के लोकप्रिय व्यक्तित्व के कारण सरदार आंदोलन में नई जान आ गयी। अगस्त 1895 में वन सम्बन्धी बकाये की माफी का आंदोलन चला। उसका नेतृत्व बिरसा ने किया। धर्मिक आधारों पर एकजुट बिरसाइतो का संगठन जुझारू सेना की तरह मैदान मे उतर गया। बकाये की माफी के लिये उन्होंने चाईवासा तक की यात्रा की तथा रैयतों को एकजुट किया। अंग्रेजी हुकूमत ने बिरसा की मांग को ठुकरा दिया। बिरसा ने भी ऐलान कर दिया कि -‘ सरकार खत्म हो गयी। अब जंगल जमीन पर आदिवासियों का राज होगा। 9 अगस्त 1895 को चलकद में पहली बार बिरसा को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनके अनुयायियों ने उन्हे छुड़ा लिया।16 अगस्त 1895 को गिरफ्तार करने की योजना के साथ आये पुलिस बल को बिरसा के नेतृत्व में सुनियोजित ढ़ंग से घेरकर खदेड़ दिया। इससे बौखलाई अंग्रेजी हुकूमत ने 24 अगस्त 1895 को पुलिस अधीक्षक मेयर्स के नेतृत्व में पुलिस बल चलकद रवाना किया तथा रात के अंधेरे में उन्हें गिरफ्तार  कर लिया गया। उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के लिये उकसा रहे थे। मुंडा और कोल समाज ने बिरसाइतों के नेतृत्व में सरकार के साथ असहयोग करने का ऐलान कर दिया। व्यापक विरोध के कारण मुकदमा चलाने का स्थान रांची से बदलकर खूंटी कर दिया गया, लेकिन विरोध के तेवर में फर्क नहीं पड़ने के कारण मुकदमे की कार्रवाई रोककर बिरसा को तुरंत जेल भेज दिया गया। भा़दवि की धारा 505 के तहत मुकदमा चला तथा उन्हें दो साल सश्रम कारावास की सजा सुनायी गयी। उन्हें रांची से हजारीबाग जेल भेज दिया गया। 1997 में झारखंड में भीषण अकाल पड़ा तथा चेचक की महामारी भी फैली। आदिवासी समाज बिरसा के नेतृत्व के अभाव में भी  दमन-शोषण, अकाल तथा महामारी से एकसाथ जूझता रहा।


30 नवम्बर 1897 को बिरसा जेल से छूटे तथा चलकद लौटकर अकाल तथा महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में जुट गये। उनका यह कदम अपने अनुयायियों को संगठित करने का आधार बना। फरवरी 1898 में डोम्बारी पहाड़ी पर मुंडारी क्षेत्र से आये मुंडाओं की सभा में उन्होंने आंदोलन की नई नीति की घोषणा की तथा खोये राज्य की वापसी के लिये धर्म तथा शांति का  मार्ग अपनाने का आह्वान किया। उनके अभियान के तहत सामाजिक तथा सांस्कृतिक पक्ष को केन्द्र में रखकर आदिवासी समाज को मजबूत तथा संगठित करने का सिलसिला जारी रहा। 1889 के अंत में यह अभियान रंग लाया और अधिकार हासिल करने, खोये राज्य की प्राप्ति का लक्ष्य, जमीन को मालगुजारी से मुक्त करने तथा जंगल के अधिकार को वापस लेने के लिये व्यापक गोलबंदी शुरू हुई। कोलेबिरा, बानो लोहरदग्गा, तोरपा, कर्रा, बसिया, खूंटी, मुरहु, बुंडु, तमाड़, पोड़ाहाट, सोनाहातु आदि स्थानों पर बैठक हुई। 24 दिसम्बर 1899 को रांची के तोरपा, खूंटी, तमाड़ बसिया, आदि से लेकर सिंहभूम जिला के चक्रधरपुर थाने तक में विद्रोह की आग भड़क उठी। विद्रोह के दमन के लिये सिंहभूम से रांची तक 500 वर्गमील क्षेत्र में सेना और पुलिस की कम्पनी बुलाकर बिरसा की गिरफ्तारी का अभियान तेज किया गया। सरदारों पर हमला करने और आंदोलन का साथ देनेवालो मुंडा-मानकियों को गिरफ्तार करने व आत्मसमर्पण न करनेवाले विद्रोहियों की घर,सम्पत्ति कुर्क करने की योजना को अमलीजामा पहनाया जाने लगा। सरकार ने बिरसा की सूचना देनेवालों और गिरफ्तारी में मदद देने वालों, मुंडा या मानकी को पांच सौ रुपए पुरस्कार देने का ऐलान किया। बावजूद इसके पुलिस बिरसा को गिरफ्तार नहीं कर पायी। बिरसा ने आंदोलन की रणनीति बदली, साठ स्थानों पर संगठन के केन्द्र बने। डोम्बारी पहाड़ी पर मुंडाओं की बैठक में ‘उलगुलान ’ का ऐलान किया गया। बिरसा के इस आंदोलन की तुलना आजादी के आंदोलन में बहुत बाद में 1942 के अगस्त क्रांति के काल से की जा सकती है। 


बिरसा के नेतृत्व में अफसरों, पुलिस, अंग्रेज सरकार के संरक्षण में पलनेवाले जमींदारों और महाजनों को निशाना बनाया गया। खूंटी, तोरपा, बसिया, तमाड़, सर्बादा, मुरहू, चक्रणरपुर, पोड़ाहाट रांची और सिंहभूम में गोरिल्ला युद्ध ने हुकूमत की चूलें हिला दी। आंदोलन को कुचलने के लिये रांची और सिंहभूम को सेना के हवाले कर दिया गया। 8 जनवरी 1900 को डोम्बारी पहाड़ियों पर जमी बिरसाइत के जत्थे पर सेना ने आक्रमण कर दिया तथा युद्ध के दौरान लगभग 200 मुंडा मारे गये। सैलरकब पहाड़ी पर भी संघर्ष हुआ। इसके बाद भी बिरसा पकड़ में नहीं आये। आंदोलन की रणनीति के तहत अपने आंदोलन के केन्द्र बदले तथा घने जंगलों में संचालन के केन्द्र बनाये गये। जमकोपाई तथा पोड़ाहाट के जंगलों में संगठन तथा प्रशिक्षण के कैंप बनाये गये। 3 फरवरी 1900 को सेंतरा के पश्चिम जंगल में बने शिविर से बिरसा को उस समय गिरफ्तार किया गया, जब वे गहरी नींद मे सोये हुए थे। पुलिस के भारी बंदोबस्त के  साथ उन्हें तत्काल खूटी के रास्ते रांची कारागार लाकर बंद कर दिया गया। बिरसा के साथ अन्य 482 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ 15 आरोप दर्ज किये गये। शेष अन्य  गिरफ्तार लोगों में सिर्फ 98 के खिलाफ आरोप सिद्ध हो पाए। बिरसा के विश्वासी गया मुंडा और उनके पुत्र सानरे मुंडा को फांसी दी गयी। गया मुंडा की पत्नी मांकी को दो वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी। मुकदमे की सुनवाई के शुरूआती दौर में उन्होंने जेल में भोजन करने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। अदालत ने तबियत खराब होने की वजह से जेल वापस भेज दिया । 1 जून को जेल अस्पताल के चिकित्सक ने सूचना दी कि बिरसा को हैजा हो गया है और उनके जीवित रहने की संभावना नहीं है। 9 जून 1900 की सुबह सूचना दी गयी कि बिरसा नहीं रहे। इस तरह एक क्रांतिकारी जीवन का अंत हो गया। 


बिरसा के संघर्ष के परिणामस्वरूप छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 बना। जल,जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकार की रक्षा के लिये शुरू हुए आंदोलन एक के बाद एक श्रृंखला में गतिमान रहे तथा इसकी परिणति अलग झारखंड राज्य के रूप में हुई, लेकिन अबुआ दिशुम का सपना साकार नहीं हो सका।              बिरसा के द्वारा स्थापित बिरसाइत पंथ आज भी कायम है। खूंटी जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर जंगल के बीच बिरसाइतों का गांव है अनिगड़ा। बिरसाइत सम्प्रदाय से जुड़े लोग मांस मछली नहीं खाते हैं, तुलसी की पूजा करते हैं। सूती वस्त्र पहनते  हैं तथा नशे से दूर रहते है। हिंसा से दूर रहकर अहिंसा का पालन करते है। अनगड़ा में ही उदय मुडा को फांसी दी गयीं।  कभी इस गांव में बिरसाइतों की संख्या 50 थी। अब ये नाममात्र के रह गये हैं। ये अपनी गरीबी और मुश्किलों से नाराज नहीं है, पर सरकारी उपेक्षा से ज्यादा दुखी है। यदि अंग्रेजों ने शोषण किया तो आजाद भारत की सरकार ने भी कम धोखा नहीं दिया। आजादी के बाद भी लगान- सूद से मुंडाओं को मुक्ति नहीं मिली। जल,जंगल,जमीन पर अधिकार नहीं मिला। अबुआ दिशुम का सपना पूरा नहीं हुआ। 


आज भी आदिवासियों की जल, जंगल, जमीन छीनी जा रही है। अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को विस्थापन के खिलाफ आवाज उठाने पर "नक्सलवादी" का ठप्पा लगाकर गोली मारी जा रही है। भूमाफियाओं द्वारा खुलेआम जमीन हड़पी जा रही है और आदिवासी समाज को समान वर्ग में परिवर्तित करने का षड्यंत्र चल रहा है। बफर जोन, वन सौंदर्यकरण, सिंचाई परिसर और बांधों के नाम पर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र से आदिवासियों को कौड़ी के मोल मुआवजा देकर विस्थापित किया जा रहा है। अबुआ दिशुम-अबुआ राईज मात्र नारा बनकर रह गया है।    सीएनटी-एसपीटी एक्ट और संविधान प्रदत्त पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून, वनाधिकार कानून तथा न्यायिक निर्णय, समता जजमेंट आदि मुद्दों पर राज्य गठन होने के बाद जो सार्थक प्रयास केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा होना चाहिए, वो अब तक दिखाई नहीं दे रहा है।


वर्तमान दौर का समय कहीं ज्यादा प्रतिकूल है। भारत में अधिकांश विकास परियोजनाएं संविधान की पांचवीं अनुसूची वाले आदिवासी क्षेत्रों में स्थापित की जा रही है ।क्योंकि संसाधनों के मामले में आदिवासी क्षेत्र समृद्ध रहा है और अब भी है। इस इलाके में देश का 71 फीसदी जंगल, 92 फीसदी कोयला, 78 फीसदी लोहा, 100 फीसदी यूरेनियम, 85 फीसदी तांबा, 65 फीसदी डोलोमाइट इत्यादि की भरमार है। भारत के जल स्रोत का 70 फीसदी जल आदिवासी इलाके में है तथा  उद्योगों के लिए कच्चा माल इन्ही क्षेत्रों से मिलता है। यह प्रकृति की ओर से मिला वरदान है लेकिन यही वरदान इनके लिए चुनौती भी है, क्योंकि इन्ही संसाधनों की लूट और कब्जे को लेकर देश और दुनिया के कार्पोरेट की गिद्ध दृष्टि लगी है। इन संसाधनों पर काबिज होने की प्रक्रिया काफी तेज हो गयी है। द्रुत गति से बढ़ रही कथित विकास परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन का समाधान निकालने के लिए अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है। तेजी से बढ़ते विस्थापन की सबसे अधिक मार देश के आदिवासियों पर पड़ रही है। ऐसे में बिरसा मुंड़ा के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करना और श्रद्धांजलि देना महज औपचारिकता ही प्रतीत होता है। कुमार कृष्णन



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