Upgrade Jharkhand News. देश भर में ग्रीष्मकाल में होटल व विभिन्न पर्यटन स्थलों में भीड़ बढ़ना नई बात नहीं है। दिल्ली के मालवीय नगर का होटल विगत तीन जून को जानलेवा अग्निकुंड में तब्दील हो गया, तथा मात्र छह कमरों की अनुमति के उपरांत तैंतीस कमरों के इस होटल की खामियां अग्नि शमन विभाग व प्रशासन को उस समय नजर आई, जब अग्निकुंड में अधिकांश विदेशी नागरिकों सहित इक्कीस मानवदेह अग्नि की भेंट चढ़ गई। प्राथमिक जाँच पड़ताल में यह तथ्य संज्ञान में आया कि होटल मे प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही दरवाजा था, होटल के पास अनिवार्य अनुमति तथा अग्निशमन विभाग की ओर से फायर एनओसी नहीं थी, किसी दुर्घटना से बचने के लिए होटल में आपातकालीन निकास नहीं बनाया गया था तथा अधिकांश कमरों की खिड़कियों को सील किया गया था। वस्तुस्थिति यह है कि प्रशासन देश भर में होने वाले अग्निकांडों से कोई सबक नहीं सीखना चाहता, जिसके चलते लापरवाही बरती जाती है। वर्ष 2006 में मेरठ के विक्टोरिया पार्क में आयोजित वातानुकूलित तम्बू में भीषण आग लगने से पैंसठ लोगों की मौत हो गई थी, जिसका बड़ा कारण तम्बू में लगाए गए इलेक्ट्रोनिक्स मेले के प्रवेश व निकास मार्ग का एक ही होना था। होटल, नर्सिंग होम, रेस्तराँ आदि के संचालन में यही सावधानी बरतना अनिवार्य होता है, कि किसी भी प्रकार की दुर्घटना से लोगों का बचाव कैसे किया जाए, किन्तु विडंबना है, कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी करके उन स्थलों पर जाने वाले व उन स्थलों का उपभोग करने वालों की जान से खिलवाड़ किया जाता है।
व्यवहारिक रूप से देश के अधिकांश महानगरों व शहरों में छोटी छोटी जगह बने बहुमंजिले होटलों का यदि सर्वेक्षण किया जाए, तो अधिकांश होटलों की यही स्थिति है। निर्माण से लेकर अग्नि से बचाव के उपकरणों तक सभी व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार से ग्रस्त होकर पर्यटकों की जान से खिलवाड़ कर रही हैं। समझ नहीं आता, कि प्रशासन समय रहते होटलों में अग्नि शमन हेतु मूलभूत उपकरणों तथा होटल में यात्रियों के ठहरने की क्षमता के अनुसार आवागमन की स्थिति की समुचित जांच क्यों नहीं करता ? क्या अग्निशमन विभाग तथा प्रशासन के दायित्वधारी अधिकारियों की दृष्टि में नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं है ? डॉ. सुधाकर आशावादी

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