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Bhopal नैनीताल को पर्यटकों के बढ़ते दबाव से बचाना जरूरी It is necessary to save Nainital from the increasing pressure of tourists.

Upgrade Jharkhand News.  गर्मी का मौसम शुरू हुआ नहीं कि शहरी लोगों की नैनीताल की ओर आमद बढने लगती है । जिसे देखो वह सुकून की तलाश में इस सरोवर नगरी की ओर अपने वाहन में बैठकर दौड़ा चला आ रहा है । अप्रैल से लेकर मई जून तक पीक पर्यटन सीजन में नैनीताल में रिकॉर्ड तोड़ भीड़ उमड़ती है । दिल्ली  नोएडा, गाजियाबाद ,रामपुर ,मेरठ,  बरेली, लखनऊ आदि शहरों के लोग एक-दो दिन की छुट्टी होते ही नैनीताल की ओर चले आते हैं , जिससे यहां की यातायात व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा जाती है। शोरगुल,  प्रदूषण और अफरातफरी होती है सो अलग ।   इन दिनों स्थानीय होटल व्यवसायी तथा अन्य कारोबारी नैनीताल में भीड़ बढ़ने से खुश हैं लेकिन शहर की धारण क्षमता से अधिक वाहन पहुंचने से ट्रैफिक प्रबंधन प्रशासन के लिए हर साल की तरह इस बार भी चुनौती पूर्ण है । खासकर वीकेंड में पर्यटकों की भारी भीड़ बढ़ने  से यातायात और पार्किंग का जबरदस्त संकट पैदा हो जाता है । आप पर्यटकों को नैनीताल आने से रोक नहीं सकते पर एक बेहतर पार्किंग और यातायात व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है । नैनीताल में वाहनों के लिए जगह कम है इसीलिए वाहनों को नैनीताल से पहले ही रुसी बाईपास और नारायण नगर में रोक दिया जाता है । वहां से शटल सेवा से पर्यटकों को नैनीताल लाया जाता है । यह एक वैकल्पिक व्यवस्था है और सवाल यह है कि ऐसा कब तक चलेगा ?


वाहनों के दबाव से नैनीताल हल्द्वानी रोड , भवाली मार्ग में जहां-तहां लंबा जाम लग जाता है। नगर के भीतर भी बिरला मार्ग, मस्जिद चौराहा , चिड़ियाघर रोड पर  हमेशा जाम देखने को मिलता है। नैनीताल में अधिकांश होटलों में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। नतीजन पर्यटक अपनी गाड़ी की पार्किंग की तलाश में भटकते रहते हैं। ऐसे में प्रशासन और सरकार को बेहतर सड़क ,पार्किंग की व्यवस्था और  ट्रैफिक मैनेजमेंट को अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि समय रहते इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान नहीं दिया गया तो पर्यटन का दबाव शहर के स्वरूप और उसकी व्यवस्था पर नकारात्मक तथा विनाशकारी असर डाल सकता है। इस अति पर्यटन से उपजे जाम का असर नैनीताल नगर तो झेल ही रहा है , पर इन सब में सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जो आसपास के क्षेत्र से नैनीताल में नौकरी करने या जरूरी काम से जाते हैं। गौरतलब है कि नैनीताल जिला मुख्यालय है। हाई कोर्ट सहित कई विभागीय कार्यालय नैनीताल में स्थित है  जो लोग इन कार्यालयों में नौकरी हेतु घर से अपडाउन करते हैं, या जो लोग अपने न्यायालयीन कार्य से हाई कोर्ट जाते हैं, उन्हें भी घंटों तक जाम में फंसना पड़ता है। इसके अलावा कई बार गंभीर मरीजों को उपचार हेतु ला रही एंबुलेंस भी इस जाम फंस जाती है , परिणामस्वरुप  मरीज को सही समय पर उचित उपचार नहीं मिल पाता और कई बार उसकी जान पर बन आती है।


नैनीताल में वाहनों और लोगों के बढ़ते दबाव का असर यहां की पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर पड़ रहा है। नैनीताल पहले से ही कंक्रीट के जंगल में तब्दील होकर भारी दबाव में हैं। हिमालय के जिस भूगर्भीय क्षेत्र में नैनीताल बसा है वह काफी संवेदनशील है क्योंकि हिमालय का पूरा निचला भाग भूकंपीय क्षेत्र हैं । यहां हो रही भूगर्भिक हलचलें नैनीताल में हो रहे निरन्तर भूस्खलन , पहाड़ के टूटने , सुखाताल बनने और नैनी झील का जल स्तर घटने से साफ  दृष्टिगोचर  होता है। वादिया इंस्टीट्यूट के अध्ययन के अनुसार नैना पीक , स्नो  व्यू और बलिया नाला क्षेत्र में भूस्खलन की संभावनाएं अधिक है । पर्यावरणीय दबाव के कारण नैनीताल में पानी के स्रोत भी तेजी से सूख रहे हैं । एक अध्ययन के मुताबिक नैनीताल नगर की भार वाहन क्षमता काफी समय पूर्व ही समाप्त हो चुकी है । इसके बावजूद यहां निर्माण होते रहे और आबादी का दबाव बढ़ता गया जिससे नगर का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है । 2016 में वाडिया इंस्टीट्यूट तथा ग्राफिक ऐरा विश्वविद्यालय ने नैनीताल में धंस  रही जमीन पर एक अध्ययन कर पाया था  कि नैनीताल का अधिकांश हिस्सा मलबे के ढेर पर बसा है, जो भूस्खलन के बाद बना था।


नैनीताल का भूस्खलन से पुराना नाता है। यहां पहली बार भूस्खलन 1866 में हुआ था। उसके बाद 18 सितंबर 1880 को झील के उत्तरपूर्व की पहाड़ी में जबरदस्त भूस्खलन हुआ था। 1893, 1898, 1924 ,1970, 1987,  2019  , 2023 में भी छोटी बड़ी भूस्खलन की अनेक घटनाएं देखने को  मिली। नैनीताल नगर तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरा है, जिसके ऊपर की तरफ कैमल्स बैक , दूसरी तरफ अयारपाटा तथा तीसरी तरफ शेर का डांडा पहाड़ी है और नीचे तल्लीताल की तरफ बलिया नाला है। बलिया नाला निरंतर दरक रहा है, जो एक बहुत बड़े खतरे का संकेत है। नगर के भीतर वाहनों के भारी दबाव से कुछ साल पहले लोअर माल रोड टूट गई थी, जिसका आज तक स्थाई उपचार नहीं हो पाया है। विडंबना है कि जो स्थान लाखों साल से भूगर्भिक हलचलों के मध्य भी  सुरक्षित बना रहा,उसे हमने कुछ ही सालों में संकट की कगार पर पहुंचा दिया है। नैनीताल में निर्माण का इलाका बेहद सीमित है। इसे आजादी से पूर्व के नैनीताल के चित्रों को देखकर समझा जा सकता है।


अंग्रेजों के समय में मकानों में लेंटर नहीं हुआ करते थे । अंग्रेज अपने घरों को लकड़ी के तख्तों और हल्के सामानों से बनाते थे। अंग्रेज नैनीताल के  विकास और रखरखाव के प्रति अतिरिक्त रूप से सावधान थे। तब माल रोड पर वाहनों का चलना मना था, पर आज इतने वाहन चलते हैं कि आप गिन ही नहीं सकते। नैनीताल को पर्यटकों के इस बढ़ते दबाव से बचाना बहुत जरूरी है। पर्यटन जरूरी है पर इस हद तक नहीं कि किसी नगर के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगे। अति पर्यटन नैनीताल को नुकसान ही पहुंचा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि नैनीताल चारों ओर से खतरों से घिरा है। सबसे बड़ा खतरा भूस्खलन और भूकंप का है। यदि भविष्य में कोई प्राकृतिक आपदा आई , तो नैनीताल में क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। दीपक नौगांई अकेला



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