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Bhopal महर्षि सांदीपनी की परंपरा के वाहक एवं भारतीय स्वाभिमान के सूर्य पं. सूर्यनारायण व्यास Pt. Suryanarayan Vyas, the bearer of the tradition of Maharishi Sandipani and the sun of Indian self-respect

 


50 वां पुण्य स्मरण (22 जून 2026)

Upgrade Jharkhand News.  भारतीय सभ्यता की धारा में ऐसे अनेक तेजस्वी व्यक्तित्व उभरे हैं जिन्होंने अपनी बहुआयामी प्रतिभा, अटूट देशभक्ति और गहन विद्वता से राष्ट्र की अस्मिता को मजबूत किया। इनमें से एक नाम है पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास का। उज्जैन की पावन भूमि से निकले यह महान ज्योतिषाचार्य, क्रांतिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, पुरातत्त्ववेत्ता और संस्कृति के संरक्षक भारतीय अस्मिता के प्रखर प्रतीक बने। 2 मार्च 1902 को जन्मे और 22 जून 1976 को परलोक सिधारे इन महानुभाव ने अपनी साधना, संघर्ष और सृजन से उज्जैन को ही नहीं, समूचे भारत को गौरवान्वित किया। उनका जीवन भारतीयता की जड़ों, संस्कृत, ज्योतिष, इतिहास, साहित्य और स्वाधीनता संग्राम को जोड़ने वाला एक सेतु था। पं. सूर्यनारायण व्यास का जन्म उज्जैन के सिंहपुरी मोहल्ले में एक प्रतिष्ठित विद्वान परिवार में हुआ। उनके पिता पं. नारायणजी व्यास महर्षि सांदीपनी की परंपरा के वाहक थे। संस्कृत, ज्योतिष और व्याकरण के विद्वान। किंवदंतियों के अनुसार पं. नारायणजी दोनों हाथों से एक साथ लिख सकते थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और पं. मदनमोहन मालवीय जैसे महापुरुष उनके दर्शन के लिए उज्जैन आते थे। इस गुरुकुलीय वातावरण में पले-बढ़े सूर्यनारायणजी ने बाल्यावस्था से ही विद्या, संस्कृति और राष्ट्रप्रेम के संस्कार ग्रहण किए।


उन्होंने संस्कृत, हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगला सहित अनेक भाषाओं का गहन अध्ययन किया। मात्र 14-15 वर्ष की आयु में उनकी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। 1916 में माधव कॉलेज की पत्रिका में उनकी मराठी रचना 'शारदोत्सव' छपी। प्रारंभिक काल में उर्दू शायरी भी की, 'शम्स उज्जयिनी' उपनाम से। इस युग में उज्जैन महाकाल की भूमि क्रांतिकारियों का केंद्र थी, और युवा सूर्यनारायण उस आग में कूद पड़े। 1921 से ही पं. व्यास स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए। वे सिद्धनाथ माधव आगरकर के सान्निध्य में आए और लोकमान्य तिलक की जीवनी का अनुवाद किया। वीर सावरकर के साहित्य, विशेषकर 'अंडमान की गूंज' ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। 1930 के अजमेर सत्याग्रह में वे उज्जैन जत्थे का नेतृत्व करते हुए पहुंचे। लॉर्ड मेयो की मूर्ति तोड़ने जैसे साहसिक कार्यों में भाग लिया। मूर्ति का एक हाथ वर्षों तक उनके 'भारती भवन' में रखा रहा। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे गुप्त रेडियो स्टेशन चलाते रहे। उनके गुरुकुल में कई क्रांतिकारी वेश बदलकर छिपे रहते थे। ज्योतिष विद्या के साथ-साथ वे क्रांतिकारी भी थे। यह दुर्लभ संयोग उनकी बहुआयामीता को दर्शाता है। उन्होंने 1930 में ही भविष्यवाणी की थी कि भारत अगस्त 1947 में स्वतंत्र होगा। यह दूरदृष्टि उनकी ज्योतिषीय क्षमता और राष्ट्रप्रेम का प्रमाण थी।


पं. सूर्यनारायण व्यास का सबसे चर्चित योगदान भारत की स्वतंत्रता के शुभ मुहूर्त से जुड़ा है। 1946-47 के अंतिम दिनों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने, जो आध्यात्मिक झुकाव रखते थे, गोस्वामी गणेश दत्त महाराज के माध्यम से उन्हें दिल्ली बुलवाया। अंग्रेजों से 14 और 15 अगस्त की दो तिथियां मिली थीं। पं. व्यास ने पंचांग देखकर सलाह दी कि 14 अगस्त को लग्न अस्थिर है, अतः 15 अगस्त श्रेयस्कर है। उन्होंने आधी रात को ध्वजारोहण का सुझाव भी दिया, जिसे मान लिया गया। लाल किले पर आधी रात को तिरंगा फहराया गया। उन्होंने संसद भवन के शुद्धिकरण की भी सलाह दी। पाकिस्तान के लिए 14 अगस्त के मुहूर्त पर चेतावनी दी थी कि वह अस्थिर रहेगा, जो बाद की घटनाओं से मेल खाती है। 1930 में की गई आजादी की भविष्यवाणी, राजेंद्र प्रसाद के दो बार राष्ट्रपति बनने की भविष्यवाणी आदि उनकी युगद्रष्टा छवि को स्थापित करती हैं। यह योगदान मात्र ज्योतिषीय नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता को वैदिक-ज्योतिषीय परंपरा से जोड़ने वाला था। आधुनिक भारत की नींव में प्राचीन ज्ञान की निरंतरता का प्रतीक बने। पं. व्यास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। 'विक्रम' मासिक पत्र के संपादक के रूप में उन्होंने 2500 से अधिक संपादकीय लिखे-'व्यास उवाच' और 'बिन्दु-बिन्दु' शीर्षकों से। 1937 में यूरोप यात्रा पर गए और 'सागर प्रवास' जैसी यात्रा साहित्य की क्लासिक कृति लिखी। व्यंग्यकार के रूप में उनका स्थान अनुपम है। पहला व्यंग्य संग्रह 'तू-तू,मैं-मैं' 1935 में प्रकाशित हुआ। उनका व्यंग्य मखौल भरा, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि युक्त था फूहड़ता से दूर। हिंदी व्यंग्य की परंपरा में वे प्रारंभिक और प्रभावशाली हस्ताक्षर हैं।


उन्होंने कविता, निबंध, संस्मरण, इतिहास और पुरातत्त्व पर भी लिखा। 'यादें' उनके संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह है, जिसमें देश की महान विभूतियों से मुलाकातें दर्ज हैं। उज्जैन के गौरवशाली अतीत कालिदास, विक्रमादित्य, महाकाल को पुनर्जीवित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उज्जैन में कालिदास समारोह की परंपरा उनके विजन का परिणाम थी। 1928 से महाकाल मंदिर और भारती भवन में कालिदास जयंती मनाई जाने लगी। बाद में यह अखिल भारतीय कालिदास समारोह बना। विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर, सिंधिया शोध प्रतिष्ठान और कालिदास परिषद के संस्थापक या प्रेरक वे रहे। उनका गुरुकुल हजारों शिष्यों का केंद्र था, देश-विदेश से विद्यार्थी आते, निःशुल्क शिक्षा, भोजन और आवास पाते। ज्योतिष और खगोल में उनके शिष्य सात हजार से अधिक बताए जाते हैं। उन्होंने उज्जैन को ज्योतिष का वैश्विक केंद्र बनाने में योगदान दिया। 1958 में उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। लेकिन 1967 में अंग्रेजी को अनंत काल तक जारी रखने वाले विधेयक के विरोध में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया। यह घटना उनकी राष्ट्रीय अस्मिता और हिंदी-संस्कृत प्रेम का प्रतीक है। स्वाभिमान के सूर्य कहे जाने वाले पं. व्यास ने कभी सत्ता या पुरस्कार के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया। भारत सरकार ने 2002 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।


पं. सूर्यनारायण व्यास की विरासत उनके पुत्र राजशेखर व्यास (दूरदर्शन के पूर्व अधिकारी, लेखक) ने संभाली। आज भी उज्जैन में कालिदास अकादमी, सूर्यनारायण व्यास संकुल आदि उनकी स्मृति को जीवित रखते हैं। आज के युग में जब भारतीय अस्मिता पर पुनर्विचार हो रहा है, पं. व्यास का जीवन प्रेरणा स्रोत है। वे साबित करते हैं कि प्राचीन ज्ञान (ज्योतिष, संस्कृत) और आधुनिक संघर्ष (स्वाधीनता, पत्रकारिता) को जोड़कर राष्ट्र निर्माण किया जा सकता है। उनकी दूरदृष्टि, आजादी की भविष्यवाणी, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, 21वीं सदी के भारत के लिए प्रासंगिक है, जहां हम आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहे हैं। उनका जीवन दर्शाता है कि सच्ची विद्वता नम्रता, क्रांतिकारिता और सृजनशीलता का संगम होती है। उज्जैन की धरती ने महाकाल की कृपा से ऐसे तेज पुंज पैदा किए जो भारतीय अस्मिता को सदैव प्रकाशित रखते हैं।


पं. सूर्यनारायण व्यास अमर हैं, उनकी रचनाओं में, उज्जैन की परंपराओं में, और हर उस भारतीय के हृदय में जो अपनी जड़ों पर गर्व करता है। उनकी जयंती पर हम न केवल उन्हें स्मरण करते हैं, बल्कि उनके आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेते हैं। भारतीय अस्मिता का यह तेज पुंज सदैव भारत माता के मस्तक पर विराजमान रहेगा। 50 वें पुण्य स्मरण दिवस पर पंडित व्यास जी को सादर नमन। देशना जैन



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