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Bhopal व्यंग्य -भारतीय राजनीति में आपरेशन तलाक! तलाक!! तलाक!!! Satire - Operation Talaq in Indian politics! Talaq!! Talaq!!!

 


Upgrade Jharkhand News.  तीन तलाक मुस्लिम पति-पत्नी के लिए प्रचलन में था। आपसी समझ न बनने पर दोनों में से कोई एक अगर तीन बार तलाक कह देता था तो तलाक माना जाता था। आश्चर्य तो तब हुआ जब इसका दुरुपयोग मोबाइल फोन पर भी होने लगा। एसएमएस या कॉल पर तलाक बोलते ही रिश्ता खत्म! हालांकि अब इसे कानून बनाकर प्रतिबंधित कर दिया गया है, फिर भी इसके दुरुपयोग की खबरें आए दिन सुनने में आती रहती हैं।  इसका एक नया रूप हमारे देश के लोकतंत्र में दिखाई देने लगा है। जिसे ऑपरेशन लोटस, ऑपरेशन टाइगर,ऑपरेशन गिरगिट और न जाने कैसे-कैसे नामों से पुकारा जाता है। सबसे पहले कट्टर ईमानदार पार्टी 'आप' के सात सांसदों ने अरविंद केजरीवाल को तीन बार तलाक कहकर नए ख़ाविंद को चुन लिया। तभी से दूसरे राज्यों के सांसदों में भी बगावत के सुर गूंजने लगे। फिर पश्चिम बंगाल में जैसे ही ममता मैडम के पाप का घड़ा फूटा, टीएमसी के सांसद राघव चड्ढा के पदचिह्नों पर चलकर दीदी से किनारा कर गए। एनडीए को बैठे-बिठाए सांसद मिलने लगे। टीएमसी का अर्थ तलाक मान्य कंपनी हो गया।


ममता दीदी कांग्रेस की गोद में बैठने को आतुर हुईं तो सोनिया गांधी ने गले लगाकर कान में कहा-'लौट के बुद्धू घर को आए, स्वागत है'। मुसीबत में विदेशी महिला भी स्वदेशी लगने लगी। अभिषेक इनका भतीजा है। वो खुद को अभिषेक बच्चन समझकर पार्टी के सीनियर्स को अपमानित करता था,ऐसी दलील बाद में उन बेवफाओं ने दी जो अब एनडीए के मुरीद होकर सत्ता की मलाई चाटने को आतुर हैं।  अब इन बेवफाओं की आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि ममता दीदी के चुनाव हारते ही उनके बगल में जा बैठे जिनको ये चुनाव परिणाम आने से पूर्व तक मोटी-मोटी, भद्दी गालियां दे रहे थे! शुभेंदु अधिकारी, जो पहले ही बेवफाई कर मुख्यमंत्री बने थे, इनको अपने करीब बुलाने में सफल हो गए। भ्रष्टाचार के दलदल से बचकर हेमंता विश्व सरमा बन बैठे! इनके देखा-देखी महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सैनिक भी नैतिकता की सीमा पार कर दुश्मन के खेमे में चले गए। शायद इनके अंदर भी बेवफा होने का महान जज्बा पहले से ही अंकुरित हो चुका था, जो इन मानसूनी हवाओं से प्रभावित होकर विशाल पेड़ बनने लगा। उद्धव ठाकरे पर शिंदे सरकार भारी पड़ गई। जो बाकी तीन-चार बचे हैं, वे भी कब तलाक दे दें? कोई भरोसा नहीं!


लोकतंत्र का यह नव-स्वरूप मुझे तो अच्छा लगा। वो इसलिए कि हर व्यक्ति को अपना वर-वधू चुनने का पूर्ण अधिकार है। यदि दंपत्ति में आपस में नहीं पट रही है, या एक-दूसरे से मन भर गया हो, या उसकी कमजोरी सामने आ गई हो तो तलाक का हक तो बनता ही है! यह नैसर्गिक नियम भी है। वन्य जीवों में भी अपने जीवनसाथी के लिए आपसी संघर्ष की घटनाएं देखी-सुनी गई हैं, जिसमें कमजोर या तो हार मान लेता है या जान से हाथ धो बैठता है। हमारे देश में भी जंगल खत्म करने के ठेके सरकार दे ही रही है तो यह नियम राजनैतिक जंगल में भी लागू हो रहा है।  फिर जलने वालों की जलन क्यों बढ़ने लगी है? राहुल गांधी को तो यह सत्ता के तथाकथित प्रवक्ता पहले ही पप्पू बनाकर मलाई चाटने, तलवे चाटने में मशगूल हैं! दो हजार सैंतालीस तक तो लगता है पूरा देश विपक्ष से मुक्ति पा ही जाएगा! विपक्ष के नेताओं को मेरा तो यही सुझाव है कि या तो आप भी पाला बदल लो या फिर नेतागिरी छोड़कर कोई और धंधा कर लो। जैसे हथियारों की दलाली, सीमेंट फैक्ट्री, लोहे के कारखाने, सड़कों की ठेकेदारी, रेलवे लाइन बनाने, प्लेटफार्म बनाने, पुल-ब्रिज निर्माण, मंदिरों में ट्रस्टी बन जाओ, कोचिंग संस्थान, प्राइवेट यूनिवर्सिटी, मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज आदि जिनमें अच्छी-खासी कमाई हो! यहाँ आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, आपको कोई भी तलाक! तलाक!! तलाक!!! नहीं कहेगा। पंकज शर्मा"तरुण"



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