Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Jamshedpur परम पूज्य बालासाहेब देवरस: आधुनिक भारत के निर्माण में सामाजिक समरसता और दूरदर्शी नेतृत्व के प्रणेता His Holiness Balasaheb Deoras: A pioneer of social harmony and visionary leadership in the making of modern India

 


Upgrade Jharkhand News. भारतीय इतिहास के कालखंड में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने न केवल स्थापित संस्थाओं को नई दिशा दी, बल्कि पूरे समाज के सोचने के तरीके को भी बदल दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के तीसरे सरसंघचालक परम पूज्य बालासाहेब देवरस (11 दिसंबर 1915 – 17 जून 1996) एक ऐसी ही युगांतकारी शख्सियत थे। शांत, सौम्य और व्यवहारकुशल दिखने वाले बालासाहेब के भीतर एक ऐसा दूरदर्शी और दृढ़ संकल्पी नेतृत्व छिपा था, जिसने पारंपरिक लकीर से हटकर सोचने का साहस दिखाया। आज जब हम उनके योगदान का मूल्यांकन करते हैं, तो स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी आज जिस विशाल वटवृक्ष के रूप में देश और दुनिया के सामने खड़े हैं, उसकी जड़ों को सींचने और उसे सर्वव्यापी बनाने में बालासाहेब देवरस का हिमालय जैसा बड़ा योगदान रहा है।

​बालासाहेब देवरस का जन्म नागपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। बचपन में ही वे संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सीधे संपर्क में आए। डॉ. हेडगेवार के ओजस्वी व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण के विचार ने युवा बालासाहेब के मन पर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही यह तय कर लिया था कि वे अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और संगठन के चरणों में समर्पित कर देंगे।​अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, वे संघ के काम को गति देने के लिए पहले 'प्रचारक' (पूर्णकालिक संगठक) के रूप में बंगाल प्रांत भेजे गए। उस दौर में, जब संसाधन सीमित थे और वैचारिक चुनौतियाँ बहुत अधिक थीं, बालासाहेब ने बंगाल में संघ के कार्य की मजबूत नींव रखी। वे एक ऐसे देशभक्त थे, जो अपने वैचारिक सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए भी संगठन की व्यावहारिक आवश्यकताओं को बखूबी समझते थे।

​जब संघ के दूसरे सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गोलवलकर 'गुरुजी' के नेतृत्व में संगठन का तेजी से विस्तार हो रहा था, तब बालासाहेब देवरस संगठन के भीतर एक नई और व्यापक सोच का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनका स्पष्ट मानना था कि संघ को केवल हिंदुओं को संगठित करने की संकीर्ण सीमा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राष्ट्रहित के व्यापक मुद्दों पर समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना चाहिए। ​इस व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण के कारण कई बार उनका तत्कालीन वरिष्ठ नेतृत्व (यहाँ तक कि गुरुजी) से भी वैचारिक मतभेद हुआ। लेकिन बालासाहेब की नीयत साफ थी और उनका तर्क अकाट्य था। उन्होंने पूरी शालीनता और दृढ़ता के साथ अपनी बात संगठन के सामने रखी। धीरे-धीरे समय ने साबित किया कि उनकी सोच बिल्कुल सही थी और आखिरकार पूरे संघ परिवार ने उनके इस व्यापक दृष्टिकोण को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने जनसंघ के प्रभारी के तौर पर भी देश की राजनीति और वैचारिक चेतना को बदलने का बेहतरीन काम किया।​


बालासाहेब देवरस जी के नेतृत्व की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी सरलता और वैचारिक स्पष्टता। वर्ष 1980 में पुणे में आयोजित 'संघ शिक्षा वर्ग' (त्रिवर्षीय प्रशिक्षण शिविर) के दौरान मुझे उन्हें पहली बार देखने, समझने और उनका 'बौद्धिक' (वैचारिक संबोधन) साक्षात सुनने का परम सौभाग्य मिला।​उनका वह व्याख्यान लगभग एक घंटे का था। उसमें न तो कोई क्लिष्ट शब्दावली थी और न ही कोई दिखावा। बेहद सरल, सीधी और आम बोलचाल की भाषा में उन्होंने राष्ट्र, समाज और स्वयंसेवक के दायित्वों की व्याख्या की। उनके शब्दों में देशभक्ति की ऐसी गहरी और मर्मस्पर्शी भावना समाई हुई थी कि वहां बैठे हजारों स्वयंसेवकों की आंखें नम थीं और उनके हौसले आसमान छू रहे थे। वह भाषण केवल एक बौद्धिक सत्र नहीं था, बल्कि हर स्वयंसेवक के भीतर राष्ट्र-आराधना का संकल्प फूंकने वाला एक जीवंत मंत्र था।

​ 

​बालासाहेब देवरस केवल एक संगठनकर्ता नहीं थे, वे एक महान समाज सुधारक भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक समाज के भीतर से छुआछूत, जातिवाद और ऊंच-नीच जैसी कुरीतियां खत्म नहीं होंगी, तब तक एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण असंभव है। उन्होंने संघ के मंचों से छुआछूत का पुरजोर विरोध किया। ​उनका एक ऐतिहासिक कथन आज भी सामाजिक समरसता के आंदोलन का मुख्य आधार है: ​"यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है और इसे हर कीमत पर तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए।"​उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों में कहीं भी ऊंच-नीच का स्थान नहीं है। सार्वजनिक जीवन से जाति-व्यवस्था जैसी परजीवी और समाज को खोखला करने वाली प्रथाओं को खत्म करने के लिए उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को बस्तियों और वंचित वर्गों के बीच जाकर सेवा कार्य करने के लिए प्रेरित किया। आज संघ के लाखों सेवा प्रकल्प उसी सोच का परिणाम हैं।​आपातकाल, जयप्रकाश नारायण का आंदोलन और सर्वसमावेशी सोच है।​1975 का आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय था।


उस समय लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघ ने अपने पारंपरिक तौर-तरीकों से हटकर एक बहुत बड़ा और साहसिक निर्णय लिया। बालासाहेब देवरस के नेतृत्व में संघ ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण  के संपूर्ण क्रांति आंदोलन को अपना पूरा और सक्रिय समर्थन दिया। यह संघ के इतिहास में एक बड़ा यू-टर्न था, जिसने यह साबित किया कि संघ के लिए 'राष्ट्र और लोकतंत्र' की रक्षा सर्वोपरि है।​बालासाहेब ने ही इस बात पर विशेष जोर दिया कि संघ का कार्य केवल कुछ सहयोगी संगठनों (जैसे विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जनसंघ या भारतीय मजदूर संघ) तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उनका स्पष्ट मत था कि स्वयंसेवकों को देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए और वहां राष्ट्रभक्ति के मूल्यों की स्थापना करनी चाहिए। उन्होंने संघ को तथाकथित 'हिंदुत्व की संकीर्ण व्याख्या' से बाहर निकालकर एक ऐसी सर्वसमावेशी सोच दी, जिसने देश के हर वर्ग, चाहे वह आदिवासी हो, वनवासी हो या समाज का अंतिम व्यक्ति हो, सबको यह अहसास कराया कि "संघ हमारा है और हम संघ के हैं।"


​बालासाहेब देवरस के जीवन का सबसे क्रांतिकारी कदम वह था, जिसने संगठन के भीतर सत्ता या पद के मोह को पूरी तरह से खारिज कर दिया। संघ में यह अटूट परंपरा चली आ रही थी कि जो भी व्यक्ति सरसंघचालक बनता था, वह अपनी आखिरी सांस तक उस पद पर रहता था। डॉ. हेडगेवार और गुरुजी के मामले में ऐसा ही हुआ था। ​लेकिन बालासाहेब ने इस रूढ़ि को तोड़ा। खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने पद पर बने रहने के बजाय, अपने जीते-जी ही परम पूजनीय प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) जैसी महान और योग्य शख्सियत को सरसंघचालक की जिम्मेदारी सौंप दी। इस एक फैसले से उन्होंने दो बड़े संदेश दिए:​संगठन में व्यक्ति से बड़ा कार्य और विचार होता है।​सरसंघचालक का पद किसी खास जाति, वर्ग या क्षेत्र की बपौती नहीं है, बल्कि यह योग्यता और समर्पण का प्रतीक है।​स्वदेशी और आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव।


​राजनीतिक और सामाजिक सुधारों के साथ-साथ बालासाहेब देवरस आर्थिक मोर्चे पर भी भारत को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। वैश्वीकरण और पश्चिमी आर्थिक नीतियों के अंधानुकरण के उस दौर में, उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को अपनी जड़ों से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने ही स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार की और 'स्वदेशी' (आत्मनिर्भरता) की विचारधारा को संघ के मुख्य एजेंडे में शामिल किया। उनका मानना था कि जब तक देश आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं होगा, तब तक उसकी संप्रभुता अधूरी है। आज का 'आत्मनिर्भर भारत' का संकल्प कहीं न कहीं उन्हीं के विचारों का विस्तार है। ​17 जून 1996 को इस महान विभूति ने अपनी नश्वर देह त्याग दी, लेकिन उनके द्वारा बोए गए विचार आज पूरे देश में लहलहा रहे हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश और विश्वभर में फैले करोड़ों स्वयंसेवक उन्हें अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ नमन कर रहे हैं।


​बालासाहेब देवरस केवल अतीत के पन्नों में सिमटा हुआ एक नाम नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवंत विचार हैं। समाज को एकजुट करने, छुआछूत को मिटाने, देश को आत्मनिर्भर बनाने और संगठन को सर्वव्यापी करने के उनके प्रयास आज भी हमारे लिए सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। उनके दिखाए मार्ग पर चलकर एक समरस, शक्तिशाली और वैभवशाली भारत का निर्माण करना ही उनके प्रति हमारी सच्ची और विनम्र श्रद्धांजलि होगी।​परम पूज्य बालासाहेब देवरस जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन!



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.