16 जून बलिदान दिवस पर विशेष
Upgrade Jharkhand News. भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल अहिंसक आंदोलनों और राजनीतिक संघर्षों तक सीमित नहीं है। इस इतिहास के अनेक पृष्ठ ऐसे भी हैं जो उन वीर क्रांतिकारियों के रक्त से लिखे गए हैं, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। दुर्भाग्यवश ऐसे अनेक क्रांतिकारी आज भी इतिहास के मुख्य पृष्ठों में वह स्थान नहीं पा सके, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं। उन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है – नलिनीकान्त बागची। उनका जीवन साहस, त्याग, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का ऐसा उदाहरण है जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष की ज्वाला बंगाल में सबसे अधिक प्रज्वलित थी। अनेक युवाओं ने यह निश्चय कर लिया था कि वे विदेशी शासन को समाप्त कर भारत को स्वतंत्र कराएंगे। इसी वातावरण में नलिनीकान्त बागची जैसे साहसी युवकों का निर्माण हुआ। वे उन क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्र की सेवा और स्वतंत्रता के उद्देश्य को समर्पित कर दिया।नलिनीकान्त बागची का जीवन निरंतर संघर्षों से भरा रहा। अंग्रेजी सरकार उन्हें अत्यंत खतरनाक क्रांतिकारी मानती थी। इसलिए पुलिस हर समय उनकी तलाश में रहती थी। वे अपने साथियों के साथ गुप्त स्थानों पर रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की योजनाएँ बनाते और उन्हें क्रियान्वित करते थे। जीवन का कोई भी दिन ऐसा नहीं था जब उनके सिर पर गिरफ्तारी या मृत्यु का खतरा न मंडराता हो।एक समय वे अपने कुछ क्रांतिकारी साथियों के साथ गुवाहाटी के एक मकान में रह रहे थे। सभी जानते थे कि पुलिस किसी भी समय वहाँ पहुँच सकती है। इसलिए रातभर बारी-बारी से पहरा दिया जाता था। एक रात वही हुआ जिसकी आशंका थी। पुलिस ने अचानक मकान को चारों ओर से घेर लिया। पहरा दे रहे क्रांतिकारी ने तुरंत अपने साथियों को जगा दिया। स्थिति अत्यंत गंभीर थी। यदि वे पुलिस के घेरे में फँस जाते तो गिरफ्तारी या मृत्यु निश्चित थी।
क्रांतिकारियों ने साहसिक निर्णय लिया कि वे पुलिस के पूरी तरह मोर्चा संभालने से पहले ही उस पर हमला करेंगे। योजना बनते ही वे गोलीबारी करते हुए बाहर निकले और पुलिस पर टूट पड़े। अचानक हुए इस हमले से पुलिसकर्मी घबरा गए। उन्हें अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपना पड़ा। इस अवसर का लाभ उठाकर नलिनीकान्त बागची और उनके साथी वहाँ से निकलने में सफल हो गए और जंगलों की ओर भाग गए।लेकिन उनकी कठिनाइयाँ समाप्त नहीं हुई थीं। जंगल में वे कई दिनों तक भूखे-प्यासे छिपे रहे। पुलिस लगातार उनका पीछा कर रही थी। तीन दिन तक भोजन न मिलने के कारण उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। बड़ी कठिनाई से उन्होंने भोजन की व्यवस्था की। जब वे भोजन करने बैठे ही थे, तभी भारी पुलिस बल ने उन्हें फिर से घेर लिया। उन्हें समझ आ गया कि भोजन का अवसर एक बार फिर हाथ से निकल चुका है।क्रांतिकारियों ने तुरंत भोजन छोड़ दिया और बच निकलने का प्रयास किया। इस बार पुलिस पूरी तैयारी के साथ आई थी। दोनों पक्षों के बीच भीषण मुठभेड़ शुरू हो गई। संघर्ष इतना तीव्र था कि तीन क्रांतिकारी वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए। केवल तीन साथी किसी प्रकार बचकर निकल पाए, जिनमें नलिनीकान्त बागची भी शामिल थे।लगातार भूख, थकान और भाग-दौड़ के कारण उनकी शारीरिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वे कई दिनों तक जंगलों में भटकते रहे। इसी दौरान एक जहरीला जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया, जिसका विष पूरे शरीर में फैलने लगा। सामान्य व्यक्ति ऐसी अवस्था में शायद जीवन से ही हार मान लेता, लेकिन नलिनीकान्त बागची के भीतर देशभक्ति की ऐसी ज्वाला थी जिसने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी।
कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए वे किसी प्रकार हावड़ा पहुँच गए। वहाँ स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े। सौभाग्य से उनका एक पुराना मित्र वहाँ से गुजर रहा था। उसने नलिनी को पहचान लिया और तुरंत अपने घर ले गया। उसने घरेलू उपचार के रूप में मट्ठे और हल्दी का प्रयोग किया तथा कई दिनों तक उनकी सेवा की। धीरे-धीरे उनकी स्थिति में सुधार हुआ और वे पुनः स्वस्थ हो गए। स्वस्थ होने के बाद भी उन्होंने आराम का जीवन नहीं चुना। वे जानते थे कि देश अभी गुलाम है और स्वतंत्रता का संघर्ष जारी है। इसलिए कुछ समय तक बिहार में अपना रूप बदलकर रहने के बाद वे पुनः क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। बाद में वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के पास ढाका पहुँच गए और वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने लगे।अंग्रेजी पुलिस उनकी तलाश में लगातार लगी हुई थी। अंततः 15 जून 1918 को पुलिस को उस मकान का पता चल गया जहाँ से वे अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रहे थे। पुलिस ने मकान को चारों ओर से घेर लिया। उस समय वहाँ तीन क्रांतिकारी मौजूद थे। पुलिस और क्रांतिकारियों के बीच जबरदस्त गोलीबारी शुरू हो गई।
मुठभेड़ के दौरान दो पुलिसकर्मियों ने पास के मकान से भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया, लेकिन क्रांतिकारियों की गोलियों से वे घायल हो गए। हालांकि क्रांतिकारियों के पास हथियार और गोला-बारूद सीमित मात्रा में था। इसलिए उन्होंने मकान से बाहर निकलकर संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया। तीनों क्रांतिकारी गोली चलाते हुए बाहर निकले।नलिनीकान्त बागची ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। उनकी एक गोली पुलिस अधिकारी की टोपी उड़ाते हुए निकल गई। लेकिन पुलिस की संख्या बहुत अधिक थी। लंबे संघर्ष के बाद वे स्वयं गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए और भूमि पर गिर पड़े। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अस्पताल पहुँचाया।अस्पताल में भी उनका साहस और आत्मबल बना रहा, लेकिन घाव अत्यंत गंभीर थे। अंततः 16 जून 1918 को यह महान क्रांतिकारी भारत माता की स्वतंत्रता का स्वप्न हृदय में लिए हुए अमर हो गया। उनका बलिदान स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं, तब हमें नलिनीकान्त बागची जैसे वीरों के त्याग और बलिदान को स्मरण करना चाहिए। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र के लिए समर्पण, साहस और संघर्ष का मार्ग कभी व्यर्थ नहीं जाता। स्वतंत्रता का जो अमूल्य उपहार हमें मिला है, वह ऐसे ही अनगिनत बलिदानों की देन है। 16 जून का दिन हमें उस अमर क्रांतिकारी की याद दिलाता है जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्रभक्ति की ऐसी मिसाल स्थापित की जो सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। नलिनीकान्त बागची का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अमर नायकों में सदैव सम्मान के साथ लिया जाएगा, जिनकी शहादत ने स्वतंत्रता की मशाल को और अधिक प्रज्वलित किया।

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