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Jamshedpur सैम मानेकशॉ : भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल और विजय के महानायक Sam Manekshaw: India's first Field Marshal and a hero of victory

 


पुण्यतिथि विशेष (26 जून)

Upgrade Jharkhand News. भारतीय सैन्य इतिहास में यदि किसी सेनानायक का नाम अदम्य साहस, उत्कृष्ट नेतृत्व, रणनीतिक कौशल और सैनिकों के प्रति अटूट समर्पण के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, तो वह हैं Sam Manekshaw। भारतीय सेना के पहले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने अपने लगभग चार दशक लंबे सैन्य जीवन में अनेक युद्धों और चुनौतियों का सामना किया तथा अपनी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता से देश को गौरवान्वित किया। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी रणनीति और नेतृत्व के परिणामस्वरूप भारत ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की और एक नए राष्ट्र, बांग्लादेश का जन्म हुआ।26 जून 2008 को उनके निधन के साथ भारत ने एक महान सैनिक, कुशल रणनीतिकार और प्रेरणादायी व्यक्तित्व को खो दिया, किंतु उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज भी भारतीय सेना और देशवासियों को प्रेरित करते हैं।


सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को Amritsar में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. होर्मुसजी मानेकशॉ एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। परिवार चाहता था कि सैम भी चिकित्सा के क्षेत्र में जाएँ, किंतु उनकी रुचि सैन्य जीवन की ओर थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में प्राप्त की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए गए।जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीय युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए भारतीय सैन्य अकादमी की स्थापना की, तब सैम मानेकशॉ उसके प्रथम बैच के कैडेटों में शामिल हुए। वर्ष 1934 में वे कमीशन प्राप्त कर सेना में अधिकारी बने। यहीं से एक ऐसे सैन्य जीवन की शुरुआत हुई जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।


सैम मानेकशॉ ने अपने सैन्य जीवन का पहला बड़ा अनुभव द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्राप्त किया। वे बर्मा मोर्चे पर जापानी सेना के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुए। युद्ध के दौरान उन्हें कई गोलियाँ लगीं और उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई थी।उनके साहस और नेतृत्व से प्रभावित होकर उनके वरिष्ठ अधिकारी ने युद्धभूमि में ही उन्हें वीरता सम्मान के लिए अनुशंसित किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उनका जीवट और कर्तव्यनिष्ठा अद्भुत थी। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें एक महान सैन्य रणनीतिकार बनाने में सहायक बना। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय सेना के पुनर्गठन में सैम मानेकशॉ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विभाजन के समय सेना को अनेक प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में उन्होंने संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व का उत्कृष्ट परिचय दिया।उन्होंने सेना के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और अपने निर्णयों से हमेशा सैनिकों का विश्वास जीता। वे केवल एक अधिकारी नहीं थे, बल्कि सैनिकों के नेता थे। उनकी स्पष्टवादिता, हास्यबोध और आत्मविश्वास उन्हें अन्य अधिकारियों से अलग बनाता था।


1962 का भारत-चीन युद्ध और सेना का पुनर्निर्माण है।वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में भारत को पराजय का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद सेना का मनोबल काफी प्रभावित हुआ था। ऐसे समय में सैम मानेकशॉ ने विभिन्न सैन्य कमानों में कार्य करते हुए सेना का आत्मविश्वास पुनः स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।उन्होंने सैनिकों को आधुनिक प्रशिक्षण, बेहतर नेतृत्व और स्पष्ट रणनीति पर बल दिया। उनका मानना था कि किसी भी युद्ध की सफलता केवल हथियारों पर नहीं, बल्कि सैनिकों के मनोबल और नेतृत्व पर निर्भर करती है।सैम मानेकशॉ को वर्ष 1969 में भारतीय सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया। यह समय भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत संवेदनशील था। पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी और वहाँ के लोगों पर अत्याचार हो रहे थे। लाखों शरणार्थी भारत आने लगे थे। स्थिति युद्ध की ओर बढ़ रही थी, किंतु सैम मानेकशॉ ने जल्दबाजी में सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी को स्पष्ट रूप से बताया कि सेना को युद्ध के लिए पूर्ण तैयारी हेतु समय चाहिए। उनका यह निर्णय बाद में भारत की विजय का प्रमुख कारण बना।


दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध प्रारंभ हुआ। सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के प्रमुख थे और संपूर्ण सैन्य अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।उनकी रणनीति अत्यंत सटीक और दूरदर्शी थी। भारतीय सेना ने थल, जल और वायु तीनों मोर्चों पर उत्कृष्ट समन्वय स्थापित किया। मात्र 13 दिनों के भीतर पाकिस्तान की सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण माना जाता है। इस विजय के परिणामस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया।यह विजय केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि भारत की रणनीतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक क्षमता का भी प्रमाण थी। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा श्रेय सैम मानेकशॉ के नेतृत्व और सैन्य कौशल को दिया जाता है।


भारत की ऐतिहासिक विजय और उनके असाधारण सैन्य योगदान को देखते हुए वर्ष 1973 में सैम मानेकशॉ को फ़ील्ड मार्शल की मानद उपाधि प्रदान की गई। वे भारतीय सेना के पहले अधिकारी थे जिन्हें यह सर्वोच्च सैन्य रैंक प्राप्त हुई।फ़ील्ड मार्शल का पद सेना में सर्वोच्च सम्मान माना जाता है और यह केवल उन अधिकारियों को दिया जाता है जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा और सैन्य इतिहास में असाधारण योगदान दिया हो।सैम मानेकशॉ की सबसे बड़ी विशेषता उनकी नेतृत्व क्षमता थी। वे अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने में विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि उसे मृत्यु से डर नहीं लगता, तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।उनकी विनोदप्रियता भी प्रसिद्ध थी। कठिन परिस्थितियों में भी वे मुस्कुराकर निर्णय लेते थे। वे स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे और किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के आगे झुकने के बजाय राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते थे। सैनिकों के बीच उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें प्रेमपूर्वक “सैम बहादुर” कहा जाता था। यह उपनाम उनके साहस, आत्मविश्वास और सैनिकों के प्रति उनके स्नेह का प्रतीक बन गया।


सैम मानेकशॉ को उनके उत्कृष्ट सैन्य योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें भारत सरकार ने Padma Bhushan Pathan पद्मा भूषण पढ़ना तथा  पद्मा विभूषण से सम्मानित किया।उनकी उपलब्धियाँ केवल युद्ध विजय तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने भारतीय सेना को आधुनिक, पेशेवर और आत्मविश्वासी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व ने भारतीय सेना को विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में स्थान दिलाने में योगदान दिया।


26 जून 2008 को Wellington में उनका निधन हुआ। उनके निधन पर पूरे देश ने एक महान सैनिक को श्रद्धांजलि अर्पित की। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी वीरता, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की गाथाएँ सदैव जीवित रहेंगी।आज भी भारतीय सैन्य अकादमियों में उनके जीवन और नेतृत्व शैली का अध्ययन किया जाता है। उनकी रणनीतियाँ और निर्णय सैन्य नेतृत्व के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं। वे केवल एक सेनापति नहीं थे, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास और सामरिक शक्ति के प्रतीक थे।सैम मानेकशॉ का जीवन साहस, कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और नेतृत्व का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपने सैनिक जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना किया, अनेक युद्ध लड़े और हर परिस्थिति में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। 1971 के युद्ध में उनकी ऐतिहासिक भूमिका ने उन्हें भारतीय इतिहास के महानतम सैन्य नेताओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया।भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें कृतज्ञतापूर्वक नमन करता है। उनकी जीवनगाथा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प, दूरदर्शिता और राष्ट्रभक्ति के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं। "सैम बहादुर" केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य गौरव, वीरता और नेतृत्व की अमर पहचान है।



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