Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal दृष्टिकोण : आरक्षण पर पुनर्विचार का समय: समाज को जोड़ना होगा, तोड़ना नहीं Perspective: Time to rethink reservation: Society must be united, not divided

 


Upgrade Jharkhand News.  देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश राजनीतिक दल आरक्षण जैसी विकलांगता को समाप्त करने का जोखिम उठाने से डरते हैं, जिसका दुष्परिणाम यह है,कि समाज का जातीय आधार पर विघटन हो रहा है। सामाजिक समरसता और सौहार्द जैसे मूल्य सामाजिक व्यवस्था से दूर हो चुके हैं। यदि ऐसा न होता तो विभिन्न राजनीतिक दल जातीय गठबंधन की बात न करते और न ही जातियों का अगड़ी, पिछड़ी, दलित जातियों के रूप में वर्गीकरण किया जाता। यही नहीं धर्म आधारित राजनीति बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक में विभाजित न होती। इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता, कि स्वाधीनता प्राप्ति के समय देश में ऊंच नीच का भेदभाव अधिक था। सामाजिक ढांचा ही कुछ ऐसा था। आधुनिक संसाधनों की कमी थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था जातियों के विशिष्ट योगदान पर निर्भर थी, मसलन धोबी, लुहार, मोची, नाई, कहार, प्रजापति आदि जातियां विशिष्ट कौशल में पारंगत थी। व्यवस्था में समर्थ जमींदारों का प्रभुत्व था। ऐसा नहीं था, कि केवल ठाकुर ही समर्थ हों, प्रत्येक जाति में कुछ समर्थ लोग होते ही थे, जो जातियों का प्रतिनिधित्व किया करते थे तथा समाज में उनको यथोचित सम्मान मिलता था। उस समय भी प्रत्येक जाति में अगड़े, पिछड़े व उपेक्षित वर्ग हुआ करते थे, किन्तु भारतीय गणतंत्र के स्थापना दिवस 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही देश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को आरक्षण का लाभ दिया गया। उसके बाद मंडल कमीशन की सिफारिश के आधार पर 7 अगस्त 1990 में अन्य पिछड़ा वर्ग में चिन्हित जातियों को आरक्षण की परिधि में लाया गया। जो आज तक बरक़रार है। 


बहरहाल आरक्षण का अंतिम पायदान पर अभावों से जूझ रहे दलितों, पिछड़ों व सामान्य वर्ग के व्यक्तियों को कितना लाभ मिला, यह बहस का विषय है, लेकिन इतना अवश्य है कि आरक्षण को अधिकार मानकर सुविधा भोगने वाले तथा आरक्षण के कारण प्रतिभावान होने पर भी उपेक्षित जातियों के बीच अनचाहा द्वेष बढ़ गया। इतना ही नहीं कुछ राजनीतिक परिवारों ने आरक्षण का समर्थन करके सामाजिक समरसता को बढ़ाने की जगह जातीय विघटनकारी नीतियों को बढ़ावा देने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी। कुछ राजनीतिक दल तो केवल समाज की कुछ खास जातियों के विरोध की राजनीति करके ही फल फूल रहे हैं। वर्तमान में नीट पेपर लीक को मुद्दा बनाकर जिस प्रकार छद्म राजनीतिक दलों की मुखौटा बनी नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार पर दबाव बनाकर देश के शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र कराया, उससे प्रभावित होकर आरक्षण को विकलांगता का पर्याय मानने वाले स्वाभिमानी नागरिकों ने भी रिजर्वेशन हटाओ अभियान का श्रीगणेश कर दिया है। 


सोशल मीडिया में आरएचए भी बहुत तेजी से ट्रेंड हो रहा है। आरक्षण हटाओ अभियान का कितना असर देश की राजनीति तथा देश के सामाजिक वातावरण पर पड़ेगा , यह तो भविष्य के गर्भ में है, किन्तु इतना अवश्य है कि राजनेताओं को मिल बैठकर आरक्षण की समीक्षा करनी चाहिए तथा इसके संवैधानिक पहलुओं पर व्यापक चिन्तन करके किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए। विश्व के किसी भी कोने में आरक्षण जैसी प्रतिभा हंता व्यवस्था नहीं है, फिर भारत में आरक्षण राजनीति का एक बड़ा हथियार क्यों बना हुआ है ? यह विचारणीय प्रश्न है। सुधाकर आशावादी



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU