हाता। भारत उत्सव का देश है। कुछ उत्सव धार्मिक है कुछ लोक उत्सव है। उत्सव जीवन को गतिशील बनाता है, भक्ति,प्यार,प्रीति, भाईचारा और एकता को बढ़ावा देता है। उत्सव केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। कहा जाता है, हिन्दू धर्म में बारहो महीने में तेरह पार्वण है। दुर्गापूजा के बाद लक्ष्मी पूजा, उसके बाद काली पूजा मनाया जाता है।काली दुर्गा का ही एक रूप है। काली पूजा में अनेक मान्यताएं है। प्रत्येक उत्सव,पूजा और पर्व के पीछे लोक कथा,कहानी और मान्यताएं है। कार्तिक अमावस्या के दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर के सेनापति रक्तविज को वध करने के लिए काली रूप धारण की थी और उनका लहू पी थी, क्योंकि उनका लहू जहाँ गिरते थे वहां हज़ारों रक्तविज जन्म लेते थे।
काली आदि शक्ति दुर्गा का सबसे उग्र रूप है। इसलिए माँ काली को प्रसन्न करने के लिए कार्तिक अमावस्या के रात में काली पूजा की जाती है। अमावस्या के रात में दीपावली पर्व भी मनाया जाता है। मान्यता है कि उसी दिन भगवान राम, रावण को वध करके सीता माता को उद्द्यार कर के अयोध्या लौट आये थे। उनके स्वागत में नगर को सजाया गया था और दीपावली उत्सव मनाया गया था।
उसी रात में अनेक लोग लक्ष्मी और अलक्ष्मी की भी पूजा भी करते हैं। गांव में उसी दिन रात को मादर लेकर गौ माता को जगाया जाता है। दीपावली के दूसरे दिन को बादना पर्व कहा जाता है। उसी दिन को गौ माताओं की पूजा की जाती है, खिलाया पिलाया जाता है, शरीर मे छाप देकर सजाया जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण उसदिन गौ माताएं को देखने आते हैं। उसी दिन कुछ लोग गिरि गवर्धन अर्थात श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं। उसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के साथ देवराज इंद्र की युद्ध हुई थी और इंद्र हारे थे।
कुपित इंद्र के हाथों से गोप और गोपियों को भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा की थी। काली पूजा के तीसरे दिन भाईफोटा उर्फ भाईदूज के रूप में मनाया था। इसको यम द्वितीया भी कहा जाता है। यमराज का बहन यमुना ने भाई यम की दीर्घायु के लिए भाई फोटा दी थी। उसदिन कुछ लोग चित्रगुप्त का भी पूजा करते थे,काली और कलम की पूजा करते हैं। गांव में कुछ लोग उसदिन गोरु खुटिया के रूप में मनाते है।जिसको ग्रामीण भाषा मे गोरु छाड़ा भी कहा जाता है। इसी तरह काली पूजा को लेकर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं, अनेक उत्सव काली पूजा के साथ मनाया जाता है।


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