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Bhopal समाज और राष्ट्र की रक्षा का भी त्यौहार है रक्षाबंधन Rakshabandhan is also a festival of protection of society and nation

 


Upgrade Jharkhand News.  रक्षाबंधन यानी रक्षा करने का संकल्प या सूत्र जिसे एक धागे के रूप में बहनें अपने भाई की कलाई में बांधती हैं। जिसका अर्थ होता है कि भाई उनकी सुरक्षा करेगा। रक्षाबंधन का यह धागा जिसे राखी भी कहते हैं सिर्फ बहनें अपने भाई को ही नहीं वरन बहनों को, पिता को, चाचा को,भतीजे को ,भांजे को , वही पुरुषों में पिता बेटे को, बेटा अपने पिता को ,भाई-भाई को,राखी बांध सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में राखियां या रक्षा सूत्र सभी स्वयंसेवक एक दूसरे को  बांधते हैं और राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेते हैं। ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को भी राखी बांधने की परम्परा है। इस प्रकार राखी या संकल्प सूत्र, सुरक्षा सूत्र सिर्फ भाई बहनों के बंधन के साथ ही समाज में आपसी सौहार्द के रूप में आपस में एक दूसरे को बांधकर समाज की एकता को बढ़ाता है। रक्षाबंधन हिंदू धर्म का बहुत पुरातन त्यौहार है। वैदिक हिंदू धर्म में  इसको मनाने की कई कथाएं मिलती हैं। वही जैन धर्म में यह त्यौहार जैन मुनियों की रक्षा के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उल्लेखनीय बात यह है कि वैदिक धर्म और जैन धर्म में जो रक्षाबंधन की कथा है उसके कुछ मुख्य पात्र राजा बलि व कद में छोटे ब्राह्मण वामन एक ही है पर कथाएं अलग-अलग हैं। हम जैन धर्म में रक्षाबंधन बनाने की कथा का वर्णन करते हैं ।



एक बार की बात है आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ जैन मुनि शिष्यों के साथ हस्तिनापुर , उस जमाने के गजपुर के वन में पहुंचे। उस समय हस्तिनापुर का राजा पद्मराय , जैन धर्म का अनुयायी था। पद्मराय के पिता श्री महापद्म अपने छोटे बेटे विष्णु कुमार के साथ संन्यास लेकर वन को चले गए थे और हस्तिनापुर का सिंहासन पद्मराय को सौंप दिया था। पद्मराय के छोटे भाई विष्णु कुमार बाद में तपस्या करके मुनि विष्णु कुमार बने। पद्मराय के दरबार में बलि , नमुचि , बृहस्पति और  प्रह्लाद नाम के चार मंत्री थे। यह चारों मंत्री जैन धर्म विरोधी थे। जब इन मंत्रियों को यह पता चला कि आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ शिष्यों के साथ हस्तिनापुर के वन में आए हैं ,तो वे घबरा गए, क्योंकि उज्जैन में वे इन मुनियों पर उपसर्ग ( बाधाएं या परेशानियां)  कर चुके थे।       उज्जैन के राजा श्री वर्मा के राज्य में जब यह चारों मंत्री थे उस समय आचार्य अकम्पनाचार्य अपने सात सौ मुनि शिष्यों  के साथ विहार करते हुए उज्जैन नगर पहुंचे और नगर के बाहर बगीचे में ठहर गए। आचार्य श्री ने अपने ध्यान से यह जान लिया कि यहां के मंत्री जैन धर्म विरोधी है। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को मौन व्रत धारण करने का, वादविवाद ना करने का और ध्यान लगाने का आदेश दिया। जिस समय आचार्य श्री ने यह आज्ञा दी उस समय श्रुतकीर्ति नामक मुनि नगर में आहार लेने के लिए गए हुए थे इसलिए उन्हें गुरु जी की यह इस आज्ञा का पता नहीं चला। राजा श्री वर्मा धार्मिक स्वभाव के थे। 



अतः पता लगने पर वह मुनियों के दर्शन के लिए चल दिए,हालांकि मंत्रियों ने मना भी किया। पर राजा के जाने पर मंत्रियों को भी राजा के साथ जाना पड़ा। जब राजा दर्शन कर रहे थे तो सभी मुनि अपने ध्यान में मग्न थे और राजा से मुनियों का कोई वार्तालाप नहीं हुआ। ना ही उन्होंने राजा को कोई आशीर्वाद दिया। इस पर मंत्रियों ने राजा को खूब भड़काया पर राजा के मन में मुनियों के दर्शन मात्र से हर्ष उत्पन्न हो गया था और वह विचलित नहीं हुए। वापसी में मंत्रियों ने श्रुतकीर्ति  मुनि को जो नगर में आहार करने गए हुए थे वापस आते हुए देखा और मुनियों की खिल्ली उड़ाते हुए बोले देखो सामने से एक बैल दौड़ता हुआ आ रहा है और मुनियों को अपशब्द कहे। इस पर मुनि श्रुतकीर्ति ने उन्हें शास्त्रार्थ  के लिए ललकारा। वाद विवाद में चारों मंत्री मुनि श्री से हार गए और बहुत लज्जित हुए । इस पर उन्होंने मुनि संघ से मन में बैर बांध लिया।



मुनि श्रुतकीर्ति वन में चले गए और गुरु जी को मंत्रियों से वाद विवाद का सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर गुरु जी ने मुनिराज को उसी जगह पर ध्यान करने को वापस भेज दिया। गुरु की आज्ञा अनुसार श्रुत कीर्ति मुनि वापस जाकर उसी जगह ध्यान लगाकर बैठ गए। रात्रि में चारों मंत्री अपने अपमान का बदला लेने के लिए तलवार लेकर उस स्थान पर पहुंचे जहां वाद विवाद हुआ था और क्रोध के वशीभूत हो मुनि राज को तलवार से मारने के लिए तैयार हो गए। जैसे ही मंत्रियों ने अपनी तलवार उठाई वह वैसे के वैसे ही मूर्ति बनकर रह गए क्योंकि तभी वनरक्षक देवता ने आकर उनको कील दिया,यानी मूर्ति बना दिया और वह मुनिराज को नहीं मार पाए। सुबह होने पर राजा को जब यह पता लगा तो वह उस  स्थान पर पहुंचे और मंत्रियों को हाथ में तलवार लिए देख उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने मंत्रियों को सूली पर चढ़वाने का आदेश दिया इस पर मुनिराज ने कहा कि इन्हें क्षमा कर दीजिए। राजा ने मुनिराज के अनुरोध पर मंत्रियों को जान से नहीं मारा पर उन्हें गधे पर  बैठाकर, मुंह काला कर नगर में घुमाया और देश निकालने का दंड दिया।



उज्जैन से अपने कर्मों के कारण देश निकाला होने के बाद ये चारों मंत्री  हस्तिनापुर पहुंचे। वहां के राजा पद्म राय को अपनी धूर्तता भरी बातों से प्रभावित कर मंत्री पद ले लिया था। इन चारों दोस्त मंत्रियों ने राजा पद्मराय के प्रमुख शत्रु कुंभक सागर के राजा सिंहबल को कपट से बंदी बना लिया।  इस पर राजा पद्मराय ने खुश होकर बलि को वरदान मांगने को कहा। बलि ने बाद में वरदान लेने को कहा और जब मंत्री बलि को आचार्य अकम्पनाचार्य  के अपने सात सौ शिष्यों सहित हस्तिनापुर में पहुंचने की खबर मिली तो वह घबरा गया।  उसने इन मुनियों पर उज्जैन में उपसर्ग किया था। उसे लगा कि अगर यह बात राजा पद्मराय को मालूम पड़ गई तो हमारा भेद खुल जाएगा और राजा हमें यहां से निकाल देगा। राजा पद्मराय जैन धर्म के भक्त थे। मौका देखकर मंत्री बलि  ने इस अवसर पर राजा से अपने वचन की याद दिला , सात दिन के लिए राज्य को मांग लिया।



हस्तिनापुर का राजा बनते ही उसने षड्यंत्र रचते हुए बाहर ठहरे हुए मुनियों के चारों तरफ कांटेदार वृक्ष और लकड़ियां लगाकर उन्हें बीच में घेर दिया और उसमें अग्नि लगा दी। उसने नरमेघ नाम का यज्ञ रचाया और मुनियों को मारने का षडयंत्र आरंभ किया। उस यज्ञ में बहुत अधिक धुआं उठा। जिससे मुनियों पर बहुत बड़ा उपसर्ग हुआ। सभी मुनियों ने विचार किया कि यह उपसर्ग टलने पर ही हम आहार लेंगे और उससे पहले सभी वस्तुओं का त्याग कर दिया। जब राजा बलि ने मुनियों पर यह उपसर्ग प्रारंभ किया उस समय मिथिलापुर नामक नगर के वन  में आचार्य  सारचंद तप कर रहे थे। उन्होंने आकाश में श्रवण तारा को  कम्पायमान होते देखा और अपने अवधि ज्ञान के द्वारा जाना कि कहीं पर मुनियों पर घोर कष्ट हो रहा है। उनके मुख से निकला मुनियों पर उपसर्ग। यह सुनकर उनके पास बैठे पुष्प दंत नाम के मुनि बोले गुरुजी किसे और कहां कष्ट हो रहा है ? तब आचार्य श्री ने बताया कि हस्तिनापुर के वन में बलि ने यज्ञ करके  मुनियों को मारने का षड्यंत्र रचा है। मुनि पुष्पदंत ने मुनियों के ऊपर आए उपसर्ग को दूर करने का उपाय पूछा। तब आचार्य श्री ने कहा कि तुम आकाश गामी  हो अभी जाकर धारिणी सुभूषण पर्वत पर विष्णु कुमार नाम के मुनि के पास जाओ। उन्हें विक्रिया रिद्धि प्राप्त हुई है। विक्रिया रिद्धि यानी शरीर को छोटा बड़ा करने की क्षमता  और उनके पास जाकर उन्हें सब बातें बताओ । मुनि पुष्पदंत आकाश मार्ग से मुनि विष्णु कुमार के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृत्तांत बताया। मुनि विष्णु कुमार को स्वयं नहीं मालूम था कि उन्हें विक्रिया रिद्धि प्राप्त हो गई है अतः उन्होंने परीक्षा के लिए अपनी एक भुजा को फैलाया जो लंबी होकर समुद्र तक जा पहुंची। इसके बाद मुनि श्री विष्णु कुमार तुरंत वहां से हस्तिनापुर पहुंचे l मुनि विष्णु कुमार ने पहले पद्मराय को कठोर शब्दों में धिक्कारा। तब पद्म राय ने बलि के राजा बनने की पूरी बात उन्हें बताई। इस पर मुनि विष्णु कुमार  विक्रिया रिद्धि से पांच अंगुल छोटा सा शरीर बनाकर,विप्र वेश में वहां पहुंचे जहां बलि रोजाना दान करता था। बलि ने ब्राह्मण को देखकर कहा आपको जो चाहिए बताइए मैं आपको सब कुछ दूंगा। ब्राह्मण वेशधारी  मुनि विष्णु कुमार बोले मुझे सिर्फ तीन कदम धरती दीजिए जो मैं अपने पग  से नाप लूंगा। बलि ने ब्राह्मण को तुरंत तीन पग जमीन देने का संकल्प कर लिया।



ब्राह्मण वेशधारी मुनि विष्णु कुमार ने विक्रिया रिद्धि से अपने शरीर को विराट बनाकर जमीन नापना शुरू किया । पहला पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा पग मानुशोत्तर  पर्वत पर पर रखा। तीसरे पग के लिए जमीन ना रही तो बलि से बोले एक पग पृथ्वी और दीजिए या वह स्थान बताइए जहां मैं पग रख सकूं । तब बलि ने कहा मेरे पास अब और पृथ्वी नहीं है आप मेरे पीठ पर तीसरा पग रख लीजिए तब उन्होंने तीसरा पग बलि की पीठ पर रख दिया। बलि थर थर कांपने लगा। देवताओं और असुरों के आसन कांपने लगे । अवधि ज्ञान से सब कुछ जान नारदजी, सुर, असुर  सभी वहां आ गए और उन्होंने ब्राह्मण वेशधारी मुनि विष्णु कुमार को नमस्कार किया और क्षमा मांगते हुए बोले कि आप बलि की पीठ पर से पग हटा लीजिए । मुनिराज ने पग हटाने से पहले सात सौ मुनियों की रक्षा के लिए कहा। बलि ने इसी समय यज्ञ समाप्त कर दिया और मुनि विष्णु कुमार से क्षमा मांगी। इंद्र ने वर्षा कर अग्नि शांत कर दी।



यज्ञ में जलने वाली लकड़ियों के धुएं से सब मुनियों के गले की नसें फट गयी थी,आंखों से पानी बह रहा था। नगर से आए श्रावक गणों ने सभी मुनियों की सेवा की। उनके नेत्र,नाक और मुंह को जल से धोकर उनको होश में लाए। इस प्रकार उपसर्ग समाप्त होने पर सब मुनियों की गले और शरीर की दशा जानकर उनके लिए आहार की व्यवस्था की। आहार लेने में कोई परेशानी ना हो इसलिए उनके लिए दूध पाक और सिवैया बनाई जिससे कि मुनि गण इन्हें आराम से खा सके। सभी मुनि गणों ने नगर में आकर दूध सिवैया का आहार ग्रहण किया और वापस वन में चले गए इसलिए हर रक्षाबंधन पर जैन ही नहीं हिंदू धर्म के सभी घरों में दूध सिवैया बनाई जाती है। घेवर ,फैनी खाने और भेंट करने का प्रचलन है। तब मुनियों ने मुनि विष्णु कुमार को रक्षा सूत्र के रूप में धागा बांधा और  श्रावन शुक्ल पूर्णिमा का यह दिन रक्षा बंधन कहलाया।



क्योंकि इस दिन सात सौ मुनियों पर आया उपसर्ग दूर हुआ था इसीलिए श्रावकगणों ने परस्पर एक दूसरे को कलावा डोरा बांधकर एक दूसरे की रक्षा का और मुनियों की रक्षा का संकल्प लिया। उसी दिन से इस दिन को सलूनो या रक्षाबंधन कहा जाने लगा। राजा पद्मराय ने  चारों मंत्रियों को मुनियों पर उपसर्ग के लिए दंडित करना चाहा तो आचार्य श्री ने कहा कि दया ही धर्म का मूल है। अतः आप इनको दंडित ना करते हुए क्षमा करें। मुनि श्री का यह उपदेश सुनकर चारों मंत्री  सोचने लगे कि जैन धर्म में सत्य का असली रूप विराजमान है। इस धर्म के कारण ही हम दो बार मृत्युदंड से बचे हैं और उन्होंने जैन धर्म अंगीकार कर लिया। आज सीमा पर खड़े सैनिक एक दूसरे को राखी बांधकर एक दूसरे की रक्षा और देश की रक्षा का संकल्प लेते हैं। वहीं देश भर की छात्राएं अपने हाथों से राखी बनाकर देश की सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए भेज रही हैं। इस प्रकार रक्षाबंधन का त्यौहार देश की रक्षा के साथ समाज की रक्षा का भी राष्ट्रीय त्यौहार बन चुका है। इंजी. अतिवीर जैन 'पराग'



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