Mumbai (Anshu Jha) (मुंबई) ज़िंदगी हर किसी के लिए एक सफर है – कभी उजालों से भरा, तो कभी अंधेरों से घिरा। और जब ये अंधेरे लंबे हो जाते हैं, तो दिल में एक सवाल उठता है – "क्या कभी सबेरा होगा?"
शब्दों में पिरोया गया भाव – "अंधेरी सी रात है, कभी तो सवेरा होगा..."हमें उस गहरी निराशा और थकान की ओर ले जाता है, जहाँ इंसान बस एक रोशनी की उम्मीद में बैठा होता है।एक सूखा हुआ, मुरझाया फूल – जो शायद किसी बगिया की शान रहा होगा, आज ज़मीन पर गिरा हुआ है।"मुरझाया सा फूल पड़ा है,कभी तो वो खिला होगा..."इन पंक्तियों में सिर्फ एक फूल नहीं, बल्कि एक बीता हुआ वक़्त, एक भूली हुई मुस्कान, और एक खोया हुआ ख्वाब झलकता है।वो जवानी, जो कभी दिलों में तूफ़ान लाती थी, आज थमी-थमी सी लगती है।"चले गए वो जवानी,कभी तो वो रवानी होगा..."हर व्यक्ति की ज़िंदगी में एक दौर आता है जब उम्र आगे बढ़ती है, लेकिन दिल पीछे मुड़कर उस जोश, उस बेफिक्री को खोजता है जो अब केवल यादों में बची होती है।
आज मौसम पतझड़ का है – रूखा, सूना और वीरान।लेकिन दिल कहता है –"पतझड़ सी मौसम है लेकिन,कभी तो सुहानी होगा..."जैसे हर पतझड़ के बाद बहार आती है, वैसे ही ज़िंदगी के कठिन दौर भी हमेशा के लिए नहीं होते।अंत में एक भाव उठता है –"वक्त के हालात पे मत रो,कभी तो वक़्त भी हमारा होगा..."यह पंक्ति हमें झकझोरती है। याद दिलाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, हर रात के बाद सुबह जरूर आती है। ज़िंदगी ठहरती नहीं, और हर बुरा दौर एक नई सीख देकर चला जाता है।

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