Upgrade Jharkhand News. हर भारतवासी एवं सनातन को मानने वाले मनुष्य के जीवन में श्रीमद्भगवद्गीता का महत्वपूर्ण स्थान है। श्रीमद्भगवद्गीता ने ही हमें सिखाया है कि “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात हे मनुष्य, तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।मध्यप्रदेश की परम पावन पुनीत नगरी उज्जैन में यह उद्धरण स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। यह वह दिव्य नगरी है ,जहाँ न केवल कालचक्र थमता है बल्कि जहाँ से धर्म, ज्ञान और कर्तव्य का प्रकाश पूरी मानवता को दिशा देता है। यही वह पवित्र भूमि है जहाँ बाल कृष्ण ने सान्दीपनि आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर जीवन का वह ज्ञान अर्जित किया,अर्थात अपना कर्म किया वही आगे चलकर करोड़ों लोगों के लिए “श्रीमद्भगवद्गीता” के रूप में अमृतधारा बना। इसलिए जब मध्यप्रदेश में गीता जयंती को व्यापक स्वरूप देने की बात आती है, तो इसकी धड़कन उज्जैन से जुड़ना स्वाभाविक है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में तीन दिवसीय गीता महोत्सव का आयोजन हो रहा है। जो एक से तीन दिसंबर तक चलेगा। महाभारत की युद्धभूमि में अर्जुन की दुविधा को दूर करने वाला दिव्य ज्ञान, उसी उज्जैनी परंपरा का विस्तार था जिसकी जड़ें सान्दीपनि आश्रम में थीं। अतः इस वर्ष जब मध्यप्रदेश सरकार गीता जयंती को राज्यव्यापी उत्सव के रूप में मना रही है, तो यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उज्जैन से उठे उस शाश्वत संदेश का पुनर्जागरण है, जिसने मानव जीवन को दिशा, शक्ति और आस्था दी है।
मध्यप्रदेश में गीता जयंती का महाआयोजन : उज्जैन की परंपरा का विस्तार-इस वर्ष 1 दिसंबर को गीता जयंती पर प्रदेश के 313 विकासखंडों, 55 जिलों और 10 संभागों में एक साथ श्रीमद्भगवद्गीता के 15 वें अध्याय का सामूहिक पाठ होगा। तीन लाख से अधिक गीता-प्रेमियों के सम्मिलित स्वर से जब यह शाश्वत ग्रंथ गूंजेगा, तो वह केवल पाठ नहीं होगा, बल्कि उज्जैन की आध्यात्मिक विरासत का सामूहिक पुनर्पाठ होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जो स्वयं उज्जैन की इसी परंपरा के प्रतिनिधि हैं, इस आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक-मानसिक जागरण का स्वरूप दे रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों में गीता क्विज, गीता वितरण, श्लोक सम्मिलन और जनसाधारण तक प्रतियों का वितरण,यह सब इस विचार के अंतर्गत है कि गीता को पुस्तकालयों की अलमारियों से निकालकर जीवन की दिनचर्या में उतारा जाए।
आधुनिक जीवन की दिशा है गीता का अनुपम ज्ञान- गीता क्यों प्रासंगिक है? इसका उत्तर स्वयं गीता देती है। “योगस्थः कुरु कर्माणि।” यानि योग में स्थित होकर, समभाव रखते हुए कर्म करो। आज का युवा अस्थिरता, प्रतिस्पर्धा, चिंता और असंतुलन से घिरा है। उस परिप्रेक्ष्य में गीता कहती है,मन को स्थिर करो, परिणाम से मत डरो। यह श्लोक आधुनिक मनोविज्ञान की उस मूल धुरी को समझाता है जिसे आज पूरी दुनिया एक “माइंडफुलनेस” आंदोलन के रूप में स्वीकार कर रही है। गीता इसे हजारों वर्ष पहले ही कह चुकी थी। स्कूल-कॉलेजों में गीता पाठ केवल संस्कृत का अभ्यास नहीं है। यह मानसिक मजबूती, धैर्य और मूल्य-आधारित शिक्षा का संचार है। इसी पर गीता में कहा गया है “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान के समान इस संसार में कोई पवित्र वस्तु नहीं। ज्ञान से सशक्त समाज ही भविष्य का नेतृत्व कर सकता है। गीता का अध्ययन बच्चों में चिंतन, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता का विकास करता है। सरकार द्वारा आयोजित प्रतियोगिताएँ इसी मूल्य-चेतना के विस्तार का प्रयास हैं।
कृष्ण की शिक्षा-भूमि और गीता का मूलाधार उज्जैन- सान्दीपनि आश्रम में कृष्ण ने केवल वेद, शास्त्र और शस्त्र नहीं सीखे। उन्होंने जीवन की वह दृष्टि सीखी जिसने उन्हें गीता का उपदेशक बनाया। शिक्षा, संवाद, नीति, युद्धकला, तर्क, अनुशासन,इन सबका संगम उज्जैन में हुआ। यही कारण है कि गीता का आध्यात्मिक बीज उज्जैन में रोपित हुआ और कुरुक्षेत्र में परिपक्व वृक्ष बनकर खड़ा हुआ। इसी कारण जब मध्यप्रदेश सरकार उज्जैन को गीता जयंती के केंद्र में रखती है, तो यह भारतीय संस्कृति के मूल को फिर से धरातल पर स्थापित करने जैसा है।
आधुनिक समय में गीता क्यों जरूरी- आज का समाज तनाव, संघर्ष, अवसाद, भ्रम और दिशा-भ्रम से जूझ रहा है। ऐसे समय में गीता जीवन का सबसे सरल, स्पष्ट और प्रभावी मार्गदर्शन देती है “उद्धरेदात्मनाऽत्मानं।” अर्थात मनुष्य अपने द्वारा स्वयं को ऊपर उठाए। यह संदेश आत्मनिर्भरता, आत्मबल और आत्मविश्वास की शिक्षा है। समाज को आज दूसरों से अपेक्षा करने की नहीं बल्कि स्वयं को सशक्त करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विश्व नेताओं को श्रीमद्भगवद्गीता भेंट किया जाना भी इसी बात का संकेत है कि यह ग्रंथ किसी धर्म का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का ज्वलंत मार्गदर्शक है। मध्यप्रदेश में गीता जयंती मनाना सांस्कृतिक नवजागरण का प्रतीक है। इस वर्ष गीता जयंती केवल एक पर्व नहीं,एक आंदोलन है। तीन लाख लोगों का सामूहिक पाठ, प्रदेशभर में सांस्कृतिक गतिविधियाँ, छात्रों में गीता पर आधारित प्रतियोगिताएँ, और विस्तृत जनसहभागिता,यह सब संकेत देता है कि गीता मध्यप्रदेश के सामाजिक ताने-बाने में नई ऊर्जा का संचार कर रही है।
यह आंदोलन जीवन को सरल, संयमित और कर्मप्रधान बनाने की दिशा में जनजागरण है। अंत में गीता का यह सार्वकालिक संदेश “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत… तदा आत्मानं सृजाम्यहम्।” अर्थात जब समाज दिशा खो देता है, जब भ्रम बढ़ता है, जब मनुष्य स्वयं को भूल जाता है,तब सत्य का प्रकाश अवश्य उदय होता है। आज गीता वही प्रकाश है और उज्जैन वही स्रोत है। मध्यप्रदेश में इस वर्ष गीता जयंती केवल उत्सव नहीं,एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण का आरंभ है। पवन वर्मा

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