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Jamshedpur जमशेदजी नुसरवानजी टाटा : भारतीय उद्योग जगत के महान शिल्पकार Jamsetji Nusserwanji Tata: The Great Architect of Indian Industry

 


Upgrade Jharkhand News. भारतीय औद्योगिक इतिहास में यदि किसी एक व्यक्तित्व को आधुनिक भारत की आर्थिक दिशा और औद्योगिक संरचना का निर्माता कहा जाए, तो वह नाम निःसंदेह जमशेदजी नुसरवानजी टाटा है। वर्ष 1839 में गुजरात के नवसारी में जन्मे जमशेदजी एक साधारण पारसी परिवार से थे, लेकिन उनकी दृष्टि और संकल्प असाधारण थे। मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने व्यापार की दुनिया में कदम रखा और धीरे-धीरे वह भारतीय उद्योग की क्रांतिकारी सोच के प्रतिनिधि बन गए। आर. डी. टाटा ने देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा 'टाटा एयरलाइंस' शुरू की थी, जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा 'एयर इंडिया' बन गई। इस कारण जे. आर. डी. टाटा को 'भारत के नागरिक उड्डयन का पिता' भी कहा जाता है।जे. आर. डी. टाटा भारत के पहले लाइसेंस प्राप्त पायलट थे। जीवन के आरंभिक दिनों में वह एवियशन की दुनिया की अग्रणी शख़्सियत लुईस ब्लेरियात से बहुत प्रभावित थे। इसी वजह से उन्होंने इसे कैरियर के रूप में अपनाया। 10 फ़रवरी, 1929 को जे. आर. डी. टाटा को पायलट का लाइसेंस दिया गया था। 1932 ई. में जे. आर. डी. टाटा ने भारत की पहली विमानन सेवा 'टाटा एयरलाइंस' की आधार शिला रखी। यही एयरलाइंस 1946 में 'एयर इंडिया' के रूप में भारत की राष्ट्रीय विमान सेवा बनीl


जमशेदजी ने 1868 में टाटा समूह की नींव रखी। उस समय भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास लगभग न के बराबर था। देश कच्चा माल निर्यात करता था और तैयार माल आयात पर निर्भर था। इस चुनौती को जमशेदजी ने भारत के विकास का अवसर माना। उनका विश्वास था कि भारत तभी मजबूत हो सकता है जब वह अपने उद्योग स्थापित करे, वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा दे, और तकनीकी विकास को अपनाए।



उद्योग के क्षेत्र में उनका पहला बड़ा कदम कपड़ा उद्योग था। नागपुर का एम्प्रेस मिल, जिसे 1877 में स्थापित किया गया, भारतीय उद्योग की दिशा बदलने वाली परियोजनाओं में से एक थी। यह मिल सिर्फ व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं थी, बल्कि प्रबंधन, श्रमिक कल्याण और गुणवत्ता में उत्कृष्टता का उदाहरण थी। जमशेदजी के नेतृत्व में यह मिल ब्रिटिश कपड़ा उद्योग से सीधी प्रतिस्पर्धा में उतर आई।जमशेदजी के जीवन का सबसे बड़ा सपना था—भारत में स्टील उद्योग की स्थापना। उन्होंने अमेरिका और यूरोप का दौरा किया, विशेषज्ञों से मिले और भारत में लोहे-इस्पात की संभावनाओं पर अध्ययन कराया। यद्यपि वे अपने जीवन में इस सपने को साकार होते नहीं देख पाए, लेकिन उनकी योजना और प्रारंभिक कार्यों की बदौलत 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टाटा स्टील) अस्तित्व में आई। आज जमशेदपुर, जिसे उनके सम्मान में “टाटा नगर” कहा जाता है, स्वयं उनकी औद्योगिक दूरदृष्टि का प्रमाण है।



जमशेदजी का दूसरा महान सपना था—भारत में विश्व-स्तरीय वैज्ञानिक शिक्षा और शोध संस्थान की स्थापना। उनका मानना था कि कोई भी राष्ट्र तभी प्रगति कर सकता है जब वह ज्ञान, विज्ञान और अनुसंधान में स्वयं को मजबूत बनाए। इसी सोच के परिणामस्वरूप बाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरु अस्तित्व में आया। यह संस्थान आज दुनिया के प्रमुख शोध केंद्रों में गिना जाता है।तीसरा सपना था—भारत में विश्वस्तरीय होटल का निर्माण। इसी उद्देश्य से उन्होंने मुंबई में ताज महल होटल की स्थापना की, जो 1903 में खोला गया। यह होटल भारतीय प्रतिष्ठा और आधुनिकता का प्रतीक बन गया।जमशेदजी टाटा ने अपनी सफलता को केवल उद्योग तक सीमित नहीं रखा। वे अपने कर्मचारियों के कल्याण, सामाजिक सुधार और राष्ट्र की प्रगति को भी उतना ही महत्त्व देते थे। मजदूरों के लिए आवास, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सुरक्षित कार्य वातावरण और सामुदायिक विकास जैसी अवधारणाएँ उन्होंने उस दौर में अपनाईं, जब ये दुनिया में भी आम नहीं थीं।



जे. आर. डी. टाटा के योगदानों के कारण उन्हें दुनिया भर के तमाम पुरस्‍कारों से नवाजा गया। 1954 में फ़्राँस ने उन्हें अपने सर्वोच्‍च नागरिकता पुरस्कार 'लीजन ऑफ द ऑनर' से नवाजा। 1957 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया। 1988 में उन्हें 'गुगेन‌हीम मेडल फॉर एवियेशन' प्रदान किया गया। 1992 में भारत सरकार ने अपने इस सपूत को देश के सर्वोच्‍च अलंकरण 'भारत रत्न' से सम्‍मानित किया। उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत में जनसंख्या नियंत्रण में अहम योगदान देने के लिए 'यूनाइटेड नेशन पापुलेशन आवार्ड' से सम्‍मानित किया।1904 में जमशेदजी का निधन हुआ, लेकिन उनके अधूरे सपने बाद में पूरे हुए और टाटा समूह आज भी उनके सिद्धांतों पर खड़ा है।भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखने वाले इस महान उद्योगपति ने सिद्ध किया कि एक दूरदर्शी व्यक्ति राष्ट्र के भविष्य को दिशा दे सकता है। जमशेदजी टाटा केवल उद्योगपति नहीं थे—वे भारत के औद्योगिक पुनर्जागरण के युग-निर्माता थे।



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