- प्रशासनिक विश्वासघात का परिणाम भोगती आम जनता
Upgrade Jharkhand News. इंदौर में 15 लोगों की मौत किसी दुर्घटना या कोरोना महामारी की तरह नहीं हुई। ये मौतें धीरे-धीरे आईं, चेतावनियों के बीच आईं और उस चुप्पी की कोख से पैदा हुईं, जिसमें लोगों की शिकायतें दफन कर दी गईं। जिन नलों से हर सुबह जीवन बहना चाहिए था, उन्हीं नलों से ज़हर आता रहा। लोगों ने बदबूदार और गंदे पानी की शिकायतें की, बीमारी की आशंका जताई, लेकिन नगर निगम ने सुनने के बजाय दबाना चुना। यही वह क्षण था, जब प्रशासनिक लापरवाही, प्रशासनिक विश्वासघात में बदल गई। यह त्रासदी इसलिए ज्यादा पीड़ादायक है क्योंकि इसे रोका जा सकता था। अगर शिकायतों को गंभीरता से लिया गया होता, अगर चेतावनी को परेशानी नहीं बल्कि खतरे का संकेत समझा गया होता, तो 15 घरों में आज सन्नाटा नहीं होता। ये मौतें और आज की तारीख में एक हजार से ज्यादा लोगों का बीमार होना सिर्फ व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि उस भरोसे का टूटना हैं, जो आम नागरिक अपने प्रशासन पर करता है। जब जनता चेतावनी देती है और व्यवस्था चुप्पी ओढ़ लेती है, तब जिम्मेदारी टलती नहीं, बल्कि जानलेवा बन जाती है। इंदौर की यह घटना स्वच्छता के उन तमाम दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिनमें चमक तो बहुत है, लेकिन संवेदना नहीं।
मेरा आज का ये लिखना भी उसी मूल सवाल से शुरू होता है, अगर पानी दूषित था और शिकायतें पहले से मौजूद थीं, तो फिर इस प्रशासनिक विश्वासघात की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर क्यों चुकानी पड़ी ? यह तथ्य अब सामने है कि दूषित पानी की आपूर्ति को लेकर स्थानीय लोगों ने बार-बार नगर निगम से शिकायतें की थीं। बदबू, रंग बदलने और बीमारी फैलने की आशंका तक जाहिर की गई थी। इसके बावजूद इन शिकायतों को न तो गंभीरता से लिया गया और न ही सार्वजनिक चेतावनी जारी की गई। उलटे, इन्हें दबाने का प्रयास किया गया, ताकि शहर की ‘स्वच्छ’ छवि पर सवाल न उठे। यही वह बिंदु है, जहां यह मामला सामान्य प्रशासनिक चूक से आगे निकलकर संस्थागत संवेदनहीनता का रूप ले लेता है। इस घटना ने यह भी कड़वा सच स्पष्ट कर दिया कि नगर निगम प्रशासन, जिला प्रशासन और अन्य सरकारी दफ्तरों में आमजन की शिकायतों और आवेदनों को किस दृष्टि से देखा जाता है। शिकायतें समाधान की मांग नहीं, बल्कि फाइलों का बोझ मान ली जाती हैं। नागरिक की आवाज को सिस्टम की असुविधा समझा जाता है। इंदौर की यह त्रासदी बताती है कि यह सोच केवल प्रशासनिक अहंकार नहीं, बल्कि जानलेवा मानसिकता बन चुकी है।
स्वच्छता के राष्ट्रीय पुरस्कारों और रैंकिंग ने इंदौर को पहचान जरूर दी, लेकिन उसी पहचान ने प्रशासन को आत्ममुग्ध भी कर दिया। स्वच्छता को निरंतर जांच की प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्थायी उपलब्धि मान लिया गया। यही भ्रम सबसे घातक साबित हुआ। जब किसी शहर को आदर्श मान लिया जाता है, तब उसकी खामियों पर सवाल उठाने वालों को या तो अनदेखा किया जाता है या खामोश कर दिया जाता है। इंदौर में शिकायतों के साथ यही हुआ। पानी एक दिन में जहरीला नहीं होता। यह धीरे-धीरे खराब होता है और अपनी मौजूदगी का संकेत देता रहता है। जब लोग लगातार शिकायत कर रहे हों, तो वह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि चेतावनी होती है। इंदौर में यह चेतावनी बार-बार दी गई, लेकिन प्रशासन ने उसे स्वीकार करने के बजाय दबाने का रास्ता चुना। यहीं से यह त्रासदी टालने योग्य नहीं रही। इस पूरे घटनाक्रम के बाद सरकार ने इसे गंभीरता के साथ लेते हुए इसे सबक के रूप में स्वीकार किया है। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को पद से हटाया गया है। अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और पिछले 13 वर्षों से शहर की जल वितरण व्यवस्था संभाल रहे प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया गया है। यह कार्रवाई यह संदेश जरूर देती है कि जवाबदेही तय करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह भी सच है कि यह कदम मौतों के बाद उठाया गया, शिकायतों के समय नहीं।
वैसे अब सरकार ने इस घटना को केवल इंदौर तक सीमित न मानते हुए पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी के रूप में लिया है। नगरीय प्रशासन विभाग ने मध्यप्रदेश के सभी 16 नगर निगमों सहित 413 नगरीय निकायों को निर्देश दिए हैं कि सात दिनों के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों में जलापूर्ति पाइपलाइनों में रिसाव की जांच करें और पानी की शुद्धता की जांच कराएं। यह निर्देश अपने-आप में स्वीकारोक्ति है कि समस्या प्रणालीगत है और किसी एक शहर तक सीमित नहीं। इस मामले ने राजनीतिक माहौल को भी गर्म कर दिया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इंदौर में लोगों को पानी नहीं, जहर पिलाया गया और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में रहा। बयान राजनीतिक हो सकता है, लेकिन जिस सवाल को वह उठाता है, वह जनता के भरोसे से जुड़ा है और उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मामला अब न्यायिक दायरे में भी पहुंच चुका है। इंदौर हाईकोर्ट में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जनहित याचिका दायर की गई है, जिसे इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश ईनाणी ने प्रस्तुत किया है। अदालत की निगरानी से उम्मीद जगी है कि यह मामला केवल निलंबन और स्थानांतरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिकायतें दबाने की जिम्मेदारी भी तय होगी।
असल सवाल अब यह नहीं है कि किसे हटाया गया और किसे निलंबित किया गया। असली सवाल यह है कि शिकायतों को दबाने की मानसिकता कैसे बनी और उसे संरक्षण किस स्तर पर मिला। जब तक इस सोच पर सीधा प्रहार नहीं होगा, तब तक हर कार्रवाई अधूरी ही मानी जाएगी। इंदौर की यह त्रासदी एक कड़ी चेतावनी है। स्वच्छता का अर्थ सिर्फ साफ दिखना नहीं, बल्कि सुरक्षित होना है। जब व्यवस्था आमजन की आवाज को बाधा मानने लगे, तब खतरा केवल पानी में नहीं, पूरे सिस्टम में फैल जाता है। यदि इस घटना से अब भी यह सबक नहीं लिया गया कि शिकायतें लोकतंत्र की सबसे अहम चेतावनी होती हैं, तो अगली बार यह चेतावनी देने वाला कोई बचेगा ही नहीं और तब न जवाबदेही बचेगी, न विश्वास, बचेगें तो सिर्फ पछतावे के आंसू। पवन वर्मा

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