Upgrade Jharkhand News. पानी हमारी प्यास बुझाता है। प्यास लगना इस बात का संकेत है कि हमारे शरीर को पानी को जरूरत है। यह शरीर को चुस्त बनाए रखता है। इसके द्वारा खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व रक्त में मिल जाते हैं। पानी शरीर के रक्त का बहाव यथावत रखता है। वह शरीर के अतिरिक्त विषैले तत्व बाहर निकालने में सहायक होता है। यह शरीर के ताप को ठीक बनाए रखता है। यह रंगहीन पीने का पानी निश्चय ही साफ होना चाहिये, शुद्ध स्वच्छ गंधहीन और गंदगी रहित होना चाहिये। इसमें किसी तरह के हानिकारक तत्व नहीं होना चाहिये। पीने का पानी कैसा हो ? इस विषय पर वैज्ञानिकों ने काफी प्रयोग किये हैं और पानी की गुणवत्ता को तय करने के मापदंड बनाये हैं। पीने के पानी का रंग, गंध, स्वाद सब अच्छा होना चाहिए। ज्यादा कैल्शियम या मैगनेशियम वाला पानी कठोर जल होता है और पीने के योग्य नहीं होता है।
पानी में उपस्थित रहने वाले हानिकारक रसायनों की मात्रा पर भी अंकुश आवश्यक है। आर्सेनिक, लेड, सेलेनियम, मरकरी तथा फ्लोराईड, नाइट्रेट आदि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं। पानी में कुल कठोरता 300 मिली ग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होने पर पानी शरीर के लिये नुकसानदायक हो जाता है। पानी में विभिन्न बीमारियों के कीटाणुओं का होना, हानिकारक रसायनों का होना कठोरता होना पानी को पीने के अयोग्य बनाता है। पीने का जल शुद्ध हो, प्यास बुझाये, मन को प्रफुल्लित रखे, तभी वह शुद्ध पेयजल होता है। हमारे शरीर का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना है। प्रतिदिन शरीर को 6 से 10 गिलास पानी की आवश्यकता होती है। इस आवश्यक्ता का एक बड़ा भाग खाद्य पदार्थों के रूप में शरीर ग्रहण करता है। शेष पानी मनुष्य पीता है। गर्मियों में पानी ज्यादा चाहिये क्योंकि पसीने के रूप में काफी ज्यादा पानी शरीर से वापस बाहर निकल जाता है, सर्दी में पानी की मात्रा कम चाहिये। पानी भोजन के पाचन, रुधिर संचरण तथा समस्त अन्य जैव क्रियाओं के लिये अत्यंत आवश्यक है। सुबह उठकर एक गिलास शीतल जल का सेवन व्यक्ति को कई बीमारियों से बचाता है।
हमारे यहां आमतौर पर पानी की शुद्धता और स्वच्छता के बारे में बहुत लापरवाही बरती जाती है। पीने लायक साफ पानी न तो उपलब्ध है और न ही इसकी मांग की जाती है। पानी में तरह तरह की गंदगी होती है, जिसके बारे में बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता। सच पूछिए तो इसके बारे में आम लोगों को अधिक जानकारी भी नहीं है। गंदगी में जो रोगों के जीवाणु होते हैं, वे आँख से दिखते नहीं, केवल माइक्रोस्कोप से दिखते हैं। इसी गंदगी की वजह से और इसके रोग के जीवाणुओं से बहुत सी बीमारियां होती है जैसे दस्त, पेचिस, हैजा, पीलिया, नारू और भी कई आंत संबंधी रोग पानी से होने वाली बीमारियों के नाम से जाने जाते हैं। ज्यादातर लोग पीने का पानी किसी पोखर या तालाब से लेते हैं जहां बर्तन भी धोए जाते हैं, कपड़े भी धोए जाते हैं, लोग खुद भी नहाते हैं, गाय, भैंसों को भी नहलाते हैं। यह सारी गंदगी अन्दर चली जाती है। इसी प्रकार पानी कुओं से भी लिया जाता है जो ज्यादा गहरे नहीं होते और खुले छोड़ दिए जाते हैं। हवा के साथ इसमें धूल, मिट्टी, पत्ते, पक्षी की बीट इत्यादि जाकर गिरती है और पानी को प्रदूषित करती है। कुछ गांवों में हैण्डपंप की सुविधाएं दी गई हैं, परंतु उसके ऊपर की गोलाई में कीचड़ व कूड़ा करकट पड़ा होता है। वहां से गंदा पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर स्वच्छ पानी को खराब कर देता है। फिर वह पानी पीने योग्य नहीं रह जाता। पाइप लाइनों से आने वाले पानी में भी पाइप लाइन की टूटफूट,जंग,सीवेज का पानी इन पाइप लाइनों में मिलने और पर्याप्त साफ सफाई के अभाव में पानी दूषित हो जाता है और जान लेवा साबित होता है। अंजनी सक्सेना

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