Upgrade Jharkhand News. आदि शंकराचार्य का जीवन वृत्तांत भारतीय अध्यात्म की वह अमर गाथा है, जिसने खंडित होती हुई सांस्कृतिक चेतना को पुनः एक सूत्र में पिरोया। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह था, जब एक बालक सत्य की खोज में केरल के कालड़ी ग्राम से उत्तर की ओर निकला। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं थी, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते हुए सनातन धर्म के पुनरुद्धार की पदयात्रा थी। केरल की धरती को छोड़कर जब शंकर आगे बढ़े, तो उनके हृदय में केवल एक ही लक्ष्य था एक ऐसे पूर्ण गुरु की प्राप्ति जो उन्हें ब्रह्मविद्या का बोध करा सके। इसी खोज में वे ऊबड़-खाबड़ रास्तों, घने जंगलों,जलती रेतीली भूमि और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए मध्य प्रदेश की हृदयस्थली में स्थित नर्मदा नदी के तट पर पहुँचे। यह वह समय था जब उनकी आयु मात्र आठ वर्ष के आसपास रही होगी।नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर (मान्धाता) वह पावन स्थल है, जहाँ शंकर के जीवन की दिशा निर्धारित हुई। ऐतिहासिक साक्ष्यों और परंपराओं के अनुसार, लगभग 796 ईस्वी के आसपास बालक शंकर ओंकारेश्वर पहुँचे थे। यहाँ नर्मदा की लहरों के बीच स्थित गुफाओं में स्वामी गोविंद भगवत्पाद घोर तपस्या में लीन थे। गुरु और शिष्य के उस प्रथम मिलन का दृश्य अद्भुत रहा होगा। जब गुरु ने गुफा के भीतर से पूछा कि "तुम कौन हो?", तब बालक शंकर ने अपने आत्मबोध को 'दशश्लोकी' के माध्यम से प्रकट किया कि
न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुः, न खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः।
अनेकान्तिकत्वात् सुषुप्त्येकसिद्धः, तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥
अर्थात् न मैं भूमि हूँ, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश। न मैं इंद्रिय हूँ और न उनका समूह। गहरी निद्रा में जिसका अनुभव होता है, वह अद्वितीय, अविनाशी और केवल आनंद स्वरूप शिव मैं ही हूँ। गुरु गोविंद भगवत्पाद ने जब इस अलौकिक उत्तर को सुना, तो उन्हें ज्ञात हो गया कि उनके सम्मुख साक्षात भगवान शिव का अवतार खड़ा है। उन्होंने शंकर को विधिवत संन्यास की दीक्षा दी और उन्हें अद्वैत वेदांत की शिक्षाओं में पारंगत किया। ओंकारेश्वर की उन्हीं गुफाओं में रहकर शंकराचार्य ने योग और दर्शन की उन गहराइयों को प्राप्त किया, जो आगे चलकर 'दिग्विजय' का आधार बनीं। नर्मदा के तट पर ही एक अन्य चमत्कारिक घटना का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि एक बार नर्मदा में भीषण बाढ़ आई, जिससे तट पर स्थित बस्तियाँ और जीव-जंतु संकट में पड़ गए। अपने गुरु की समाधि की रक्षा के लिए शंकराचार्य ने अपने 'योग बल' और मंत्र शक्ति से उफनती हुई नर्मदा के जल को अपने कमंडल में समाहित कर लिया। इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि उनके भीतर प्रकृति को भी अनुशासित करने वाली दिव्य शक्ति विद्यमान है। उनके इस सामर्थ्य को देखकर गुरु ने उन्हें आज्ञा दी कि वे काशी (वाराणसी) जाएँ और वेदों के वास्तविक अर्थ को लोककल्याण के लिए प्रकट करें।
शंकराचार्य के जीवन का संघर्ष केवल भौतिक बाधाओं तक सीमित नहीं था। उनका सबसे बड़ा संघर्ष उस समय की जड़ मान्यताओं और भ्रांतियों से था। उन्होंने देखा कि समाज 'द्वैत' के भ्रम में फँसा है। जहाँ मनुष्य और ईश्वर के बीच एक ऐसी खाई बना दी गई थी जिसे केवल कठिन कर्मकांडों से भरा जा सकता था। आचार्य शंकर ने इस खाई को 'ज्ञान' से भरा। तब उन्होंने घोषणा की
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो, विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
अर्थात् मैं निर्विकल्प हूँ, निराकार हूँ। मैं समस्त इंद्रियों में व्याप्त हूँ और सर्वत्र हूँ। मुझे न आसक्ति है, न मुक्ति और न ही मैं कोई मापने योग्य वस्तु हूँ। मैं केवल चैतन्य, आनंद स्वरूप शिव हूँ।
सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए उन्होंने जो 'दिग्विजय यात्रा' की, उसका केंद्र बिंदु अद्वैत वेदांत था। उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक पैदल यात्रा करते हुए शून्यवादी बौद्धों, कट्टर मीमांसकों और विभिन्न संप्रदायों के विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। उनका उद्देश्य मतों का खंडन करना नहीं, बल्कि उन्हें सत्य के वृहत्तर प्रकाश में लाना था। उनके लिए सनातन धर्म कोई मृत परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवंत दर्शन था। उन्होंने समझाया कि जैसे आभूषण अलग-अलग दिखते हैं लेकिन वे सब स्वर्ण ही हैं, वैसे ही ईश्वर के रूप अनेक हो सकते हैं लेकिन मूल तत्व एक ही है। आचार्य शंकर ने सनातन की रक्षा के लिए संगठन की शक्ति को पहचाना। उन्होंने भारत के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की, जो आज भी भारतीय संस्कृति के अक्षय स्तंभ हैं। बद्रीनाथ का ज्योतिर्मठ, द्वारका का शारदा पीठ, पुरी का गोवर्धन मठ और श्रृंगेरी का शारदा मठ इन चारों केंद्रों ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की आध्यात्मिक चेतना कभी क्षीण न हो। उन्होंने संन्यासियों की एक ऐसी सेना तैयार की जो शस्त्रों से नहीं, बल्कि शास्त्रों से धर्म की रक्षा करती थी।
शंकराचार्य का व्यक्तित्व केवल पांडित्य तक सीमित नहीं था, वे एक परम कारुणिक भक्त भी थे। उन्होंने उन लोगों के लिए भी मार्ग बनाया जो दर्शन की गहराइयों को नहीं समझ सकते थे। 'भज गोविंदम' के माध्यम से उन्होंने गृहस्थों को जीवन की नश्वरता का बोध कराया और कहा-
दिनमपि रजनी सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः, तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥
अर्थात् दिन और रात, सुबह और शाम, शिशिर और वसंत ऋतुएँ बार-बार आती और जाती हैं। काल निरंतर क्रीड़ा कर रहा है और आयु घटती जा रही है, किंतु फिर भी मनुष्य अपनी तृष्णा और आशाओं के जाल को नहीं छोड़ता।
उनका संघर्ष स्वयं के जीवन में भी तब दिखाई दिया जब उन्होंने अपनी माता को अंतिम विदाई दी। एक संन्यासी के लिए सभी सांसारिक संबंध समाप्त हो जाते हैं, किंतु शंकराचार्य ने सिद्ध किया कि अध्यात्म मनुष्यता के विरुद्ध नहीं है। उन्होंने लोक-निंदा सहकर भी अपनी माता का अंतिम संस्कार किया, जो उनके अटूट संकल्प और प्रेम का प्रतीक था। आदि शंकराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में वह सब कुछ प्राप्त कर लिया, जो युगों-युगों तक मानव जाति का मार्ग प्रशस्त करेगा। उन्होंने अज्ञान की निद्रा में सोए हुए भारत को 'अहम ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) के घोष से जगाया। उनके कार्य केवल धार्मिक नहीं थे, वे भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ने वाले सांस्कृतिक सेतु थे। यदि आज गंगा की आरती से लेकर रामेश्वरम के अभिषेक तक एक ही सुर गूँजता है, तो उसके पीछे आचार्य शंकर का वही कठिन परिश्रम और तपस्या है।
सनातन धर्म के इस महान नायक का संदेश आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि सत्य एक है, उसे जानने के मार्ग अनेक हो सकते हैं। उनके अद्वैत दर्शन में न कोई ऊंच है न नीच,न कोई पराया है न कोई शत्रु। सब कुछ उस एक ही चेतना का विस्तार है। हिमालय की गोद में विलीन होने से पहले उन्होंने संपूर्ण विश्व को जो ज्ञान दिया, वह आज भी हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की क्षमता रखता है। शंकराचार्य का जीवन हमें याद दिलाता है कि एक व्यक्ति का संकल्प पूरे युग को बदल सकता है। उन्होंने न केवल सनातन धर्म को विलुप्त होने से बचाया, बल्कि उसे एक ऐसी दार्शनिक सुदृढ़ता प्रदान की, जिस पर आज भी पूरी दुनिया गर्व करती है। वे भारत की आत्मा के वह स्वर हैं, जो अनंत काल तक ब्रह्मांड में गूँजते रहेंगे। पवन वर्मा




































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