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Bhopal व्यंग्य-स्वच्छता में नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज Satire: The number one 'nectar' in cleanliness and the drainage of hell

 


Upgrade Jharkhand News. इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच।  प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है। भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।


इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता। शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।


जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं। रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा। 


पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा। विवेक रंजन श्रीवास्तव



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