Upgrade Jharkhand News. एक अदद साहित्यकार में बहुत सी विशेषताएं होती हैं, मसलन वह अपने आप को औरों से श्रेष्ठ समझता भी है और प्रदर्शित भी करता है। ऐसा क्यों होता है, यह गहन अध्ययन का विषय है, किन्तु ऐसा होता है, स्थान चाहे कोई भी हो, औरों से अलग दिखने की चाह में उसका पहनावा और बातचीत करने का ढंग अलग ही होता है। वह अपने आप में ही जीता है, आत्ममुग्ध रहता है, जैसे वह आम आदमी न होकर संसार का विलक्षण प्राणी व बुद्धिजीवी हो। वह औरों की नहीं सुनता। केवल अपनी कहता है। एक साहित्यकार मित्र की मृत्यु के उपरांत तेरहवीं के आयोजन में ऐसे ही एक स्वयंभू साहित्यकार से परिचित होने का अवसर मिला। शोक सभा प्रारंभ होने से पूर्व तक एक पॉलिथीन की फाइल में कविता नुमा कुछ पंक्तियाँ टाइप कराकर लाए थे। साथ में उनकी कुछ शिष्याएं भी थी, जो स्वयं को काव्य की विविध विधाओं में पारंगत बता रही थी। चूँकि साहित्यकार मित्र दोहे और मुक्तकों के अच्छे जानकार थे, इसलिए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए काव्यमयी पंक्तियाँ लिखकर लाई थी।
शोक सभा प्रारंभ हुई, तो स्वयंभू साहित्यकार मित्र ने संचालक महोदय को स्पष्ट रूप से बता दिया, कि पहले माइक पर उन्हें बुलाना, वह दिवंगत साहित्यकार के परिजनों को एक शोक सन्देश सौंपेंगे तथा दो शब्द कहेंगे। संचालक महोदय भी उनसे प्रभावित हुए, कोट , टाई, साथ में मफलर के साथ उनका डील डौल प्रभावित करने वाला था ही। संचालक महोदय ने कम शब्दों में बड़ी भूमिका बनाई तथा उन्हें माइक पर आमंत्रित किया। महोदय आए,माइक पर खड़े होते ही दिवंगत साहित्यकार मित्र के परिजनों को बुलाया तथा प्लास्टिक कोटेड शोक सन्देश उनके पुत्र के हाथ में देकर बोले अब मैं शोक सन्देश पढता हूँ। काव्यमयी शोक सन्देश पूरे मनोयोग से पढ़ ही रहे थे, कि उनकी एक शिष्या भी मोबाइल लेकर अपनी शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए आ खड़ी हुई।
संचालन में सिद्धहस्त संचालक महोदय ने बड़ी चतुराई से शिष्या महोदया को बाद में बुलाने का आश्वासन देकर बिठाया। उसके बाद एक अन्य स्वयंभू साहित्यकार की बारी थी, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी आत्ममुग्धता का परिचय दिया। दिवंगत साहित्यकार की कृतियों व व्यक्तित्व की समीक्षा की जगह अपने ही साहित्य का बखान किया। बहरहाल कम समय में दूरदराज से आए तथा स्थानीय साहित्यकारों ने दिवंगत साहित्यकार मित्र की साहित्यिक उपलब्धियों की चर्चा की। कुछ काव्यप्रेमी अपनी अपनी जेब में शोक श्रद्धांजलि दोहा, मुक्तक व कविताओं में लिखकर लाए थे। बार बार अपनी जेब से कागज निकालकर अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे आत्ममुग्ध नहीं थे। आत्ममुग्ध होते, तो अपना नाम संचालक महोदय को बताकर माइक तक पहुँचने का जुगाड़ करते। बहरहाल आयोजन चाहे जैसा भी हो, आत्ममुग्ध साहित्यकार अपना स्थान अग्रिम पंक्ति में रखने में सफल हो ही जाते हैं। डॉ. सुधाकर आशावादी

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