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Bhopal दृष्टिकोण -वीभत्स सोच की सार्वजनिक प्रस्तुति पर अंकुश आवश्यक Viewpoint: Public presentation of hateful thinking needs to be curbed.

 


Upgrade jharkhand News. भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी हदें पार करने लगी है। जिसे देखो वही स्वयं को सबसे बड़ा उपदेशक सिद्ध करने की फ़िराक़ में रहता है। कोई प्रशासनिक अधिकारी वैवाहिक सम्बंध स्थापित करने के लिए अपने निकम्मे नकारा लड़कों के लिए किसी ख़ास बिरादरी की दुल्हनों लाने के लिए सार्वजनिक रूप से कामना करता है, तो कोई अपनी बिरादरी की कन्याओं की उपेक्षा करके और बिरादरियों से अपेक्षा करता है, कि उन बिरादरियों की कन्याओं का विवाह ऐसे लोगों से कर दिया जाए, जो मानसिक रूप से पिछड़े हैं तथा बिना बैसाखियों के समाज में कंधे से कंधा मिलाकर नही चल सकते। हद तो तब हो जाती है, जब मानसिक रोगी सुंदरता को भी बिरादरियों से जोड़ता है तथा नारी सौंदर्य को वासना के लिए आमंत्रित करने वाला दर्शाता है। उस मानसिक विकलांग के लिए कुछ ही बिरादरियों की कन्याओं में ख़ूबसूरती होती है, अधिकांश जातियों में नहीं।


कहने का आशय यह है कि जितने मुँह उतनी बातें। अपने धूर्तता भरे बयानों से समाज का ध्यान आकर्षित करने के फेर में ओछी सियासत के कीड़े अपनी मानसिक विकलांगता का परिचय देने से बाज नही आते। ऐसे तत्वों का नाम लिखकर ऐसे तत्वों का महिमा मंडन करना मैं उचित नहीं समझता, क्योंकि यह मामला व्यक्ति का नही है, उस सड़ी हुई मानसिकता का है, जो कभी सर्वे भवंतु सुखिनःकी भावना को स्वीकार नहीं करती। जिनकी बुद्धि लब्धि का स्तर शून्य से भी कम है, जिनकी सोच इतनी निकृष्ट है कि आत्मीय रिश्तों का उनके जीवन में कोई महत्व नही होता। जिस धूर्त जनप्रतिनिधि को सुंदरता उत्तेजित करती है या ख़ास बिरादरियों की लड़कियाँ आकर्षण का केंद्र लगती हैं। ऐसे धूर्तों का मानसिक और शारीरिक परीक्षण होना चाहिए तथा उसके विचारों को उसकी पार्टी का अधिकारिक वक्तव्य माना जाए या व्यक्तिगत, इस पर उसकी विधाता पार्टी का स्पष्टीकरण आना चाहिए। पार्टी की मीटिंगों में उसके चारित्रिक पहलुओं का भी अध्ययन होना चाहिए।    

 

एक ओर तो देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने हेतु अग्रसर है। दूसरी ओर अपने ही देश में वीभत्स सोच की सार्वजनिक प्रस्तुति पर कोई अंकुश न होना गंभीर चिंता का विषय है। समय आ गया है कि  ऐसी विकृत सोच वाले तत्वों पर अंकुश लगना अनिवार्य है। देश में किसी को भी ऐसे कुत्सित और एक पक्षीय विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, जिससे समाज में किसी भी प्रकार विभेद कारी विचारधारा को प्रोत्साहन मिलता हो। सुधाकर आशावादी



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