परिचय*
- उस सैनिक ने अंग्रेज अफसर को अपनी तलवार से काट डाला
Upgrade Jharkhand News. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक वीर योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की आजादी की नींव रखी। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे ठाकुर हनुमान सिंह, जिन्हें "छत्तीसगढ़ का मंगल पाण्डे" कहा जाता है। उन्होंने 1858 में रायपुर में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध साहसिक विद्रोह का नेतृत्व किया और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमिट योगदान दिया।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि -ठाकुर हनुमान सिंह का जन्म 1822 में हुआ था। वे मूल रूप से बैसवाड़ा के राजपूत थे। रायपुर में उस समय अंग्रेजों की फौजी छावनी थी, जिसे 'तृतीय रेगुलर रेजीमेंट' का नाम दिया गया था। हनुमान सिंह इसी फौज में 'मैग्जीन लश्कर' के पद पर नियुक्त थे। सन् 1857 में जब देशभर में स्वतंत्रता की पहली लड़ाई शुरू हुई, उस समय उनकी आयु लगभग 35 वर्ष की थी।हनुमान सिंह के हृदय में विदेशी हुकूमत के प्रति गहरी घृणा और आक्रोश था। छत्तीसगढ़ के महान स्वतंत्रता सेनानी वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर सरेआम फांसी दी गई थी। इस घटना ने हनुमान सिंह और अन्य देशभक्त सैनिकों के मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा को और तीव्र कर दिया। अंग्रेजों ने सभी फौजियों को नारायण सिंह की फांसी देखने के लिए उपस्थित रहने का आदेश दिया था, ताकि लोग आतंकित हो जाएं और विद्रोह का साहस न करें।
18 जनवरी 1858 - रायपुर सैन्य विद्रोह -परंतु अंग्रेजों का यह भ्रम मात्र 39 दिनों में ही टूट गया। 18 जनवरी 1858 की शाम लगभग साढ़े सात बजे, ठाकुर हनुमान सिंह ने अपनी योजना को अंजाम देने का निर्णय लिया। उनकी योजना थी कि रायपुर के प्रमुख अंग्रेज अधिकारियों की हत्या करके छत्तीसगढ़ में अंग्रेज शासन को पंगु बना दिया जाए। उस रात हनुमान सिंह अपने दो साथियों के साथ तीसरी रेजीमेंट के सार्जेंट मेजर सिडवेल के बंगले में घुस गए। सिडवेल उस समय अपने कक्ष में अकेले बैठे आराम कर रहे थे। हनुमान सिंह ने निर्भीकतापूर्वक कमरे में प्रवेश किया और तलवार से सिडवेल पर कई घातक प्रहार किए।सिडवेल वहीं ढेर हो गया और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई।
छावनी में विद्रोह का प्रसार -सिडवेल की हत्या के बाद हनुमान सिंह और उनके साथी छावनी पहुंचे। उन्होंने चिल्लाकर अन्य सिपाहियों को भी इस विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया और तोपखाने पर कब्जा कर लिया। दुर्भाग्य से सभी सिपाहियों ने उनका साथ नहीं दिया। केवल 17 सैनिकों ने ही इस साहसिक विद्रोह में हनुमान सिंह का साथ दिया। इस बीच सिडवेल की हत्या और छावनी में सैन्य विद्रोह का समाचार पूरी छावनी में फैल चुका था। अंग्रेज अधिकारी पूरी तरह से सतर्क हो गए। लेफ्टिनेंट रॉट और लेफ्टिनेंट सी.एच.एच. लूसी स्मिथ ने स्थिति पर काबू पाने का प्रयास शुरू कर दिया। उन्होंने ठाकुर हनुमान सिंह और उनके साथियों को चारों ओर से घेर लिया।
छह घंटे का महासंग्राम -यद्यपि हनुमान सिंह के साथ मात्र 17 सैनिक थे और वे संख्या में बहुत कम थे, लेकिन उनका साहस और जुझारूपन देखने लायक था। ये वीर योद्धा लगातार छह घंटों तक अंग्रेजों से लड़ते रहे। रायपुर पुलिस मैदान (जो उस समय अंग्रेजी सेना की छावनी था) में यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ। अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच भयंकर गोलीबारी हुई। लेकिन अंग्रेजों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण इन वीर सैनिकों के लिए अधिक देर तक टिकना असंभव हो गया। अंततः एक-एक करके 17 सैनिक गिरफ्तार कर लिए गए। इन वीर क्रांतिकारियों में एक हवलदार गाजी खान और शेष गोलंदाज थे।
डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर हमला -हनुमान सिंह किसी तरह अंग्रेजों की गिरफ्त से बच निकले। कैप्टन स्मिथ के बयान के अनुसार, हनुमान सिंह ने हार नहीं मानी। विद्रोह के दो दिन बाद 20 जनवरी 1858 की रात को उन्होंने डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर भी हमला करने की कोशिश की।उस समय बंगले में छत्तीसगढ़ क्षेत्र के कई प्रमुख वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी सो रहे थे।कैप्टन स्मिथ इन अधिकारियों की सुरक्षा के लिए नियुक्त थे। सौभाग्य से (अंग्रेजों के लिए) कैप्टन स्मिथ और उनके साथी ठीक समय पर जाग गए, जिससे हनुमान सिंह को वहां से भागना पड़ा।कैप्टन स्मिथ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि यदि हनुमान सिंह की यह योजना सफल हो जाती, तो निश्चय ही रायपुर शहर से अंग्रेज अधिकारियों का सफाया हो जाता और छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी शासन को गंभीर क्षति पहुंचती।
17 शहीदों की फांसी -22 जनवरी 1858 की सुबह, हनुमान सिंह के 17 साथी क्रांतिकारियों को रायपुर जेल (वर्तमान सेंट्रल जेल) के सामने पूरी सेना और जनता की उपस्थिति में सरेआम फांसी दे दी गई। यह अंग्रेजी हुकूमत द्वारा आम जनता और सैनिकों को आतंकित करने का एक क्रूर प्रयास था।
इन 17 शहीदों के नाम इस प्रकार हैं: गाजी खान (हवलदार), शिवनारायण, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, अब्दुल हयात, बली दुबे, लल्ला सिंह, बुद्धू सिंह, परमानंद, शोभाराम, मल्लू, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद (नूर मोहम्मद), देवीदीन और शिव गोविंद (जय गोविंद)।इन नामों से स्पष्ट होता है कि इस विद्रोह में सभी जाति और धर्म के लोग शामिल थे - हिंदू, मुस्लिम, राजपूत, ब्राह्मण सभी ने मिलकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। यह भारतीय एकता और साझा संघर्ष का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
फांसी देने के साथ-साथ अंग्रेजों ने इन सभी शहीदों की संपत्ति भी जब्त कर ली। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर द्वारा इन विद्रोही सिपाहियों पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें अपराधी ठहराया गया।
हनुमान सिंह का गायब होना -अंग्रेज सरकार ने ठाकुर हनुमान सिंह को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 500 रुपये के नगद पुरस्कार की घोषणा की थी। उस समय यह बहुत बड़ी राशि थी। परंतु इतने बड़े इनाम के प्रलोभन के बावजूद हनुमान सिंह को कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका।विद्रोह के बाद हनुमान सिंह अंग्रेजों की पकड़ से बचकर फरार हो गए और उसके बाद उनका कोई विवरण प्राप्त नहीं होता। न तो उनकी गिरफ्तारी का कोई रिकॉर्ड मिलता है और न ही उनकी मृत्यु के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध है। वे इतिहास के पन्नों में एक रहस्य बनकर रह गए।
ऐतिहासिक महत्व -रायपुर का यह सैन्य विद्रोह 1857 की क्रांति की एक महत्वपूर्ण कड़ी था। यद्यपि यह विद्रोह मात्र छह-सात घंटे में ही दबा दिया गया, लेकिन यह एक अत्यंत साहसिक प्रयास और ऐतिहासिक घटना थी। इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, वीर नारायण सिंह का त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत ने हनुमान सिंह और अन्य सैनिकों में विद्रोह की चिंगारी भड़का दी। रायपुर ने बैरकपुर की तरह की सैन्य क्रांति देखी, जिसके जनक ठाकुर हनुमान सिंह थे। छत्तीसगढ़ के पुलिस परेड ग्राउंड का 1857 की क्रांति से सीधा संबंध है। यह वही स्थान है जहां 1854 में अंग्रेजों ने अपनी फौजी छावनी स्थापित की थी और जहां हनुमान सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका था।
विरासत और स्मरण -ठाकुर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे। उन्हें "छत्तीसगढ़ का मंगल पाण्डे" कहा जाना उचित ही है, क्योंकि जिस प्रकार मंगल पाण्डे ने बैरकपुर में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भड़काई, उसी प्रकार हनुमान सिंह ने छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। उनका साहस, निर्भीकता और देशभक्ति आज भी हमें प्रेरणा देती है। मात्र 17 साथियों के साथ छह घंटे तक अंग्रेजी सेना से लड़ना और फिर उनकी पकड़ से बच निकलना उनके असाधारण साहस और रणकौशल का परिचायक है। हनुमान सिंह और उनके 17 साथियों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके संघर्ष ने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दी। आज भी जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो हमें इन अमर शहीदों का ऋण याद रखना चाहिए।
ठाकुर हनुमान सिंह का जीवन त्याग, बलिदान और अदम्य साहस की एक प्रेरक गाथा है। 18 जनवरी 1858 की वह रात छत्तीसगढ़ के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है, जब एक निडर राजपूत योद्धा ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।
हालांकि उनकी अंतिम यात्रा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, लेकिन उनका नाम और उनका संघर्ष छत्तीसगढ़ की धरती पर हमेशा अमर रहेगा। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की आन, बान और शान के प्रतीक हैं।आज जब हम स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम ठाकुर हनुमान सिंह और उनके 17 साथी शहीदों को याद करें और उनके बलिदान को सम्मान दें। उनकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचानी चाहिए, ताकि वे जान सकें कि हमारी आजादी किन वीरों के बलिदान का फल है।




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