Jamshedpur (Nagendra) प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 के तीसरे दिन के सत्रों की शुरुआत के पहले दिशोम गुरू शिबू सोरेन जी को उनकी जयंती पर याद करते हुए उनको श्रद्धांजलि देकर हुई। इस अवसर पर जिले के उपायुक्त सहित सभी साहित्यकार उपस्थित थे। शिशिर के अलसायी रविवार की सुबह पूर्वी सिंहभूम साहित्योत्सव 2026 के तृतीय दिवस के प्रथम सत्र में अनुकृति उपाध्याय से यदुवंश प्रणय की 'Two languages One Inner World' विषय के बहाने अनुकृति के जीवन संदर्भों और रचना प्रक्रिया पर गर्मजोशी से की गई बातचीत से सभागार का माहौल कॉफी के पहले घूंट की तरह अनन्य ऊर्जा से भर गया।
इसी क्रम में वैश्विक साहित्य को जन सुलभ बनाने हेतु अनुवादकों की भूमिका पर बात करते हुए अनुकृति ने कहा कि भाषा को साधा जाना चाहिए, देश, काल और समय के दायरे में बांधा नहीं जाना चाहिए और यह काम अनुवादक कर रहे हैं। कहानियों की भाषा परिवेश और काल भिन्न हो सकते हैं परंतु मानवीय सरोकार सार्वदेशिक और सर्वकालिक है। जीवन में स्मृतियां और उम्मीद की प्रासंगिकता को बयां करते हुए वह जापानी किंत्सुगी कला का उदाहरण जीवन प्रसंगों से जोड़ते हुए बताती हैं कि टूटी उम्मीद, टूटी आशाएं, टूटा पात्र बेकार है। यह सोच हमारी दृष्टि का दोष है इसे अच्छे भावों, समझ और अध्ययन से मढ़कर हम जीवन को पहले से ज्यादा अर्थवान और खूबसूरत बना सकते हैं। रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए वह रोमन भाषा में रचित अपने उपन्यासों "भंवरी" और "दौरा" के पात्र संदर्भ में घुमंतू जनजाति गाड़िया लोहार की बात करती हैं।
वह बताती है पितृसत्तात्मक जनजाति होते हुए वहां स्त्रियां अपनी बुनियादी कला के दर्प से अपनी सौंदर्य चेतना, स्वातंत्र्य और वजूद को कल्पनाओं के गर्व से भरा रखती हैं क्योंकि कल्पनायें खत्म हो जाएगी तो स्मृतियाँ खत्म हो जाएगी और स्मृतियों का खत्म हो जाना एक संस्कृति का खत्म हो जाना है। नई पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हुए वह विनोद कुमार शुक्ला की बाणभट्ट की आत्मकथा, आदि ग्रंथों में महाभारत, विश्व साहित्य से मार्खेज और मुराकामी को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं क्योंकि उनका मानना है कि पढ़ना वामनावतार का वह तीसरा पग है जो सभी चीजों को अपने आप में समाहित कर लेता है। यदुवंश प्रणय से अनुकृति उपाध्याय की जीवन यात्रा से रचना यात्रा तक की गई बेबाक बातचीत की अनुगूंज श्रोताओं के करतल ध्वनि के रूप में सत्रांत तक गूंजता रहा।
दूसरा सत्र- महाश्वेता देवी स्मरण व उनकी आदिवासी रचनाओं में इतिहास मिथक और आख्यान -दूसरे सत्र में ग्लोबल गांव के देवता एवं गूंगी रुलाई के कोरस पुस्तक के लेखक एवं मशहूर साहित्यकार रणेंद्र ने आदिवासी समाज एवं बिरसा मुंडा को लेकर उनके लिखे उपन्यासों एवं पात्रों की चर्चा करते हुए कहा कि महाश्वेता देवी के अलावा विरले ही कोई लेखक मिलते हैं जो सड़क पर भी उतरा हो और लेखन से भी जुड़ा हो । महाश्वेता देवी की पुस्तक जंगल के दावेदार एवं चोट्टी मुंडा के तीर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक किताब किसी शहीद की यात्रा को कितना आगे ले जाती है यह सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने बताया कि इन पुस्तकों के बाद ही बिरसा मुंडा एवं आदिवासी समुदाय के संघर्षों का मूल्यांकन राष्ट्रीय स्तर पर सही तरीके से हो सका। उन्होंने पलामू में बंधुआ मजदूर की लड़ाई लंबे समय तक की। महाश्वेता देवी आदिवासी समुदाय का सूक्ष्म पर्यवेक्षण इसलिए कर सकी क्योंकि उन्होंने ढेर सारा समय इस समुदाय के साथ बिताया। कई प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होने कहा कि आदिवासियों के आंदोलन का तरीका व्यक्तिवादी नहीं होती, सामुदायिक होती है। उन्होंने युवाओं को आहवान किया कि यदि आदिवासी समाज को समझना है तो महाश्वेता देवी की रचनाओं को जरूर पढ़ें।
तीसरा सत्र- एक जंगल हुआ करता था- Beyond The Jung;e Book - इस सत्र में पक्षी विज्ञानी बिक्रम ग्रेवाल और युवा रचनाकार, विशेषज्ञ रजा काजमी की बातचीत का रहा। विक्रम ग्रेवाल की चिंताएं देश में घटते जंगल, लुप्त होते पक्षी, विलुप्त होते पशु से लेकर उन्हें बचाने के उपाय तक एक लंबी चर्चा के रूप में आई। उन्होंने कहा लोगों को जंगलों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील करना ही एकमात्र विकल्प है। इसी क्रम में जोर देते हुए कहते हैं की झारखंड जैसे प्रदेश में बर्ड वाचिंग जैसे इको टूरिज्म को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि लोग पशु, पक्षी, जंगल से जुड़ सकें और उनके रिहाइश के प्रति सजग और संवेदनशील हो सके। रजा काजमी झारखंड के जंगल से जुड़े साहित्य की विरासत को लोगों को याद दिलाते हुए कहा की झारखंड की धरती वह धरती है जो विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के अजीम उपन्यास पाथेर पांचाली की रचना भूमि रही ।साथ ही उनकी तमाम अन्य कहानियों ने इन्हीं दलमा, सारंडा के जंगलों में जन्म लिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जंगलों से जुड़े हुए साहित्य से इतर जंगल का एक साहित्य होता है, यहां की आदिवासी, जनजातीय लोक कथाओं में, जो वाचिक तौर पर मौजूद है। जिसमें पेड़ हैं, चिड़िया है, धरती है, नदी है, बाघ है, बकरी है और जंगल के वह सारे तमाम जीव है जो लोकजीवन से वैसे ही जुड़े हुए हैं जैसे सांसों से हवा। इन्हें बचाना जरूरी है क्योंकि सांस तभी बचेगी जब हवा बचेगा, हवा तभी बचेगा जब जंगल बचेंगे और जंगल बचेगा तो जीवन बचेगा, जीवन बचेगा तो संस्कृति बचेगी। सत्रांत में श्रोताओं के साथ मंचासीन विशेषज्ञों की बातचीत में कई और महत्वपूर्ण समसामयिक विषयों पर चर्चा रोचक रही।
चौथा सत्र -- मध्यांतर के पहले का दिन का चौथा सत्र झारखंड के भविष्य के नन्हें पौधों को मंच देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। मंच पर थे प्रख्यात साहित्यकार चंद्रहास चौधरी और आठ अलग-अलग क्षेत्रों से अपने अलग-अलग अनुभवों और उपलब्धियों के साथ आए मोनिका, रीमा, दामिनी सबर, शक्ति महतो, नंदिनी सिंह , सुखमनी मार्डी, शांभवी जायसवाल जैसे 8 बच्चे और युवा। और चंद्रहास चौधरी के साथ मंचस्थ नई पौध की बातचीत में थे। उनकी यात्रा, अनुभव, सपनों की उड़ान, समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार, उनकी कल्पनाएं, उनकी समझ। जैसे मंच पर बच्चों के बोल नहीं उनकी कल्पनाओं की उड़ानें थी और उनके साथ सभागार में कोई इसरो के अध्ययन कर रहा था तो कोई नई पौध की कविताओं को देख परख कर निश्चित हो रहा था कि झारखंड और देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। सत्र बहुत ही सारगर्भित इस तौर पर रहा कि ऐसे आयोजन, शैक्षणिक भ्रमण, नए नए एक्सपोजर, कैसे नवीन पीढ़ी के लिए सीढ़ी बन जाने का काम करती हैं । इस हकीकत से सभी रूबरू हुए। यह सत्र निश्चय ही भविष्य के लिए योजनाएं बनाने वालों और नीति निर्धारकों और उन तमाम लोगों के लिए आश्वस्ति के एक अदृश्य सर्टिफिकेट की तरह रहा जो आने वाले दिनों में उन्हें और सकारात्मक ऊर्जा देगा।
सत्र पांच - साहित्य और सिनेमा का जो अंतःसंबंध है उसे देखते हुए साहित्य के मंच पर सिनेमा की चर्चा होना जरूरी है। इसी सापेक्ष आज के दिन का पांचवा सत्र अपने जीवन को सिनेमा के अध्ययन अध्यापन निर्माण के नाम कर चुकी डॉ नेहा तिवारी की बातचीत सिनेमा को ओढ-बिछा-जी रहे या कहें अपनी सांसे बना चुके युवा फिल्म निर्माता, निर्देशक और SRFTI के छात्र रह चुके निरंजन कुजूर से उनके जीवन यात्रा, अध्ययन, संघर्षों और फिल्म निर्माण-निर्देशन प्रक्रिया और उसके चैलेंजेस पर हुई। गंभीर सिनेमा से लेकर मुख्य धारा तक की सिनेमा में आदिवासी चरित्र के चित्रण के बारे में बात करते हुए निरंजन कुजूर ने बताया सिनेमा में आदिवासियों का यथार्थ बैलेंस नहीं रहा। इसलिए उनका मानना है कि हर संस्कृति का अपना सिनेमा होना वैसे ही जरूरी है जैसे भाषा, साहित्य, कविताएं, कहानियां, लोकगीत, लोक कथाएं वगैरह। क्योंकि सिनेमा ही है जो अपने समय का दृश्यक दस्तावेज है, उसे संरक्षित रखता है और अगली पीढ़ी तक सुरक्षित ले जाता है। उन्होंने फिल्मों के प्रदर्शन, लाइब्रेरी और दर्शकों तक पहुंचाने के तमाम आयाम के क्षेत्रीय सिनेमा की जरूरतों पर बल दिया जिन्हें सरकार और समाज के स्तर पर प्रोत्साहन की जरूरत है। क्षेत्रीय स्तर पर बना रहे आदिवासी भाषा की फिल्मों में सिनेमा में शुद्धता की जरूरत और संस्कृति के सही चित्रण को बनाए रखने के चैलेंज की बात भी कही जिस पर सत्रांत में श्रोताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
छठा सत्र- अदृश्य कहानियों का कथाकार -छठे सत्र में अदृश्य कहानियों के कथाकार विषय पर बस्तर की पत्रकारिता से चर्चित पत्रकार एवं लेखक राहुल पंडिता के साथ यदुवंश प्रणय ने बातचीत की । उन्होंने एक सवाल के जवाब में बताया कि दिल्ली से रिपोर्टिंग एवं फील्ड में जाकर रिपोर्टिंग में काफी फर्क होता है। उन्होंने कहा कि कनफ्लिक्ट पत्रकारिता के संबंध में लोगों में रोमानी भाव है। लेकिन यह उतना आसान नहीं है। उन्होंने कश्मीर और पलायन, शरणार्थियों की स्थितियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि इतिहास को स्मृति के बगैर नहीं देखा जा सकता है।
शिक्षक अरविंद तिवारी की पुस्तक स्कूल में जेंडर का विमोचन -शिक्षक अरविंद तिवारी की पुस्तक स्कूल में जेंडर का विमोचन मशहूर साहित्यकार रणेंद्र एवं महादेव टोप्पो ने किया। प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव का समापन अनुमंडल पदाधिकारी, धालभूम अर्नव मिश्रा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। तत्पश्चचात सांस्कृतिक संध्या के मंच पर झारखंड के कला, संस्कृति को सहेजती नृत्य, नाटक, गीत की प्रस्तुति से यह साहित्य उत्सव विधिवत संपन्न हुआ।

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