Upgrade Jharkhand News. रांगेय राघव हिन्दी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिनके लिए लेखन केवल सौंदर्य-बोध की साधना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औज़ार था। उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना दरअसल उस साहित्यिक परंपरा को नमन करना है, जिसने शोषित, वंचित और हाशिए पर खड़े समाज को शब्द, स्वर और साहस दिया। रांगेय राघव हिन्दी के प्रगतिशील विचारों के ऐसे लेखक थे, जिनकी कलम सत्ता, अन्याय और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध लगातार संघर्षरत रही। रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ। उनका मूल नाम त्र्यंबक वीरराघवाचार्य था। अत्यंत अल्प आयु में उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में जो गहन और व्यापक कार्य किया, वह आज भी चकित करता है। मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, किंतु इस छोटे से जीवनकाल में उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, निबंध और इतिहास—लगभग सभी विधाओं में अमिट छाप छोड़ी।
प्रगतिशील आंदोलन से गहराई से जुड़े रांगेय राघव का साहित्य सामाजिक यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा है। उन्होंने साहित्य को कल्पना की उड़ान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे खेतों, खदानों, आदिवासी अंचलों, मजदूर बस्तियों और दलित जीवन की कठोर सच्चाइयों से जोड़ा। उनके पात्र आदर्श नहीं, बल्कि संघर्षरत मनुष्य हैं—जो भूख, अपमान, शोषण और अन्याय के बीच भी अपनी मनुष्यता बचाए रखने की कोशिश करते हैं। रांगेय राघव के उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। ‘कब तक पुकारूँ’ में आदिवासी जीवन और उसके शोषण का जो मार्मिक चित्रण मिलता है, वह आज भी पाठक को विचलित करता है। यह उपन्यास बताता है कि विकास और सभ्यता के नाम पर सबसे अधिक चोट हमेशा कमजोर वर्गों पर ही पड़ती है। ‘मुर्दों का टीला’ इतिहास और यथार्थ का ऐसा संयोजन है, जिसमें अतीत वर्तमान से संवाद करता है। ‘सीधा-साधा रास्ता’ और ‘प्रतिदिन’ जैसे उपन्यास आम आदमी की टूटती उम्मीदों और रोज़मर्रा के संघर्षों का दस्तावेज़ हैं।
कहानी विधा में भी रांगेय राघव का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘गदल’, ‘देवदासी’, ‘पाँच गधे’ जैसी कहानियाँ सामाजिक ढांचे की क्रूर सच्चाइयों को बेनकाब करती हैं। उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन, जातिगत भेदभाव, स्त्री-शोषण और आर्थिक विषमता का सशक्त चित्रण मिलता है। वे कहानी को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते थे।नाटक के क्षेत्र में रांगेय राघव ने ऐतिहासिक और वैचारिक विषयों को चुना। ‘रामानुज’ जैसे नाटक में उन्होंने भक्ति आंदोलन के भीतर मौजूद सामाजिक चेतना को उजागर किया। उनके नाटकों में इतिहास केवल अतीत नहीं रहता, बल्कि वर्तमान के सवालों से जुड़ जाता है। यही उनकी दृष्टि की विशेषता है—वे हर विषय को समकालीन संदर्भों में देखने की कोशिश करते हैं।
एक आलोचक और विचारक के रूप में भी रांगेय राघव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’ और ‘भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका’ जैसी कृतियों में उन्होंने साहित्य और समाज के संबंधों पर गंभीर विमर्श किया। वे मानते थे कि साहित्य समाज से कटकर नहीं लिखा जा सकता। साहित्य शोषण और अन्याय पर मौन रहता है, वह अपने सामाजिक दायित्व से पलायन करता है। रांगेय राघव की भाषा सरल, सशक्त और प्रभावशाली है। उसमें न तो अनावश्यक क्लिष्टता है और न ही कृत्रिम सौंदर्य। उनकी भाषा सीधे पाठक के मन तक पहुँचती है, क्योंकि वह जीवन से उपजी है। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था।
उनका लेखन हमें यह भी सिखाता है कि प्रगतिशीलता कोई नारा नहीं, बल्कि दृष्टि है—मनुष्य को केंद्र में रखकर सोचने की दृष्टि। वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे, लेकिन अंध-अनुकरण के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने भारतीय समाज की विशिष्ट परिस्थितियों को समझते हुए अपने विचार विकसित किए। जब साहित्य के सामने बाज़ार, तात्कालिक लोकप्रियता और सतही संवेदनाओं का दबाव बढ़ता जा रहा है, रांगेय राघव की याद और भी जरूरी हो जाती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि साहित्य का असली मूल्य उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता में है। उनकी रचनाएँ आज भी सवाल करती हैं—क्या समाज सचमुच बदल रहा है, या केवल रूप बदल रहा है?
रांगेय राघव का निधन मात्र 39 वर्ष की उम्र में मुंबई में सन् 1962 में हो गया था। इस अद्भुत रचनाकार को मृत्यु ने इतनी जल्दी न उठा लिया होता तो वे और भी नये मापदण्ड स्थापित करते। विरले ही ऐसे सपूत हुए हैं जिन्होंने विधाता की ओर से कम उम्र मिलने के बावजूद इस विश्व को इतना कुछ अवदान दे दिया कि आज भी अच्छे-अच्छे लेखक दांतों तले अंगुलियां दबाने को विवश हो जाते हैं। उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, इतिहास-संस्कृति तथा समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और अनुवाद, चित्रकारी... या यूं कहें कि सभी विधाओं पर उनकी लेखनी बेबाक चलती रही और उससे जो निःसृत हुआ, उससे साहित्यप्रेमी आज भी आनंदित होते हैं, प्रेरणा लेते हैं। 12 सितम्बर 1962 को उनका शरीर पंततत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका यश आज भी विद्यमान है। 39 वर्ष की अल्पायु में डेढ़ सौ से अधिक कृतियां भेंट कर निस्संदेह उन्होंने सृजन जगत् को आश्चर्यचकित कर दिया।
रांगेय राघव की जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल अतीत का सम्मान नहीं, बल्कि वर्तमान के प्रति जिम्मेदारी भी है। उनकी कलम ने जिन सवालों को उठाया था, वे सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं। ऐसे में रांगेय राघव का साहित्य हमें न केवल पढ़ना चाहिए, बल्कि उससे सीख भी लेनी चाहिए। निश्चय ही, रांगेय राघव हिन्दी साहित्य के उस उज्ज्वल नक्षत्र का नाम है, जिसकी रोशनी आने वाली पीढ़ियों को भी रास्ता दिखाती रहेगी।


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