देश की एकता पर भारी पड़ती धार्मिक राजनीति
Upgrade Jharkhand News. भारतीय लोकतंत्र में एक चिंताजनक प्रवृत्ति लगातार मजबूत होती जा रही है - सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माध्यम से वोट बैंक बनाने की राजनीति। विभिन्न राजनीतिक दल धार्मिक भावनाओं को भड़काकर अपना राजनीतिक हित साधने में जुटे हैं, जो न केवल सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि देश की प्रगति में भी बाधक बन रहा है।
राजनीतिक दलों की रणनीति-चुनावी मौसम में धार्मिक मुद्दों को जानबूझकर उछाला जाता है। कुछ राजनीतिक दल बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को भड़काते हैं तो कुछ अल्पसंख्यक समुदाय के डर का फायदा उठाते हैं। दोनों ही स्थितियों में समाज में विभाजन की खाई गहरी होती जाती है। धार्मिक प्रतीकों, नारों और भाषणों का इस्तेमाल चुनावी हथियार के रूप में किया जाता है। "हम बनाम वे" की राजनीति को बढ़ावा दिया जाता है, जहां एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जाती है। धार्मिक स्थलों, परंपराओं और इतिहास से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को जानबूझकर गर्म किया जाता है।
दंगों की राजनीति का दुष्चक्र -सबसे खतरनाक पहलू यह है कि कुछ मामलों में सांप्रदायिक दंगों को चुनावी लाभ के लिए भड़काया जाता है या उनका फायदा उठाया जाता है। दंगों के बाद ध्रुवीकरण और बढ़ जाता है, जिससे कुछ राजनीतिक दलों को अपना वोट बैंक मजबूत करने का मौका मिलता है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है जहां हिंसा और राजनीति एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं।इस राजनीति में सोशल मीडिया का भी दुरुपयोग किया जाता है। फर्जी खबरें, भड़काऊ वीडियो और अफवाहें तेजी से फैलाई जाती हैं। धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री जानबूझकर वायरल की जाती है ताकि समुदायों के बीच तनाव बढ़े और राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।
समाज और देश पर प्रभाव -सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के दूरगामी और विनाशकारी परिणाम होते हैं। सबसे पहले, यह सामाजिक सद्भाव को तोड़ती है। सदियों से साथ रहने वाले समुदायों के बीच अविश्वास और नफरत की दीवार खड़ी हो जाती है। पड़ोसी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है। दूसरा, असली विकासात्मक मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुनियादी ढांचा, महंगाई जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे चुनाव में मुद्दा नहीं बन पाते। राजनीतिक दल धार्मिक मुद्दों की आड़ में अपनी विफलताओं को छुपा लेते हैं और मतदाताओं का ध्यान असली समस्याओं से भटका देते हैं।
तीसरा, यह देश की आर्थिक प्रगति को बाधित करता है। सांप्रदायिक तनाव और दंगों से व्यापार-व्यवसाय प्रभावित होता है, निवेश का माहौल खराब होता है और विकास की गति धीमी पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि धूमिल होती है। चौथा, यह संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता, समानता और भाईचारे के सिद्धांतों पर आधारित है। सांप्रदायिक राजनीति इन मूल्यों के खिलाफ है और लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करती है।
समाधान की दिशा में -इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयास जरूरी हैं। सबसे पहले, चुनाव आयोग को सख्ती दिखानी होगी। धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले नेताओं और दलों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। चुनाव आचार संहिता का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। न्यायपालिका को सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में त्वरित और निष्पक्ष न्याय देना होगा। दंगाइयों को, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि के हों, सजा मिलनी चाहिए। राजनीतिक संरक्षण पर रोक लगनी चाहिए।मीडिया को जिम्मेदारी से काम करना होगा। फर्जी खबरों और भड़काऊ सामग्री को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। संतुलित और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग जरूरी है।शिक्षा प्रणाली में सांप्रदायिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और तर्कशील सोच को बढ़ावा देना होगा। युवाओं को धार्मिक कट्टरता से बचाना जरूरी है।
नागरिकों की भूमिका -सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जागरूक नागरिकों की है। मतदाताओं को समझना होगा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले नेताओं को वोट देकर वे अपने और अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें उम्मीदवारों से विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर सवाल पूछने चाहिए। धार्मिक पहचान के आधार पर वोट देने की बजाय योग्यता, ईमानदारी और विकास के एजेंडे के आधार पर चुनाव करना चाहिए। सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों और भड़काऊ सामग्री को शेयर करने से पहले उसकी सच्चाई जांचनी चाहिए।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति भारत के लिए एक गंभीर खतरा है। यह न केवल सामाजिक सद्भाव को नष्ट करती है बल्कि देश की प्रगति में भी बाधक बनती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिकों सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। केवल तभी हम एक समृद्ध, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील भारत का निर्माण कर सकते हैं। धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है, राजनीतिक हथियार नहीं - यह समझ विकसित करना समय की मांग है।



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